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ओडिशा के इस मंदिर में 16 दिनों की होती है नवरात्र, भुनी हुई मछली का लगाया जाता है भोग; कैसे पहुंचें?

Published: Sat, 17 Oct 2026 03:06 PM (IST)

ओडिशा के पुरी स्थित प्रसिद्ध रामचंडी मंदिर में नवरात्र 16 दिनों तक 'सोला पूजा' के रूप में मनाया जाता है, ...और पढ़ें

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HighLights

  1. पुरी के रामचंडी मंदिर में 16 दिनों का नवरात्र उत्सव।

  2. देवी को भुनी हुई मछली का विशेष भोग चढ़ाने की परंपरा।

  3. भगवान राम और कालापहाड़ से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं।

डिजिटल डेस्क,भुवनेश्वर। देशभर में नवरात्र 9 दिनों तक मनाया जाता है, लेकिन ओडिशा के पुरी जिले में स्थित प्रसिद्ध रामचंडी मंदिर में यह परंपरा बिल्कुल अनूठी है। कोणार्क से महज 5 किलोमीटर दूर स्थित इस शक्तिपीठ में नवरात्र पूरे 16 दिनों तक चलता है।

इस 16 दिवसीय अनुष्ठान को स्थानीय परंपरा में 'सोला पूजा' या 'पार्वण पूजा' के नाम से जाना जाता है। मूलाष्टमी से शुरू होकर महाष्टमी तक चलने वाले इस महाउत्सव में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना, विशेष भोग और अद्वितीय अनुष्ठानों का विधान है।

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समय के साथ प्राकृतिक आपदाओं ने इसके एक बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया है, फिर भी अपनी पवित्रता के कारण, यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

16 दिनों की विशेष पूजा और परंपराएं

उत्सव की शुरुआत 108 कलशों के जल से मां के भव्य अभिषेक और अखंड ज्योति की स्थापना के साथ होती है।

इन 16 दिनों के दौरान देवी रामचंडी को भुवनेश्वरी, मातंगी, महाकाली और महिषामर्दिनी समेत कई प्रमुख रूपों में सजाया जाता है।

दिन में दो बार चंडी पाठ, मछली की बलि

सामान्यतः देवी पीठों में दिन में एक बार चंडी पाठ की परंपरा होती है, लेकिन रामचंडी मंदिर में दोपहर और रात दोनों समय चंडी पाठ का आयोजन किया जाता है।

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माता को प्रतिदिन खिचड़ी, दाल, चावल, तरह-तरह के पीठा और खीर अर्पित की जाती है। इसके अतिरिक्त, प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार, कुशभद्रा नदी से मछुआरों द्वारा लाई गई भुनी हुई मछली का भोग भी देवी को चढ़ाया जाता है।

मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक व पौराणिक मान्यताएं

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने हेतु युद्ध से पहले इस स्थान पर देवी चंडी की कठिन तपस्या की थी। प्रभु राम द्वारा पूजे जाने के कारण ही इस धाम का नाम 'रामचंडी' पड़ा।

कालापहाड़ से रक्षा की लोककथा

लोकगाथा के अनुसार,17वीं शताब्दी में कालापहाड़ नाम के एक हिंदू ब्राह्मण ने इस्लाम अपना लिया और सभी हिंदू मंदिरों को नष्ट करने की कसम खाई।

उसने रामचंडी मंदिर के आगे स्थित सूर्य मंदिर को तो काफी हद तक नुकसान पहुंचाने में सफल रहा, लेकिन रामचंडी मंदिर को नष्ट नहीं कर सका।

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कथा है कि जब कालापहाड़ ने मंदिर को नष्ट करने का प्रयास किया, तब माता रामचंडी एक दासी का वेश धारण कर मंदिर से बाहर निकल आईं और कुशभद्रा नदी में अंतरध्यान हो गईं, जिससे मंदिर की पवित्रता सुरक्षित रही।

देवी रामचंडी ने अपने एक समर्पित भक्त के सपने में आकर उसे कुसाभद्रा नदी के किनारे अपना एक और मंदिर बनाने का आदेश दिया। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह वही मंदिर है जिसे उस भक्त ने बनवाया था।

पुरी के रामचंडी मंदिर की वास्तुकला

रामचंडी मंदिर का निर्माण ओडिशा की पारंपरिक वास्तुकला शैली में किया गया है। उत्तर की ओर मुख वाला यह मंदिर दो भागों से बना है - एक 'विमान' और दूसरा 'जगमोन'।

जगमोन के सामने एक खुला मंडप है। यह मंदिर ईंटों, बलुआ पत्थर (सैंडस्टोन) और लैटेराइट पत्थरों से बना है।

गर्भगृह के भीतर, देवी चंडी की प्रतिमा कमल के फूल पर बैठी हुई मुद्रा में देखी जा सकती है, जो आंशिक रूप से रेत के टीलों से ढकी हुई है।

पुरी के रामचंडी मंदिर का समय और प्रवेश शुल्क

पुरी के रामचंडी मंदिर में जाने के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। यह मंदिर सप्ताह के सातों दिन, सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है।

रामचंडी मंदिर तक कैसे पहुंचें?

रामचंडी मंदिर के सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन 'पुरी रेलवे स्टेशन' है, जो मंदिर से लगभग 26.4 किमी दूर है। सड़क मार्ग से मंदिर तक पहुंचने में लगभग 48 मिनट का समय लगता है।

इसके अलावा, भुवनेश्वर स्थित 'बीजू पटनायक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा' मंदिर के सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है, जो यहां से लगभग 78.2 किमी दूर है।

पर्यटक भुवनेश्वर एयरपोर्ट से किसी प्राइवेट कैब के जरिए आसानी से पुरी पहुंच सकते हैं, या फिर बस से भी जा सकते हैं। पुरी रेलवे स्टेशन या शहर के किसी भी हिस्से से इस मंदिर तक जाने के लिए आप प्राइवेट टैक्सी या ऑटो रिक्शा ले सकते हैं।

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