17 साल बाद महालया पर बना शनि अमावस्या का महासंयोग, ओडिशा में पितरों के तर्पण के लिए उमड़ी भीड़
ओडिशा में 17 साल बाद महालया और शनि अमावस्या का दुर्लभ महासंयोग बना है, जहां पितरों की शांति और शनि ...और पढ़ें

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।
HighLights
17 साल बाद महालया-शनि अमावस्या का दुर्लभ संयोग।
पितरों की शांति व शनि दोष मुक्ति हेतु पूजा।
ओडिशा में देवी पक्ष व दुर्गा पूजा का आरंभ।
संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल (ओडिशा)। ओडिशा की पावन धरा आज एक अनूठे और अत्यंत दुर्लभ आध्यात्मिक संयोग की साक्षी बन रही है।
आज 10 अक्टूबर 2026 को आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर महालया (सर्वपितृ अमावस्या) और शनि अमावस्या का महासंयोग बना है।
ज्योतिषविदों के मुताबिक, ऐसा दुर्लभ संयोग करीब 17 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद देखने को मिला है। इस महामुहूर्त पर जहां एक ओर पितरों की तृप्ति के लिए नदियों और समुद्र तटों पर श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा है, वहीं दूसरी ओर शनिदेव की विशेष पूजा-अर्चना से पूरा प्रदेश भक्तिमय हो उठा है।
17 वर्षों का दुर्लभ संयोग
ओडिशा की संस्कृति में महालया का स्थान बेहद विशिष्ट है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महालया केवल पितृ पक्ष के समापन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह 'देवी पक्ष' की शुरुआत का उद्घोष भी है। आज ही के दिन महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा का गज (हाथी) पर सवार हो कर पृथ्वी पर आगमन हो रहा है।
उड़ीसा की स्थानीय परंपराओं में इस दिन को लेकर एक गहरी मान्यता जुड़ी हुई है:
'बड़ बड़ुआ हो...' की गूंज
ओडिशा के पारंपरिक गांवों में आज शाम को 'काउंरिया काठी' (पटसन की सूखी लकड़ियों) को जलाकर पितरों को आकाश मार्ग दिखाने की परंपरा निभाई जा रही है।
श्रद्धालु जलती लकड़ियों से धुंआ करते हुए "बड़ बड़ुआ हो, अंधार रे आस, आलो रे जाओ, बाईसी पाहाच रे गड़ागड़ि थाओ" (हे पूर्वजों, अंधेरे में आएं, प्रकाश में जाएं और जगन्नाथ मंदिर की बाईस सीढ़ियों पर विश्राम करें) का पवित्र मंत्रोच्चार कर रहे हैं।
शनिदेव और पितृदोष से मुक्ति
शनिवार के दिन अमावस्या होने के कारण इस तिथि का महत्व कई गुना बढ़ गया है। माना जाता है कि इस दिन किया गया तर्पण न केवल तीन पीढ़ियों के पितरों को मोक्ष प्रदान करता है, बल्कि जातक को शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के कुप्रभावों से भी मुक्ति दिलाता है।
वर्तमान की स्थिति: घाटों पर आस्था का जनसैलाब और बदली व्यवस्था
आज सुबह तड़के 4 बजे से ही ओडिशा के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी जा रही है। श्रीक्षेत्र पुरी के जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार और पवित्र 'बाईसी पाहाच' (22 सीढ़ियों) पर हजारों श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों को पिंडदान और 'तिल-तर्पण' अर्पित किया है।
महाप्रभु के दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी हैं। पुरी के समुद्र तट पर सुबह से ही हजारों लोगों ने पवित्र स्नान कर सूर्य देव और पितरों को जलांजलि दी है। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।
भुवनेश्वर के ऐतिहासिक बिंदुसागर घाट पर भोर से ही वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहा है। स्थानीय प्रशासन ने घाटों पर लाइटिंग और बैरिकेडिंग की पुख्ता व्यवस्था की है।
डिजिटल युग में बदली पूजा की पद्धति
वर्तमान समय में आधुनिकता और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। अनुगुल, ढेंकानाल, व अन्य जिलों सहित कटक भुवनेश्वर जैसे शहरी क्षेत्रों में कई युवा जो घाटों तक नहीं पहुंच सके, उन्होंने घर पर ही पंडितों के मार्गदर्शन में ऑनलाइन (वेबकैम के जरिए) तर्पण विधि संपन्न की।
वहीं, सोशल मीडिया पर सुबह से ही 'शुभ महालया' और शनि अमावस्या के संदेशों की बाढ़ आई हुई है।
प्रशासन मुस्तैद, शाम को सजेगा मां का दरबार
इस महासंयोग को देखते हुए राज्य प्रशासन और पुलिस बल पूरी तरह मुस्तैद हैं। पुरी और भुवनेश्वर में यातायात के विशेष नियम लागू किए गए हैं ताकि श्रद्धालुओं को असुविधा न हो।
महालया के समापन के साथ ही आज शाम से ओडिशा के कटक, भुवनेश्वर ,अनुगुल, ढेंकानाल व अन्य जिलों सहित पुरी के प्रसिद्ध पूजा पंडालों में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाओं के चक्षु उन्मीलन (आंखें खोलने) की रस्म के साथ ही शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा का शंखनाद हो जाएगा।
धर्म और आस्था के इस अनूठे पर्व ने आज ओडिशा को पूरी तरह भक्ति के रंग में सराबोर कर दिया है।
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