काठमांडू। नेपाल में शनिवार को आए विनाशकारी भूकंप की विभीषिका और भी विकराल होती जा रही है। मंगलवार रात तक अधिकारियों ने 5,057 मौतों की पुष्टि की है। इस बीच, प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने आशंका जताई है कि मरने वालों की संख्या दस हजार तक पहुंच सकती है। उन्होंने राहत और बचाव कार्यो को अपर्याप्त मानते हुए दुनियाभर से तत्काल मदद की गुहार लगाई है।

कोइराला ने भारत, चीन और अमेरिका के राजदूतों को बताया कि साढ़े चार हजार से अधिक शव बरामद हो चुके हैं। लेकिन कई हजार लोग गंभीर रूप से घायल हैं। सैकड़ों अब भी लापता हैं। यदि इन सबको जोड़ दिया जाए तो मृतकों की संख्या 10 हजार तक पहुंच सकती है। इससे पहले रविवार को आयोजित सर्वदलीय बैठक में कोइराला ने सभी पार्टियों से एकजुट होकर मुसीबत का सामना करने का आह्वान किया था। प्रधानमंत्री ने लोगों से रक्तदान की भी अपील की है। इस बीच खबर यह भी आ रही है कि कुछ जगहों पर भूंकप आने के बाद से ध्वस्त हुई बिजली सेवाओं को कुछ स्थानों पर बहाल कर लिया गया है।

फिर लगे भूकंप के झटके, तीव्रता 5.8

नेपाल के गोरखा में आज सुबह फिर भूकंप का झटका लगा। रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 5.8 बताई जा रही है। इसका प्रभाव उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में महसूस किया गया। हालांकि प्रदेश के अंदरूनी हिस्से से धरती के कांपने का समाचार नहीं है। तेज बारिश के चलते वहां राहत कार्य ठप है। बारिश के चलते रास्ते मे पत्थर गिरने से गोरखा में जाने का मुख्य रास्ता बंद कर दिया गया है। इसको लेकर अफरातफरी मची है। रास्ते से मलबे को हटाया जा रहा है। स्थानीय प्रशासन ने सबको सुरक्षित स्थानो पर रहने का निर्देश दिया।

बिगड़ रहे हालात :

प्रभावित क्षेत्रों में खाना, पानी, बिजली और दवा की कमी के कारण हालात बिगड़ते जा रहे हैं। ऊपर से भूकंप के झटके और बारिश के कारण खौफ बना हुआ है। दसियों हजार लोग खुले आसमान के नीचे समय काट रहे हैं। सरकार प्रभावित इलाकों में टेंट, पानी, दवा, स्वास्थ्य कर्मी तथा स्वयंसेवक भेजने की कोशिश कर रही है।

72 घंटे में 98 झटके :

शनिवार को 7.9 की तीव्रता का भूकंप आने के बाद झटकों का आना लगातार जारी है। मंगलवार दोपहर 12 बजे तक रिक्टर स्केल पर 98 बड़े झटके रिकार्ड किए गए हैं। इनमें दो झटकों की तीव्रता छह से ज्यादा थी, जबकि 96 झटके चार से छह तीव्रता के थे। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के अनुसार, चार से कम तीव्रता के चार सौ से ज्यादा झटके आए।

81 सालों में भारत की 12 फीट जमीन दब चुकी है :

हमेशा से ही समूचा उत्तर भारत उत्तर दिशा में नेपाल के नीचे की ओर खिसक रहा है। इसका खिसकना अचानक और विभिन्न इलाकों में और अलग-अलग वक्त में होता रहा है। दस हजार लोगों की जान लेने वाले वर्ष 1934 में बिहार में आए भीषण भूकंप से अब तक पिछले 81 सालों में भारत की बारह फीट जमीन नेपाल की सतह के नीचे दब चुकी है।

काठमांडू तीन मीटर दक्षिण में खिसका :

सिडनी स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के भूकंप विशेषज्ञ जेम्स जैक्सन का कहना है कि नेपाल के भीषणतम भूकंप से काठमांडू के नीचे की जमीन 15 किलोमीटर की गहराई में दक्षिण दिशा में तीन मीटर खिसक गई है। भूकंप के बाद पूरी पृथ्वी की परिक्रमा ध्वनि तरंगों की मदद से करके राजधानी काठमांडू की स्थिति का पता लगाया गया। काठमांडू की स्थिति का यह विश्लेषण एडिलेड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के नतीजों से भी मेल खाता है।

माउंट एवरेस्ट जस का तस :

काठमांडू के अपनी जगह से खिसकने और इस घर्षण से हिमालय पर बर्फीला तूफान आने के बावजूद दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट अपनी जगह पर कायम है। अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि उसके कद में कुछ मिलीमीटर का मामूली इजाफा भी हुआ है या नहीं। हालांकि भूकंप का कारण बनी मुख्य दरार (हिमालयन थस्र्ट फाल्ट) पश्चिमी एवरेस्ट की दिशा में पड़ती है।

हिमालयन थ्रस्ट फाल्ट पर आया भूकंप :

इस बार भूकंप उत्तर की दिशा में बढ़ रहे भारतीय उप महाद्वीप प्लेट को यूरेशियाई प्लेट से अलग करने वाली हिमालयन थ्रस्ट फाल्ट पर आया है। दोनों प्लेटों का यह जोड़ (हिमालयन थस्र्ट फाल्ट) दस डिग्री कोण पर उत्तर और पूर्वोत्तर की दिशा में झुक गया। ब्रिटेन की दरहम यूनिवर्सिटी के मार्क एलन का कहना है कि इस फाल्ट जोन पर हुए घर्षण से सतह पर यह सारे बदलाव हुए हैं।

एटमी धमाके से कई गुना ज्यादा ऊर्जा निकली :

भूकंप से इंडियन प्लेट के यूरेशियन प्लेट के नीचे खिसकने से हुए घर्षण के कारण पृृथ्वी का 7200 वर्ग किलोमीटर भूभाग अपनी जगह से तीन मीटर ऊपर उठ गया। इसके परिणामस्वरूप खिंचाव से एक झटके में 79 लाख टन टीएनटी ऊर्जा निकली। उसका असर पृृथ्वी की धुरी पर भी असर पड़ा। इस ऊर्जा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह हिरोशिमा में हुए एटमी धमाके से निकली ऊर्जा से 504.4 गुना ज्यादा थी।

सड़कों से भी आ रहे लोग

सड़कों के रास्ते भी भारत के नागरिकों के लौटने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। सेना के प्रयासों के बाद काठमांडू और सुनौली के बीच का सड़क मार्ग सुचारू हो गया है। चार हजार लोग 80 बसों में बैठकर लौट रहे हैं। इसी तरह राहत सामग्री लेकर भारत से बड़ी संख्या में ट्रक और बसें भी रवाना हो रही हैं। नेपाली सेना ने 12 भारतीयों को तामाकोसी से सुरक्षित निकाल कर सुरक्षित इलाकों में पहुंचाया है। वहीं, अपने देश वापस के लिए एयरपोर्ट पर लगभग ढाई किलोमीटर लंबी लाइन लगी हुई है।

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Posted By: Sanjay Bhardwaj

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