हॉकी हो या क्रिकेट, बेटियों ने तोड़ी रुकावट की हर जंजीर; दे रही हैं अपने सपनों को नई उड़ान
भारतीय महिला हॉकी और क्रिकेट टीमों ने एशिया कप जीतकर सामाजिक बाधाओं और संसाधनों की कमी को पार किया है। ...और पढ़ें

हरमनप्रीत कौर और सुखवीर कौर बनीं प्ररेणा

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
एन नवराही, जागरण, नई दिल्ली। सपनों की जीत। किसी मां ने बेटी को घर से दूर भेजते हुए आंसू छिपाए, किसी पिता ने लोगों के तानों के बीच बेटी के हाथ में हॉकी थमाई और किसी बेटी ने चीड़ की लकड़ी के बल्ले से अपने सपनों की पहली पारी खेली। रास्ते आसान नहीं थे, लेकिन इन बेटियों ने हर मुश्किल के बीच खेलना जारी रखा और आज देश की जर्सी में एशिया कप की जीत का हिस्सा हैं। सुखवीर, कृष्णा, गीता, रेणुका और प्रेमा की कहानियां सिर्फ मैदान पर मिली जीत की नहीं, उन परिवारों के भरोसे और बदलते सोच की भी हैं, जिन्होंने बेटियों के सपनों को उड़ान दी, बता रहे हैं एन नवराही।
कभी रिश्तेदारों ने कहा- लड़की है, उसे घर का काम सिखाओ। कभी सवाल उठा- लड़की को हॉकी क्यों खिला रहे हो? किसी के पास महंगा बल्ला खरीदने के पैसे नहीं थे तो किसी ने कपड़े की गेंद से क्रिकेट खेलकर शुरुआत की, लेकिन इन बेटियों ने तानों, सीमित संसाधनों और मुश्किल परिस्थितियों को अपने सपनों के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया। हॉकी और क्रिकेट में एशिया कप की जीत में इन बेटियों की मौजूदगी बताती है कि महिला खेलों की कहानी अब सिर्फ पदक और ट्रॉफी की नहीं, बदलते सोच की भी कहानी है।
हाल ही में भारतीय महिला क्रिकेट टीम और जूनियर महिला हॉकी टीम की एशिया कप में सफलता ने इस बदलाव को फिर सामने रखा। जूनियर महिला हॉकी टीम ने खैदेम शैलेमा चानू की कप्तानी में चीन को 1-0 से हराकर खिताब अपने नाम किया। फाइनल में सानिका चंद्रकांत माने ने 17वें मिनट में निर्णायक गोल किया। इस जीत के साथ भारतीय टीम ने लगातार तीसरी बार जूनियर महिला एशिया कप जीता और जूनियर महिला विश्व कप के लिए भी क्वालीफाई किया, जबकि भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने हरमनप्रीत कौर की कप्तानी में श्रीलंका को हराकर खिताब जीता। महिला जूनियर एशिया कप 2026 (हॉकी) 4 से 13 सितंबर तक चीन के हुलुनबुइर शहर में, जबकि महिला एशिया कप 2026, 28 अगस्त से 13 सितंबर तक संयुक्त अरब अमीरात के दुबई स्थित दुबई अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में खेला गया था। इन जीतों को केवल स्कोरबोर्ड पर दर्ज आंकड़ों के रूप में देखना इनकी असली कहानी को छोटा कर देगा। इन खिलाड़ियों के सफर में कहीं मां का संघर्ष है, कहीं पिता का भरोसा, कहीं कोच का मार्गदर्शन और कहीं समाज के तानों को पीछे छोड़ने का संकल्प।
सुखवीर कौर: घर के काम से देश की जर्सी तक
करीब 11 साल पहले बठिंडा के छोटे किसान चमकौर सिंह की बेटी सुखवीर कौर हॉकी खेलने के लिए घर से बाहर निकल रही थीं। तब रिश्तेदारों की बातें परिवार तक पहुंचती थीं- लड़की है, उसे घर का काम सिखाओ, खेलों में लड़कियों का क्या काम? घर की आर्थिक स्थिति भी सामान्य थी। खेती से होने वाली आमदनी से परिवार का गुजारा चलता था। ऐसे में बेटी को खेल के लिए घर से दूर भेजना आसान फैसला नहीं था, लेकिन माता-पिता ने लोगों की बातों से ज्यादा बेटी की आंखों में पल रहे सपने पर भरोसा किया। पांचवीं कक्षा में ही सुखवीर को पढ़ाई के साथ हॉकी की ट्रेनिंग के लिए बठिंडा भेज दिया गया। पंजाब इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स के इंचार्ज रजवंत ने उनकी प्रतिभा पहचानी और प्रशिक्षण शुरू करवाया। घर से दूर रहकर पढ़ाई और खेल को साथ लेकर चलना आसान नहीं था। मैदान पर घंटों अभ्यास, फिटनेस और अनुशासन उनकी दिनचर्या बन गए।
कई बार मन में सवाल आता था कि क्या वह कभी भारतीय टीम की जर्सी पहन पाएंगी, लेकिन माता-पिता ने उनका हौसला नहीं टूटने दिया। जूनियर स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए जूनियर विश्व कप तक पहुंचीं और करीब तीन वर्ष पहले भारतीय महिला हॉकी टीम में जगह बनाई। अब चीन में एशिया कप जीतने वाली टीम का हिस्सा बनकर सुखवीर के लिए वह सपना सच हो चुका है। वह कहती हैं, ‘जब देश की जर्सी पहनकर मैदान में उतरती हूं तो बचपन से अब तक का पूरा सफर आंखों के सामने आ जाता है। माता-पिता का संघर्ष, घर से दूर रहकर की गई ट्रेनिंग और मैदान पर बिताए घंटे सब याद आते हैं।’ अब उनकी नजर विश्व कप पर है।
कृष्णा शर्मा: तानों को बनाया शक्ति
ग्वालियर की कृष्णा शर्मा की कहानी भी समाज के उस सोच से टकराती है, जिसमें बेटियों के लिए खेल को अक्सर प्राथमिकता नहीं दी जाती थी। वर्ष 2016 में महज 10 साल की उम्र में कृष्णा ने हॉकी खेलने की जिद की। घर में खेल का माहौल नहीं था और उनके पिता सुनील शर्मा अपना सिक्योरिटी एजेंसी का व्यवसाय शुरू करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। लोगों ने सवाल उठाए कि लड़की को हॉकी क्यों खिला रहे हो, पढ़ाई पर ध्यान दिलाओ, लेकिन पिता, चाचा दिलीप शर्मा और परिवार ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। कृष्णा ने भी धूप-सर्दी की परवाह किए बिना अभ्यास जारी रखा। वर्ष 2018 में मध्यप्रदेश राज्य महिला हॉकी अकादमी में उनका चयन हुआ। कोच परमजीत सिंह और वंदना उइके ने उनकी प्रतिभा को तराशा। राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन के बाद भारतीय जूनियर कैंप में जगह मिली और फिर टीम में चयन हुआ।
एशिया कप जीतने के बाद कृष्णा ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा, ‘जब मैं छोटी सी साइकिल से कंपू ग्राउंड प्रैक्टिस के लिए जाती थी, तब कभी नहीं सोचा था कि एक दिन देश के लिए एशिया कप जीतूंगी।’ अब वह भारतीय सीनियर टीम में जगह बनाकर ओलंपिक में भारत के लिए पदक लाने का लक्ष्य रखती हैं।
गीता यादव: बोड़ला की गलियों से चीन तक
छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के बोड़ला की गीता यादव ने करीब आठ वर्ष पहले हॉकी स्टिक थामी थी। खेती-किसानी से जुड़े परिवार की इस बेटी के सामने संसाधनों की कमी थी, लेकिन परिवार ने उसके सपने को आगे बढ़ने दिया। जुलाई 2022 में बिलासपुर स्पोर्ट्स अकादमी में चयन उनके सफर का महत्वपूर्ण मोड़ बना। बेहतर प्रशिक्षण और अभ्यास से उनके खेल में निखार आया। वर्ष 2023 में वह देश की शीर्ष 16 खिलाड़ियों में जगह बनाने में सफल रहीं और उन्हें 6.20 लाख रुपये की स्कॉलरशिप मिली। इसके बाद 88 खिलाड़ियों वाले इंडिया कैंप में जगह बनाकर उन्होंने खुद को साबित किया और भारतीय जूनियर महिला टीम में चयन हासिल किया।
एशिया कप में गीता ने टीम का हिस्सा बनने के साथ अपने खेल से भी प्रभाव छोड़ा। जापान के खिलाफ भारत की 7-0 की जीत में उन्होंने दो गोल किए और प्लेयर ऑफ द मैच चुनी गईं। इस टीम की कप्तानी खैदेम शैलेमा चानू कर रही थीं। चीन के खिलाफ फाइनल में भारत की जीत का एकमात्र गोल सानिका चंद्रकांत माने ने किया। इस तरह कप्तान की अगुआई और पूरी टीम के सामूहिक प्रदर्शन ने भारत को लगातार तीसरी बार चैंपियन बनाया।
रेणुका ठाकुर: मां के संघर्ष ने दी उड़ान
शिमला में रोहड़ू के छोटे गांव पारसा से भारतीय महिला क्रिकेट टीम तक पहुंची तेज गेंदबाज रेणुका ठाकुर की कहानी में सबसे बड़ा अध्याय उनकी मां सुनीता ठाकुर के संघर्ष का है। रेणुका महज तीन वर्ष की थीं, जब उनके पिता केहर सिंह ठाकुर का निधन हो गया। परिवार की जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। 1500 रुपये मासिक वेतन वाली अस्थायी सरकारी नौकरी के सहारे सुनीता ने बेटे विनोद और बेटी रेणुका की परवरिश की। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उन्होंने बेटी को क्रिकेट खेलने से कभी नहीं रोका। रेणुका की शुरुआत गांव के एक छोटे से मैदान से हुई। वह अपने बड़े भाई विनोद के साथ लड़कों के बीच क्रिकेट खेलती थीं। कई बार घर में बनाए बल्ले और कपड़े की गेंद से भी खेला। क्रिकेट से परिवार का रिश्ता पहले से था। रेणुका के पिता क्रिकेट के प्रशंसक थे और उन्होंने अपने बेटे का नाम क्रिकेटर विनोद कांबली के नाम पर रखा था।
चाचा भूपिंदर ठाकुर ने रेणुका की प्रतिभा पहचानी और उनके मार्गदर्शन में उन्हें हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ की महिला आवासीय क्रिकेट अकादमी में प्रशिक्षण मिला। 2021 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टी-20 अंतरराष्ट्रीय पदार्पण और 2022 राष्ट्रमंडल खेलों में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चार विकेट के प्रदर्शन ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। गांव के मैदान से शुरू हुआ सफर अब एशिया कप जैसे बड़े मंच तक पहुंच चुका है।
प्रेमा रावत: जुनून की कहानी
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील के सुमटी गांव की प्रेमा रावत की क्रिकेट कहानी भी संसाधनों से ज्यादा जुनून की कहानी है। सात वर्ष की उम्र में उन्होंने भाइयों और गांव के साथियों के साथ क्रिकेट खेलना शुरू किया। उस समय महंगा बल्ला या गेंद नहीं थी। चीड़ की लकड़ी से बल्ला तैयार होता और गांव का मालूखेत मैदान उनका क्रिकेट स्टेडियम था। कक्षा चार तक गांव में पढ़ाई करने के बाद एयरफोर्स में कार्यरत पिता केदार सिंह उन्हें अपने साथ जोधपुर ले गए। जोधपुर में प्रेमा ने हॉकी खेली और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं, लेकिन कक्षा नौवीं में उन्होंने तय किया कि उनका भविष्य क्रिकेट में है। पिता ने इस फैसले पर भरोसा किया और बरेली की क्रिकेट अकादमी में प्रशिक्षण दिलाया। बाद में बागेश्वर लौटकर वह क्रिकेट क्लब ऑफ बागेश्वर से जुड़ीं।
कॉलेज की पढ़ाई के साथ क्रिकेट का अभ्यास उनकी दिनचर्या का हिस्सा बना रहा। कॉलेज से लौटते ही स्टेडियम पहुंचना, अभ्यास करना और फिर पढ़ाई पूरी करना आसान नहीं था, लेकिन लक्ष्य स्पष्ट था। आज एशिया कप में भारत का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी प्रेमा अपनी जड़ों से जुड़ी हैं। गांव लौटती हैं तो गाय-भैंसों की देखभाल करती हैं, खेत में घास काटती हैं और घर के कामों में परिवार का हाथ बंटाती हैं। उनका कहना है, ‘अपनी बोली, भाषा, संस्कृति और परंपराओं को साथ रखते हुए भी जीवन में नया लक्ष्य तय किया जा सकता है।’
कप्तानों ने बदली तस्वीर
जूनियर महिला हॉकी टीम की कप्तान खैदेम शैलेमा चानू और भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर इन जीतों में नेतृत्व की भूमिका में रहीं। हॉकी फाइनल में सानिका माने का गोल भारत की जीत का निर्णायक क्षण बना। कप्तान शैलेमा चानू के नेतृत्व में टीम ने चीन को 1-0 से हराकर लगातार तीसरी बार खिताब जीता। इन दोनों टीमों की जीत इसलिए भी खास है कि इसमें अलग-अलग भूमिकाओं में कई महिला खिलाड़ी सामने आईं।
बदलते खेल बदलता सोच
महिला खिलाड़ियों की यह सफलता केवल क्रिकेट और हॉकी तक सीमित नहीं है। मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, जूडो और एथलेटिक्स जैसे खेलों में भी भारतीय महिलाओं ने हाल के वर्षों में अपनी मौजूदगी और उपलब्धियों से पहचान बनाई है। इन बेटियों की जीत का अर्थ इसलिए स्कोरबोर्ड से बड़ा है, क्योंकि इनके पीछे उन परिवारों की सोच बदल रही है, जो अब बेटियों को खेलते हुए देखकर केवल यह नहीं पूछते कि ‘लड़की खेल क्यों रही है?’ बल्कि उनके सपनों को देखकर यह सोचने लगे हैं कि ‘वह खेल में कितनी दूर जा सकती है?’
पूजा मलिक: मैदान दूर तो बदला घर
हिसार के उमरा गांव की पूजा मलिक के लिए हॉकी का सफर परिवार के छोटे-छोटे फैसलों से आगे बढ़ा। आठ साल की उम्र में पिता राजेश मलिक उन्हें गांव के मैदान में हॉकी का अभ्यास कराने ले जाते थे। उनका सपना था कि बेटी एक दिन भारतीय टीम की जर्सी पहनकर ओलिंपिक में देश के लिए पदक जीते। बीमारी से पिता का निधन हुआ, उस समय पूजा महज 10 वर्ष की थीं, लेकिन मां मंजू मलिक ने उनका खेल नहीं रुकने दिया। उमरा से हिसार आकर रोज अभ्यास करना मुश्किल हुआ तो करीब पांच साल पहले परिवार ने जवाहर नगर में एस्ट्रोटर्फ मैदान के पास किराये का घर ले लिया। खेल का खर्च बढ़ा तो मां ने सिलाई-कढ़ाई शुरू कर दी। बाद में साई केंद्र में कोच आजाद सिंह मलिक के मार्गदर्शन में पूजा ने प्रशिक्षण लिया।
अब 19 वर्षीय पूजा भारतीय जूनियर हॉकी टीम के साथ एशिया कप का स्वर्ण जीत चुकी हैं। मिडफील्डर के रूप में उन्होंने टूर्नामेंट में तीन गोल किए। वह सीनियर नेशनल में भी स्वर्ण जीत चुकी हैं और अब भारतीय सीनियर टीम में जगह बनाने के साथ ओलिंपिक में देश के लिए पदक जीतना उनका लक्ष्य है।
इनपुट: कवर्धा से जीवन यादव, बागेश्वर से घनश्याम जोशी, रोहड़ू (शिमला) से दशमी रावत, ग्वालियर से सचिन श्रीवास्तव, बठिंडा से गुरप्रेम लहरी, हिसार से सुभाष चंद्र
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