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बड़ी बहन से प्रेरित होकर अनाहत ने थामा था स्क्वॉश रैकेट, माता-पिता के त्याग के दम पर रचा इतिहास

By Shekhar JhaEdited By: Abhishek Upadhyay
Published: Mon, 28 Sep 2026 10:10 AM (IST)

भारतीय युवा स्क्वॉश खिलाड़ी अनाहत सिंह ने आइची-नागोया में एशियाई खेलों की महिला सिंगल्स में रजत पदक जीता, हालांकि फाइनल ...और पढ़ें

अनाहत सिंह ने जीता सिल्वर मेडल

अनाहत सिंह ने जीता सिल्वर मेडल

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शेखर झा, जागरण, नई दिल्ली: आइची-नागोया में आयोजित एशियाई खेलों में भारतीय युवा स्क्वाश खिलाड़ी अनाहत सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए महिला सिंगल्स में रजत पदक अपने नाम किया। 18 वर्षीय अनाहत को रविवार को फाइनल मुकाबले में मलेशिया की शिवासांगरी सुब्रमण्यम के विरुद्ध 4-11, 4-11, 7-11 से हार का सामना करना पड़ा। अनाहत की इस सफलता के पीछे उनके परिवार के लंबे संघर्ष और त्याग की भी अहम भूमिका रही है।

उनकी मां तानी वढेरा सिंह ने बेटी के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि अनाहत को बचपन से ही खेलों में काफी रुचि थी। वह स्कूल में लगभग हर खेल में हिस्सा लेती थीं। शुरुआत में अनाहत का झुकाव बैडमिंटन की ओर था। वह छोटी उम्र में पीवी सिंधू और दूसरे खिलाड़ियों को खेलते हुए देखती थीं और उनसे काफी प्रभावित थीं।

दिलचस्प रही शुरुआत

अनाहत के स्क्वॉश खेलने की शुरुआत भी काफी दिलचस्प रही। उनकी बहन अमीरा पहले से स्क्वॉश खेलती थीं। जब परिवार अमीरा के साथ टूर्नामेंट के लिए यात्रा करता था, तब अनाहत भी उनके साथ जाना चाहती थीं। इसी दौरान उन्होंने स्क्वॉश को थोड़ा-थोड़ा खेलना शुरू किया। जल्द ही उन्हें यह खेल पसंद आने लगा। कुछ समय तक अनाहत बैडमिंटन और स्क्वॉश दोनों खेलती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे उनका पूरा ध्यान स्क्वॉश पर केंद्रित हो गया।

उनकी मां के मुताबिक, बैडमिंटन कोच विकास शर्मा ने भी अनाहत को काफी प्रोत्साहित किया। वह उन्हें लगातार भारत के लिए खेलने और खेल को गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित करते थे। कम उम्र में ही अनाहत के मन में देश के लिए खेलने और पदक जीतने का सपना बस गया था।

ओलंपिक क्वालीफिकेशन पर नजर

रजत पदक जीतने के बाद अब अनाहत का अगला लक्ष्य अपनी विश्व रैंकिंग में सुधार करना है। उनकी मां ने बताया कि परिवार का ध्यान अब उनकी रैंकिंग बेहतर करने पर है, ताकि वह ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर सकें। इसके अलावा राष्ट्रमंडल खेलों में भी उनसे पदक की उम्मीद है। तानी ने कहा कि अनाहत अभी काफी युवा हैं और उनके खेल में सुधार की काफी गुंजाइश है। उन्हें कई पहलुओं पर अभी काम करना है। परिवार का लक्ष्य जल्दबाजी करने के बजाय धीरे-धीरे उनकी कमजोरियों को दूर करना और उनके खेल को मजबूत बनाना है।

बेटी के लिए पिता ने कम की वकालत की प्रैक्टिस

अनाहत की सफलता के पीछे उनके माता-पिता का त्याग भी कम नहीं है। उनके पिता गुरशरण सिंह पेशे से वकील हैं और पूर्व हॉकी खिलाड़ी भी रहे हैं। बेटी की ट्रेनिंग और टूर्नामेंट के लिए उन्हें अपनी वकालत की प्रैक्टिस काफी कम करनी पड़ी। तानी ने बताया कि अनाहत छोटी उम्र से ही खेल रही हैं और साल में करीब 10 से 15 जूनियर और सीनियर टूर्नामेंट खेलती हैं। ऐसे में उन्हें लगातार यात्रा करनी पड़ती है। अनाहत अकेले यात्रा नहीं कर सकती थीं, इसलिए उनके पिता ज्यादातर टूर्नामेंट में उनके साथ जाते थे। कई बार काम से समय निकालकर मैं भी बेटी के साथ यात्रा करती थी।

तानी ने बताया कि किसी भी खिलाड़ी के करियर के शुरुआती साल परिवार के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होते हैं। जब तक खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर पहचान नहीं बनाता, तब तक पूरा खर्च परिवार को ही उठाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि अनाहत के शुरुआती सात-आठ साल काफी मुश्किल रहे। परिवार ने उनकी ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं से जुड़े सभी खर्च खुद उठाए और हर जगह उनके साथ यात्रा की। इससे कई बार उनकी प्रैक्टिस और परिवार के कामकाज पर भी असर पड़ा।

हालांकि, अनाहत के प्रदर्शन में सुधार के साथ अब उन्हें सरकार, जेएसडब्ल्यू और अन्य संस्थाओं से सहयोग मिल रहा है। तानी का कहना है कि बेटी के लिए किए गए सभी त्याग अब सार्थक लगते हैं। परिवार का पूरा ध्यान अनाहत के खेल को और बेहतर बनाने और उनके बड़े लक्ष्यों की ओर आगे बढ़ने पर है।

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