बच्चों के व्यवहार में बढ़ रही हिंसा, छोटी उम्र में गुस्सा और आक्रामकता; पंचकूला के स्कूल की घटना के बाद बढ़ी चिंता
पंचकूला के एक स्कूल में बच्ची पर हमले की घटना ने बच्चों में बढ़ती हिंसा और आक्रामकता पर चिंता बढ़ा ...और पढ़ें

छोटी-छोटी बातों पर मारपीट करना, बच्चों में बढ़ रही प्रवृत्ति। (एआई जनरेटेड फोटो)
HighLights
छह साल की बच्ची पर तीसरी कक्षा के छात्र ने किया हमला।
घर का माहौल, मोबाइल बच्चों के व्यवहार पर असर।
साइकोलाजिस्ट बोले-जिद समझकर न करें नजरअंदाज।
जागरण संवाददाता, चंडीगढ़। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना, बात न मानना, दूसरे बच्चों के साथ मारपीट करना और किसी को चोट पहुंचाने से भी पीछे नहीं हटना। बच्चों में दिखने वाले ये व्यवहार अक्सर माता-पिता को सामान्य शरारत या जिद लगते हैं, लेकिन कई बार इनके पीछे गंभीर मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकते हैं।
पंचकूला सेक्टर-20 के सरकारी स्कूल में तीसरी कक्षा के छात्र द्वारा पहली कक्षा की छह वर्षीय बच्ची पर ईंट से करीब 12 वार करने की घटना ने बच्चों में बढ़ती आक्रामकता को लेकर चिंता बढ़ा दी है। गंभीर रूप से घायल बच्ची का पीजीआई में उपचार चल रहा है। इस घटना ने सवाल खड़ा किया है कि आखिर छोटी उम्र में बच्चों के भीतर इतना गुस्सा और हिंसक व्यवहार क्यों बढ़ रहा है।
क्लीनिकल साइकोलाॅजिस्ट डाॅ. भविंदर सिंह के अनुसार, बच्चों के आक्रामक व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इसे केवल बदमाशी या जिद मानकर छोड़ना सही नहीं है। बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव, बार-बार गुस्सा करना और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति को गंभीरता से समझने की जरूरत है।
बच्चों के व्यवहार पर घर के वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है। माता-पिता का लगातार झगड़ना, बच्चे को पर्याप्त समय नहीं देना, जरूरत से ज्यादा सख्ती करना या छोटी-छोटी बातों पर शारीरिक सजा देना उसके मन पर असर डाल सकता है।
कई बार बच्चे अपनी भावनाएं शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते और गुस्से के रूप में प्रतिक्रिया देते हैं। भावनात्मक सुरक्षा और माता-पिता का सहयोग नहीं मिलने पर भी बच्चों में चिड़चिड़ापन और आक्रामकता बढ़ सकती है।
मोबाइल और हिंसक सामग्री का असर
बच्चों का अधिक समय मोबाइल, टीवी और वीडियो गेम पर बिताना भी चिंता का विषय है। हिंसक गेम, मारपीट वाले वीडियो और उम्र के अनुरूप नहीं होने वाली सामग्री बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
बच्चे कई बार स्क्रीन पर देखी गई गतिविधियों की नकल वास्तविक जीवन में करने लगते हैं। इसके अलावा स्कूल में साथियों का व्यवहार और आसपास का माहौल भी उनके स्वभाव को प्रभावित करता है।
एडीएचडी-ओडीडी जैसे विकार भी हो सकते कारण
कुछ बच्चों में एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाईपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) और ओडीडी (अपोजिशनल डिफिएंट डिसऑर्डर) जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इनमें बच्चे को अपने आवेग और गुस्से पर नियंत्रण रखने में परेशानी होती है। हालांकि, हर गुस्सैल या जिद्दी बच्चा मानसिक विकार से प्रभावित हो, यह जरूरी नहीं है। सही कारण जानने के लिए विशेषज्ञ से मूल्यांकन कराना जरूरी है।
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डांटने के बजाय व्यवहार सुधारने पर दें ध्यान
बच्चों में आक्रामकता दिखाई देने पर माता-पिता को मारपीट या सख्त सजा का सहारा नहीं लेना चाहिए। बच्चे के साथ बातचीत बढ़ाने, उसकी बात सुनने और अच्छे व्यवहार के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
पेरेंट मैनेजमेंट ट्रेनिंग के माध्यम से माता-पिता को बच्चों के व्यवहार को सकारात्मक तरीके से संभालने के तरीके सिखाए जाते हैं। वहीं, काग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) से बच्चों को गुस्से को पहचानने और अपनी भावनाएं सही तरीके से व्यक्त करने में मदद मिलती है।
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