पंजाब में अकाली दल-बीजेपी की जोड़ी में ही क्यों दिखता है 'जीत का फॉर्मूला'? पढ़ें NDA के लिए क्यों फेल हैं बाकी ऑप्शन
Amit Shah statement अमित शाह के बयान ने पंजाब में एनडीए सरकार की चर्चाओं को फिर से हवा दी है, ...और पढ़ें

अमित शाह के बयान के बाद पंजाब में गठबंधन की चर्चाएं तेज (जागरण ग्राफिक्स)
HighLights
अमित शाह के बयान से पंजाब में गठबंधन की चर्चा तेज
भाजपा-अकाली दल का दशकों पुराना सफल गठबंधन इतिहास रहा है
पूरक वोट बैंक के कारण दोनों दलों का तालमेल प्रभावी
रमनजीत सिंह मणकु, चंडीगढ़। Punjab Election 2027: दशकों तक शिरोमणि अकाली दल (बादल) और भाजपा के बीच गठबंधन रहा। भले ही शिअद प्रमुख प्रकाश सिंह बादल हों या फिर अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे नेता, सभी पंजाब में बनने वाली सरकार को एनडीए सरकार कहकर ही संबोधित करते रहे।
किसान आंदोलन के दौरान गठबंधन (Akali Dal BJP Alliance) टूटा तो पंजाब में एनडीए शब्द का इस्तेमाल बंद हो गया। भाजपा पंजाब में अपनी सरकार बनाने का दावा करने लगी और शिअद अपनी सरकार बनाने का।
कल तक तो यही कहा जा रहा था, लेकिन वीरवार को भाजपा के दिग्गज नेता अमित शाह के बयान (Amit Shah Punjab Statement) में बीते तकरीबन पांच वर्ष के बाद पहली बार पंजाब में एनडीए सरकार का जिक्र हुआ है।
इस बयान से एक बार फिर से पंजाब में गठबंधन की चर्चाओं को बल दे दिया है। इस बयान से सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा पंजाब में दोबारा शिअद (बादल) के साथ गठबंधन (Punjab NDA Government) की राजनीति की ओर लौट रही है या फिर एनडीए के विस्तार के लिए दूसरे विकल्प तलाशे जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले अब नजर इस बात पर है कि भाजपा किन दलों से राजनीतिक तालमेल बनाती है।
किस पार्टी से कितनी संभावना?
आम आदमी पार्टी
संभावना: बिल्कुल नहीं
कारणः आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर पहुंचने के लिए लगातार भाजपा को कठघरे में रखे हुए है। भाजपा भी लगातार आप नेतृत्व को निशाने पर रखती है।
कांग्रेस
संभावना: बिल्कुल नहीं
कारण: कांग्रेस के साथ भाजपा के गठबंधन की संभावना राजनीतिक रूप से नामुमकिन है। भाजपा लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के खिलाफ राजनीति करती रही है और कांग्रेस मुक्त भारत का नारा उसका प्रमुख राजनीतिक संदेश रहा है। ऐसे में दोनों दलों के पंजाब में साथ आने की गुंजाइश नजर नहीं आती।
शिअद (अमृतसर) व शिअद वारिस पंजाब दे
संभावना: बिल्कुल नहीं
कारणः सिमरनजीत सिंह मान की अगुआई वाले शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) और डिब्रूगढ़ जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह की अगुआई वाले शिरोमणि अकाली दल वारिस पंजाब दे के साथ भाजपा के वैचारिक और राजनीतिक मतभेद गठबंधन की राह को बंद करने वाले हैं।
शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत)
संभावना: बेहद कम
कारणः यह पार्टी, शिरोमणि अकाली दल से अलग होकर बनी है, कई नेता भाजपा के नेताओं के साथ वर्षों से कनेक्ट रहे हैं और उन्हीं के जरिए बातचीत हो सकती है।
शिअद (पुनर सुरजीत), चुनावी राजनीति में अभी नए दल के तौर पर शामिल है, लेकिन दल के नेताओं ने स्पष्ट किया है कि यदि भाजपा के साथ गठबंधन की बात होगी तो पहले चंडीगढ़ पंजाब को सौंपने से लेकर बंदी सिंहों की रिहाई तक के मुद्दों पर चर्चा होगी, सहमति बनेगी तो ही आगे बढ़ा जाएगा। ऐसे में भाजपा का शर्ते मानते हुए गठबंधन कबूलना राजनीतिक कमजोरी प्रतीत होगा, जिसकी संभावना कम है।
शिरोमणि अकाली दल (बादल)
संभावना: बेहद ज्यादा
कारण: सुखबीर सिंह बादल की अगुआई वाला शिरोमणि अकाली दल (बादल) ही ऐसी राजनीतिक दल है, जिसके साथ भाजपा का गठबंधन होने की काफी संभावनाएं है। दशकों के साथी रहे दोनों दलों के कार्यकर्ताओं का पंजाब के जमीनी स्तर पर भी समन्वय रहा है।
शिअद और भाजपा गठबंधन पंजाब की सबसे सफल और सबसे लंबी गठबंधन सरकारों में से एक रहा है। अब एक बार फिर गठबंधन की संभवानाएं बढ़ी हैं।

गठबंधन का इतिहास जड़ें
जनसंघ के समय से:
1967, 1969 में शिरोमणि अकाली दल ने जनसंघ साथ मिलकर सरकार बनाई। 1977 में जनता पार्टी में दोनों साथ थे। औपचारिक गठबंधन 1996 में प्रकाश सिंह बादल और अटल बिहारी वाजपेयी ने सीट शेयरिंग तय की 117-से 94 सीटों पर शिअद और 23 सीटों पर भाजपा लड़ी। लोकसभा में 13 में से शिअ 10 और भाजपा 3 (अमृतसर, गुरदासपुर होशियारपुर)।
सफलता का फॉर्मूला क्या था?
शिअद को ग्रामीण, सिख वोट और भाजपा को (SAD-BJP Seat Sharing) शहरी, हिंदू वोट- दोनों का वोट बैंक कभी ओवरलैप नहीं करता था। इसलिए वोट ट्रांसफर होता था। साल 2020 में अलग होने के बाद दोनों का ग्राफ गिर गया।
साल 2024 लोकसभा में विधानसभा के हिसाब से भाजपा 23 सीटों पर आगे थी और शिअद सिर्फ 9 पर। इसी वजह से अब 2027 के लिए फिर से गठबंधन की चर्चा तेज है।
हालांकि दोनों दल अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने की बात करते रहे, लेकिन उसके बावजूद भी जमीनी स्तर पर दोनों दलों के नेता ही नहीं, बल्कि राजनीति में रुचि रखने वाले लोग भी दोनों दलों के गठबंधन और जीत की संभावना पर ही चर्चा करते रहे हैं।
