इंदरजीत की गिरफ्तारी से बर्खास्त राजजीत के सरेंडर तक, 9 साल में खुलीं खाकी-ड्रग्स तस्करी के सांठगांठ की परतें
इंदरजीत सिंह की 2017 में गिरफ्तारी से शुरू हुई जांच में पुलिस तैनाती, नशा मामलों और कथित आर्थिक लेनदेन की ...और पढ़ें

बर्खास्त AIG राजजीत सिंह और इंस्पेक्टर इंद्रजीत सिंह।
HighLights
इंदरजीत सिंह की गिरफ्तारी से शुरू हुआ ड्रग्स मामला।
बर्खास्त एआईजी राजजीत सिंह हुंदल की 9 साल बाद गिरफ्तारी।
पंजाब पुलिस में ड्रग्स तस्करी और भ्रष्टाचार की परतें खुलीं।
रोहित कुमार, चंडीगढ़। पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई के दौरान सामने आया इंदरजीत सिंह प्रकरण सिर्फ एक पुलिस इंस्पेक्टर की गिरफ्तारी की कहानी नहीं है। इसकी शुरुआत पंजाब में ड्रग तस्करी के खिलाफ विशेष अभियान के लिए स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के गठन से हुई और मामला धीरे-धीरे पुलिस तंत्र के भीतर कथित संरक्षण, एनडीपीएस मामलों की जांच में गड़बड़ी, संपत्ति और आर्थिक लेनदेन तक पहुंचा।
इसी जांच में तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारी राजजीत सिंह हुंदल की भूमिका पर सवाल उठे। करीब नौ साल बाद 24 सितंबर 2026 को राजजीत की गिरफ्तारी ने इस पुराने मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है।
ड्रग्स के खिलाफ बनी एसटीएफ
पंजाब में नशे की समस्या को लेकर वर्ष 2017 में राज्य सरकार ने विशेष टास्क फोर्स गठित की। इसका उद्देश्य ड्रग तस्करी के बड़े नेटवर्क, सप्लायर और तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करना था। तत्कालीन आइपीएस अधिकारी हरप्रीत सिंह सिद्धू को एसटीएफ की कमान दी गई।
एसटीएफ ने सामान्य पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ पुराने एनडीपीएस मामलों, आरोपितों के रिकॉर्ड और अदालतों में इन मामलों के परिणामों की पड़ताल शुरू की। मकसद यह पता लगाना था कि बड़ी बरामदगी के बावजूद नशा तस्करी के मामलों में आरोपित अदालतों से क्यों छूट रहे हैं।
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तरनतारन के मामलों ने खड़ा किया बड़ा सवाल
इसी पड़ताल में खासकर तरनतारन समेत कुछ जिलों के मामलों में एक पैटर्न दिखाई दिया। पुलिस रिकॉर्ड में बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थों की बरामदगी थी, लेकिन मुकदमे अदालत में टिक नहीं रहे थे और आरोपित बरी हो रहे थे। एसटीएफ ने मामलों की जांच प्रक्रिया को भी जांच के दायरे में लिया। यहां इंदरजीत सिंह का नाम सामने आया।
जांच में यह सवाल उठा कि एनडीपीएस के गंभीर मामलों की जांच आखिर किस रैंक के अधिकारी से कराई जा रही थी। एसटीएफ के तत्कालीन प्रमुख हरप्रीत सिद्धू ने जून 2017 में कहा था कि एनडीपीएस मामलों की जांच के लिए न्यूनतम रैंक से संबंधित कानूनी प्रावधान हैं, जबकि इंदरजीत सिंह मूल रूप से हेड कांस्टेबल था और उसे ओआरपी व्यवस्था के तहत कार्यवाहक इंस्पेक्टर बनाया गया था।
इंदरजीत कैसे बना जांच की सबसे अहम कड़ी:
- इंदरजीत सिंह को अलग-अलग जगहों पर सीआइए की जिम्मेदारी मिलने और बड़े नशा मामलों की जांच करने की बात जांच में सामने आई। एसटीएफ को संदेह हुआ कि यह केवल पद और नियुक्ति का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क हो सकता है।
- गिरफ्तार आरोपितों और खुफिया इनपुट से मिली जानकारी के आधार पर एसटीएफ ने इंदरजीत के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की।
- जून 2017 में जालंधर और फगवाड़ा में उसके ठिकानों पर छापेमारी हुई।
- छापे में मिला हथियारों और नशे का जखीरा
- छापेमारी के दौरान एसटीएफ ने इंदरजीत के कब्जे से करीब चार किलो हेरोइन, तीन किलो स्मैक, एके-47 राइफल, इटली निर्मित पिस्टल, अन्य हथियार और बड़ी संख्या में कारतूस बरामद करने का दावा किया। इसके अलावा करीब 16.50 लाख रुपये नकद और विदेशी मुद्रा भी बरामद होने की बात सामने आई।
- इंदरजीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।
- इसके बाद पूछताछ में जांच का दायरा बढ़ा। अब सवाल यह था कि एक पुलिस अधिकारी के पास इतनी मात्रा में नशीला पदार्थ और हथियार कैसे पहुंचे और क्या वह अकेले यह पूरा नेटवर्क चला रहा था?
तस्करों से वसूली और केस कमजोर करने के आरोप
जांच एजेंसियों के अनुसार इंदरजीत पर आरोप लगा कि वह नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करने के बाद उनसे कथित तौर पर पैसे वसूलता था। आरोप यह भी थे कि बरामदगी और जांच प्रक्रिया में हेरफेर किया जाता था और कानूनी कमियों के कारण आरोपितों को अदालत में लाभ मिल जाता था।
कुछ मामलों में उस पर तस्करों और उनके परिवारों पर दबाव बनाने तथा संपत्ति अपने नाम कराने के आरोप भी सामने आए। बाद में इसी मामले से जुड़े कथित आर्थिक लेनदेन की जांच मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से भी हुई।
फिर सामने आया राजजीत सिंह का नाम
इंदरजीत की गिरफ्तारी के बाद जांच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारी राजजीत सिंह हुंदल तक पहुंची। जांच में आरोप सामने आया कि राजजीत सिंह जब-जब एसएसपी के पद पर तैनात हुए, इंदरजीत सिंह को अपने साथ तैनात करवाया गया। तरनतारन और मोगा में उसकी तैनाती और सीआइए की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठे।
जांच का मुख्य सवाल था—क्या वरिष्ठ अधिकारियों को इंदरजीत के वास्तविक रैंक और उसके द्वारा की जा रही एनडीपीएस मामलों की जांच की जानकारी थी?
रिटायर्ड डीएसपी जसवंत सिंह के बयानों में भी इंदरजीत की तैनाती और कामकाज को लेकर सवाल उठाए गए।
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STF जांच के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचे राजजीत
एसटीएफ की कार्रवाई आगे बढ़ने पर राजजीत सिंह ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया। उनकी ओर से एसटीएफ प्रमुख हरप्रीत सिंह सिद्धू पर पक्षपात और व्यक्तिगत रंजिश के आरोप लगाए गए।
इसके बाद जांच को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप हुआ और विशेष जांच टीम यानी एसआइटी गठित की गई। इस बदलाव के बाद मामले की जांच का रास्ता बदल गया। एसटीएफ द्वारा शुरू की गई पड़ताल के बाद एसआइटी ने मामले के विभिन्न पहलुओं की जांच की।
एसआइटी की जांच में वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका
एसआइटी की जांच में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई। बाद में हाई कोर्ट में हुई कार्यवाही के दौरान एसआइटी की रिपोर्टों को लेकर चर्चा हुई। रिपोर्टों के आधार पर एक आइपीएस अधिकारी सहित चार वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका को लेकर कार्रवाई की संभावना की बात सामने आई।
हालांकि, एसआइटी ने किन आरोपों पर क्या निष्कर्ष दिया, इसे अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार ही पढ़ा जाना जरूरी है। इस मामले में यह भी महत्वपूर्ण रहा कि हाई कोर्ट ने समय-समय पर जांच की प्रगति और अधिकारियों की भूमिका से जुड़े पहलुओं को देखा।
इंदरजीत के खिलाफ आर्थिक जांच
- इंदरजीत सिंह से जुड़े मामले की एक अलग कड़ी आर्थिक अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच तक पहुंची।
- ईडी की जांच में आरोप सामने आया कि इंदरजीत ने कथित तौर पर नशा मामलों में फंसाने की धमकी देकर कुछ लोगों की संपत्ति अपने नाम कराने का दबाव बनाया। एक मामले में घर की मालिकाना हक से जुड़े आरोप भी जांच में सामने आए।
- इससे जांच का दायरा नशीले पदार्थों और पुलिस भ्रष्टाचार से आगे बढ़कर कथित अवैध संपत्ति और धन के स्रोत तक पहुंच गया।
राजजीत पर विभागीय कार्रवाई
मामला आगे बढ़ने के बाद राजजीत सिंह के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई और उन्हें पंजाब पुलिस से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद वह लंबे समय तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहे। अदालतों में उनकी ओर से गिरफ्तारी और जांच से संबंधित राहत की मांगें की जाती रहीं। करीब तीन साल तक फरार रहने के बाद भी यह मामला खत्म नहीं हुआ। जांच एजेंसियों और अदालतों के समक्ष अलग-अलग स्तर पर कार्यवाही जारी रही।
9 साल बाद फिर केंद्र में राजजीत
- 2017 में इंदरजीत सिंह की गिरफ्तारी से शुरू हुआ यह मामला वर्ष 2023 में एसआइटी की जांच और हाई कोर्ट की कार्यवाही के कारण फिर चर्चा में आया। अब 2026 में राजजीत सिंह की गिरफ्तारी ने इस पूरे प्रकरण की पुरानी कड़ियों को फिर जोड़ दिया है।
- 24 सितंबर 2026 को पंजाब पुलिस ने बर्खास्त एआइजी राजजीत सिंह हुंदल को गिरफ्तार किया। वह लंबे समय से फरार चल रहे थे।
- अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। जांच एजेंसियों को यह स्थापित करना होगा कि इंदरजीत सिंह के कथित ड्रग नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे, उसे किस स्तर से संरक्षण मिलने का आरोप है, कथित आर्थिक लेनदेन किस तक पहुंचा और विभिन्न जांचों में सामने आए तथ्यों का आपस में क्या संबंध है।
सवाल जो आज भी बाकी हैं
इस पूरे प्रकरण ने पंजाब पुलिस की ड्रग मामलों की जांच व्यवस्था पर कई सवाल खड़े किए हैं-
- बड़ी मात्रा में नशा बरामद होने के बाद भी कई मामले अदालत में क्यों कमजोर हुए?
- इंदरजीत सिंह जैसे अधिकारी को गंभीर एनडीपीएस मामलों की जांच की जिम्मेदारी कैसे मिलती रही?
- अलग-अलग जिलों में उसकी तैनाती और सीआइए की जिम्मेदारी के पीछे क्या प्रक्रिया थी?
- वरिष्ठ अधिकारियों को उसकी गतिविधियों की कितनी जानकारी थी?
- कथित ड्रग नेटवर्क से जुड़े पैसों और संपत्तियों का वास्तविक प्रवाह क्या था?
- एसआइटी की रिपोर्ट में जिन अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे, उनके खिलाफ आगे क्या कार्रवाई हुई?
- सबसे अहम सवाल- 2017 में जिस मामले ने पंजाब पुलिस के भीतर ड्रग नेटवर्क की आशंका पैदा की थी, उसका अंतिम न्यायिक निष्कर्ष क्या होगा?
- इंदरजीत सिंह की गिरफ्तारी से शुरू हुई यह जांच अब राजजीत सिंह की गिरफ्तारी तक पहुंच गई है।
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