जितेंद्र झा। विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, क्योंकि यही एक मात्र ऐसा तत्व है जो आम लोगों को स्वयं संप्रभु होने का एहसास प्रदान करता है। विचारधारा सामान्य नागरिक का, समाज का एवं विभिन्न संगठनों आदि का बौद्धिक प्राण तत्व है। विचार एवं विचारधारा ही व्यक्ति के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि व्यवहार व निर्णयों को आधार प्रदान करता है। लोकतंत्र स्वयं एक विचारधारा है जो मूल्य एवं संस्थाओं का रूप धारण कर व्यक्तियों को लोकतांत्रिक जीवनशैली एवं लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्थाओं के निर्माण का विचार प्रदान करती है। जब बात विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की होती है तो उसमें प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता स्वयं ही निहित होती है। चाहे अब वह विचार सहमति की हो अथवा असहमति की, दोनों ही समान रूप से लोकतंत्र में पवित्र है।

असहमति के विचार को ज्यादा महत्व
सत्य तो यह है कि लोकतंत्र को स्वस्थ्य रखने के लिए असहमति के विचार को ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि असहमति की स्वीकार्यता ही लोकतंत्र का प्राण है। अत: असहमति के सेफ्टी वॉल्व की अवधरणा सर्वाधिकारवादी शासन के लिए उचित कथन हो सकता है, परंतु भारत जैसे लोकतंत्र के लिए नहीं। कुछ विचार एवं विचारधारा समाज एवं राष्ट्र के निर्माण एवं कल्याण करने की परिधि को तोड़कर राष्ट्र के विनाश के लिए भी प्रयासरत रहती है। ऐसी विचारधारा को सहमति अथवा असहमति की परिधि से बाहर लाकर देखने की जरूरत होती है। लोकतंत्र की यह कैसी असहमति है जो देश की लोकतांत्रिक संस्था के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति की हत्या के षडयंत्र रचने तक की स्वतंत्रता पाना चाहती है।

किस दिशा में लोकतंत्र
हमारा लोकतंत्र किस दिशा में बढ़ चला है कि प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने वालों को लोकतंत्र और स्वतंत्रता की दुहाई देकर बचाने का मुहिम चल रही है। ऐसा नहीं है कि ये लोग नक्सली एवं षडयंत्र में शामिल ही हैं, परंतु पुलिस ने यदि इन्हें पकड़ा है तो कुछ तो आधार तत्व होगा। कोई भी आंदोलन बिना विचारधारा के जीवित नहीं रह सकता है, तो क्या झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश आदि के जंगलों में कंधों पर हथियार लटकाए अशिक्षित युवा इस नक्सली विचारधारा की रचना करते हैं। नहीं, इन विचारधाराओं की रचना दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों एवं विदेशों में बैठे अतिबौद्धिक लोग करते हैं। इन बौद्धिकों के कलम की स्याही देश के सुदूर जंगलों, छोटे शहरों, कस्बों में छुपे बैठे नक्सली कॉमरेडों तक गोली, बमों, बारूदों द्वारा सिस्टम के लोगों का खून बहाने का रूप धारण कर लेती है।

जातिवाद की विचारधारा
यह कैसी असहमति है जो पिछले करीब 50 वषों से देश में हजारों लोगों की जान ले चुकी है। भारतीय लोकतंत्र तो इतना सहज है कि किसी को जातिवाद की विचारधारा फैलाकर तो किसी को लोकलुभावन नारों द्वारा बेहद कम समय व कम संघर्ष से भी सत्ता के शीर्ष पर बैठा देता है। अर्थात भारतीय लोकतंत्र में सभी के लिए अवसर है, तो फिर नक्सली आंदोलन क्यों? और यदि देश में नक्सली आंदोलन हुआ भी तो अब तक उसका समाधान क्यों नहीं हुआ? सवाल यह है कि आज भारतीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की जीवन की चिंता के बजाए उनके विरुद्ध साजिश करने वाली ताकतों की रक्षा की चिंता समस्त विपक्ष कर रहा है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि गिरफ्तार लोग दोषी ही हैं परंतु जिस मामले में वे शक के दायरे में आए हैं उसकी गंभीरता की चिंता किसी को नहीं है। यदि वे बेकसूर हैं तो कानून उन्हें अवश्य छोड़ देगा। परंतु यदि वे दोषी साबित होंगे तो उनका साथ देने वाले तमाम लोग एवं संस्था भारत के लोकतंत्र एवं लोगों को क्या उत्तर देंगे।

कांग्रेस का सच
नक्सली आंदोलन की उम्र देखकर यह सहज अंदाजा होता है कि इस आंदोलन का समाधान से ज्यादा इसका बना रहना कांग्रेस नेतृत्व के लिए लाभकारी रहा है और आज ऐसे लोगों के पक्ष में शीर्ष कांग्रेसी नेता वकीलों की सर्वोच्च न्यायालय में उतरी फौज स्वयं ही तस्वीर को स्पष्ट कर रही है। इसी देश में फर्जी मामलों में, छोटे-मोटे अपराध आदि के मामलों में वषों से जेल में पड़े लोगों के मानवाधिकार की चिंता किसी को नहीं होती लेकिन ऐसे बेहद संवेदनशील मामलों में गिरफ्तार किए गए लोगों को तुरंत छुड़ाने के लिए इतिहासकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, नेता, पत्रकार आदि सभी एक साथ आगे आ जाते हैं। इन संदिग्धों के पक्ष में उतरी फौज स्वयं बताती है कि यह बहुत बड़ी बात है जिसे ढकने के लिए बेहद तत्परता से लोग सक्रिय हो गए हैं।

भीमा-कोरेगांव
देश के सभी प्रबुद्ध नागरिकों, संस्थाओं के सदस्यों आदि को राजनैतिक एवं वैचारिक असहमति तथा राजनीतिक षडयंत्र में अंतर समझना होगा। भीमा-कोरेगांव के हिंसक घटना के आयोजन का औचित्य स्वयं षडयंत्र का इशारा करती है। राजनैतिक लाभ के लिए असहमति के नए-नए मुद्दे गढ़ कर जातीय एवं सामाजिक टकराव पैदा करना असहमति नहीं हो सकती। भारतीय लोकतंत्र संक्रमणकाल में है क्योंकि 60 वषों तक शासन करने वाला दल अचानक से चली गई सत्ता को अभी तक स्वीकार नहीं कर पाया है। जबकि सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती है। विपक्ष को सकारात्मक राजनीति पर भरोसा रखना चाहिए कि फिर उन्हें सत्ता का मौका भविष्य में मिलेगा। अत: उन्हें रचनात्मक कार्य करना चाहिए न कि षडयंत्रवादी राजनीति, क्योंकि जातीय एवं सामाजिक विभाजन व घृणा की परिस्थिति राजनीतिक बदलाव के समान जल्दी नहीं बदला करती।

सरकार के तीन अंग
लोकतंत्र में सरकार के तीन अंग हैं- विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका। भारतीय लोकतंत्र मजबूत होता जा रहा है एवं विधायिका, कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका के कार्यों का भी लोग परीक्षण करने लगे हैं। लोगों की आस्था, विश्वास एवं समर्थन ने भी न्यायपालिका की न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति को व्यापकता एवं स्वीकार्यता प्रदान की थी। अत: न्यायपालिका के सभी राजनैतिक मामलों के निर्णयों का लोग विश्लेषण करते रहते हैं। इसलिए सरकार और सभी संस्थाओं को लोकतंत्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन पूरी निष्ठा से करना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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Posted By: Kamal Verma