PU सीनेट चुनाव के लिए हंगामा खूब हुआ, PU का करोड़ों खर्च; फिर भी 6.25 लाख में में 92 हजार ने डाले वोट
पंजाब यूनिवर्सिटी के सीनेट चुनाव में भारी हंगामे और करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मतदान प्रतिशत बेहद कम रहा। ...और पढ़ें

14.69 प्रतिशत मतदाताओं ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया। (सांकेतिक फोटो)
HighLights
केवल 14.69% ने ही मतदान किया।
अनुमानित 2.5 करोड़ खर्च हुआ।
मतदाता सूची में खामियाें का असर।
जागरण संवाददाता, चंडीगढ़। पंजाब यूनिवर्सिटी (पीयू) के सीनेट चुनाव के लिए पिछले साल खूब हंगामा हुआ। केंद्र सरकार तक को फैसला पलटना पड़ा और अब करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद रजिस्टर्ड ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्र में मतदान प्रतिशत बेहद कम रहा।
करीब 6.25 लाख मतदाताओं में से करीब 92 हजार ने ही वोट डाले। यानी 14.69 प्रतिशत मतदाताओं ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया। चुनाव पर विश्वविद्यालय का करीब 2.5 करोड़ खर्च होने का अनुमान है।
अहम बात यह रही कि वोट डालने में सबसे ज्यादा रुचि पहली बार बने मतदाताओं ने ही दिखाई। पीयू ने अकेले करीब 20 लाख रुपये के बैलेट पेपर तैयार कराए। मतदान के लिए 298 बूथ बनाए गए।
प्रत्येक बूथ पर फर्नीचर की व्यवस्था की गई, जबकि किसी तरह की कमी न रहे, इसके लिए अतिरिक्त करीब 330 बूथों के लिए भी फर्नीचर मंगवाया गया। मतगणना में लगाए गए कर्मचारियों को भी अलग से भुगतान किया जाएगा।
वोटर लिस्ट में खामियों का असर
कम मतदान के पीछे वोटर लिस्ट का समय पर रिवाइज न होना भी बड़ी वजह मानी जा रही है। 1966 के बाद से वोटर लिस्ट के व्यापक रिवीजन का मुद्दा उठता रहा है।
इसके अलावा आधार लिंकेज, मृत मतदाताओं और डुप्लीकेट नाम हटाने की प्रक्रिया में मैनुअल रिकार्ड पर निर्भरता भी बनी हुई है। इससे बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम सूची में बने रहने की बात सामने आती रही है, जो मतदान नहीं करते।
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91 से 31 सदस्य किए जाने पर हुआ था विरोध
सीनेट के सदस्यों की संख्या 91 से घटाकर 31 करने के केंद्र सरकार के फैसले को लेकर पंजाब में राजनीतिक दलों ने विरोध किया था। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस समेत कई नेताओं ने इसे पंजाब के अधिकारों से जोड़कर मुद्दा बनाया था।
चुनाव को लेकर राजनीतिक स्तर पर खूब बयानबाजी और विरोध हुआ, लेकिन मतदान के आंकड़ों में उसका असर नजर नहीं आया। अब मतदान के बाद बुधवार से मतगणना शुरू होगी। कम मतदान और चुनाव पर हुए भारी खर्च को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने व्यवस्था और मतदाता सूची को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
