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गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल, शिमला के जाखू मंदिर में 20 सालों से रावण के पुतले बना रहे मेरठ के मुस्लिम कारीगर

Published: Sat, 17 Oct 2026 01:24 PM (IST)

मेरठ के मुस्लिम कारीगर पिछले 20 सालों से शिमला के जाखू मंदिर में दशहरे के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले बना रहे हैं।

जाखू में 20 साल से रावण के पुतले बना रहे मेरठ के मुस्लिम का कारीगर (जागरण फोटो)

जाखू में 20 साल से रावण के पुतले बना रहे मेरठ के मुस्लिम का कारीगर (जागरण फोटो)

HighLights

  1. मेरठ के मुस्लिम कारीगर 20 साल से बना रहे दशहरे के पुतले

  2. शिमला के जाखू मंदिर में रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद के पुतले

  3. यह परंपरा सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल है

जागरण संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के ऐतिहासिक जाखू मंदिर में दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन आकर्षण का केंद्र रहता है। इन विशाल पुतलों को तैयार करने के पीछे मेरठ से आए मुस्लिम कारीगरों की मेहनत भी जुड़ी है।

पिछले करीब 20 वर्षों से मुस्लिम कारीगर हिंदुओं के प्रमुख त्योहार दशहरे के लिए पुतले तैयार कर रहे हैं। आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की यह परंपरा गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश कर रही है।

मेरठ के कारीगर मोहम्मद अजीम पिछले करीब 20 साल से जाखू मंदिर में दशहरे के लिए पुतले बनाने का काम कर रहे हैं। इन दिनों वह अपने साथियों के साथ पुतलों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। कारीगरों के मुताबिक, विशाल पुतलों को तैयार करने में करीब एक महीने का समय लगता है। इस दौरान दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है और कई बार काम करते हुए चोटें भी लग जाती हैं।

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इस बार जाखू मंदिर में रावण का पुतला 45 फीट ऊंचा होगा, जबकि कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों की ऊंचाई करीब 40-40 फीट रखी गई है। इन पुतलों को तैयार करने के लिए खास तकनीक, अनुभव और कड़ी मेहनत की जरूरत होती है।

मोहम्मद अजीम ने बताया कि उनकी टीम जाखू मंदिर के अलावा शिमला के सुन्नी, संकटमोचन और अन्य क्षेत्रों के साथ जुन्गा में भी दशहरे के लिए पुतले तैयार करती है। इन दिनों कारीगर जाखू मंदिर परिसर में रहकर पुतलों को तैयार कर रहे हैं। अजीम के अनुसार, मंदिर में उनके रहने और खाने की व्यवस्था भी की जाती है। इस काम से उन्हें रोजगार मिलता है और परिवार का पालन-पोषण होता है।

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दो दशक में नहीं हुई कोई परेशानी

मोहम्मद अजीम का कहना है कि वह पिछले 20 वर्षों से शिमला आ रहे हैं, लेकिन इस दौरान उन्हें कभी किसी तरह की परेशानी महसूस नहीं हुई। यहां उन्हें लोगों का सहयोग और अपनापन मिला है।

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वह हिंदुओं के त्योहार के लिए पुतले तैयार करते हैं और आपसी मेल-जोल के साथ अपना काम करते हैं। अजीम ने कहा कि कुछ लोग समाज में गलतफहमियां और आपसी दूरियां पैदा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन लोगों को ऐसी बातों से बचना चाहिए। सभी धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों का सम्मान करना चाहिए और मिल-जुलकर रहना चाहिए। उनका मानना है कि आपसी सद्भाव और भाईचारे से ही समाज में प्रेम और एकता बनी रह सकती है।