ओडिशा का कड़वा सच: लचर-पचर सिस्टम से जच्चा लाचार, प्रसव के बाद नहीं पहुंची एंबुलेंस तो नवजात को गोद में लेकर 3 किमी पैदल चली मां
ओडिशा के क्योंझर जिले में सड़क न होने के कारण एक प्रसूता को अपनी नवजात बच्ची को गोद में लेकर ...और पढ़ें

प्रसव के बाद गुरुवार सुबह महिला को नवजात बच्ची को गोद में लेकर करीब तीन किलोमीटर दूर खड़ी एंबुलेंस तक संकरी कच्ची पगडंडी से पैदल जाना पड़ा।
HighLights
गांव तक सड़क न होने से एंबुलेंस नहीं पहुंची।
आदिवासी इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी उजागर हुई।
गिरधारी लाल, बड़बिल। आजादी के आठ दशकों बाद भी देश के सुदूर आदिवासी ग्रामीण इलाकों की सूरत कितनी बेबस और दर्दनाक है, इसकी एक बानगी क्योंझर जिले के बांसपाल प्रखंड स्थित कुमुंडी गांव में देखने को मिली।
देसाबंधा साही की रहने वाली एक प्रसूता को जन्म के चंद घंटों बाद ही अपनी नवजात बच्ची को कलेजे से लगाए कीचड़ और पत्थरों से भरी संकरी पगडंडी पर तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।
वजह सिर्फ इतनी थी कि गांव तक कोई पक्की सड़क नहीं है और एंबुलेंस बस्ती से तीन किलोमीटर पहले ही रुक गई। सिस्टम की यह बदहाली किसी के भी रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है।
रात भर प्रसव पीड़ा से तड़पी, घर पर ही हुआ प्रसव
जानकारी के अनुसार, देसाबंधा साही निवासी बैसाघु मुंडा की पत्नी बिलाश मुंडा को बुधवार रात करीब सात बजे अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई।
परिजनों ने फौरन 108 एंबुलेंस को फोन किया, लेकिन गांव तक पहुंचने का कोई रास्ता न होने के कारण एंबुलेंस रास्ते से ही वापस लौट गई। रात भर दर्द से तड़पने के बाद बिलाश ने घर पर ही एक बच्ची को जन्म दिया।
गोद में मासूम और पैरों में छाले: 3 किमी का खतरनाक सफर
गुरुवार सुबह जब दोबारा एंबुलेंस बुलाई गई, तो वह फिर गांव से तीन किलोमीटर दूर ही खड़ी हो गई। इसके बाद मजबूरी में जच्चा बिलाश मुंडा, अपनी नवजात बच्ची को गोद में लेकर आशाकर्मी के सहारे तीन किमी ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर पैदल चलकर एंबुलेंस तक पहुंची।
इस दौरान आशाकर्मी ने मानवीय संवेदना दिखाते हुए पूरे रास्ते महिला को संभाला। देसाबंधा साही में करीब 40 आदिवासी और मुंडा परिवार निवास करते हैं। पक्की सड़क न होने से इस गांव का संपर्क बाहरी दुनिया से लगभग कटा हुआ है।
बारिश के दिनों में यह पगडंडी दलदल में तब्दील हो जाती है, जिससे मरीजों, बुजुर्गों और स्कूल जाने वाले बच्चों का जीवन संकट में पड़ जाता है।
पति बैसाघु मुंडा और ग्रामीणों ने व्यथा सुनाते हुए कहा कि सड़क निर्माण के लिए प्रशासनिक अधिकारियों से गुहार लगाते-लगाते वे थक चुके हैं, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
आदिवासी नेता इंजीनियर बिनोद नाइक ने घटना पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए कहा कि आज भी कई आदिवासी बस्तियां बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह महरुम हैं, जो बेहद चिंताजनक है।
