आरती जेरथ। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पूर्व सेमीफाइनल की तरह माने जा रहे पांच राज्यों के चुनाव निपटने के बाद अब कांग्रेस पार्टी को आगामी बड़ी चुनावी जंग के लिए विभिन्न दलों से गठजोड़ करने पर खास ध्यान देना चाहिए। इसमें शक नहीं कि हिंदी पट्टी में भाजपा के खिलाफ 3-0 के स्कोरकार्ड ने इस पार्टी के मनोबल में जबर्दस्त इजाफा किया होगा, जो वर्ष 2014 से तकरीबन हरेक चुनाव हारते हुए गुमनामी की ओर बढ़ रही थी। लेकिन यहां इस तथ्य को न भूलें कि राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी। यह बताता है कि उसके पास भाजपा का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त सांगठनिक ढांचा व ताकत नहीं है। उसे मित्रों और सहयोगियों की मदद चाहिए।

कांग्रेस की दुविधा
यहीं पर कांग्रेस की दुविधा और अनेक दिक्कतें नजर आती हैं, क्योंकि वह 2019 के लिए इसी एक संकल्प के साथ अपनी रणनीति तैयार कर रही है कि किसी भी तरह मोदी के विजयरथ को रोकना है, ताकि उन्हें दूसरा कार्यकाल न मिल सके। इसके लिए सबसे पहले तो कांग्रेस को चुनाव-पूर्व औपचारिक गठबंधन को लेकर अपनी हिचकिचाहट छोड़नी होगी। कांग्रेस पिछले काफी समय से विपक्षी एकता को लेकर बातें कर रही है। लेकिन उसने ऐसा कोई गठबंधन तैयार करने को लेकर वास्तव में ज्यादा कुछ नहीं किया है, जो एक बैनर तले आगामी चुनावी समर में उतरे।

...तो होगा अविवेकपूर्ण फैसला 
कांग्रेस के लिए 2019 के चुनाव में समान-विचारधारा के दलों के साथ सुपरिभाषित गठबंधन के बगैर जाने की महत्ता को नजरअंदाज करना अविवेकपूर्ण होगा। एक ऐसे इवेंट में, जिसमें किसी भी पार्टी को बहुमत न मिले (जिसकी संभावना हिंदी पट्टी में भाजपा की फिसलन को देखते हुए काफी ज्यादा है) राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद यह तय करने के लिए पिछले प्रकरणों की ओर देख सकते हैं कि सरकार गठन के लिए पहले किसे बुलाया जाए। पूर्व राष्ट्रपति (स्वर्गीय) केआर नारायणन ने यह मानक तय किया था कि चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत न मिलने की स्थिति में सबसे बड़े दल या फिर सबसे बड़े चुनाव-पूर्व गठबंधन को सरकार गठन के लिए बुलाया जाए।

चुनाव लड़ने के लिए तैयार
फिलहाल चार-पांच दल जो घोषित रूप से कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं, वे हैं तमिलनाडु में द्रमुक, बिहार में राजद और हाल ही में एनडीए से नाता तोड़ने वाले उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा, महाराष्ट्र में राकांपा और कर्नाटक में जद (एस)। इसके अलावा झारखंड में झामुमो और झाविमो के साथ गठजोड़ की बातचीत चल रही है।

राज्यवार गठजोड़ व्यवस्थाएं
किंतु यह तो कुछ बिखरी-सी, राज्यवार गठजोड़ व्यवस्थाएं हैं, जो आम चुनाव के बाद किसी को बहुमत न मिलने की सूरत में राष्ट्रपति कोविंद को शायद ही प्रभावित कर पाएं खासकर तब जबकि भाजपानीत राजग ज्यादा मजबूती के साथ दावा पेश करे। एक प्रमुख राष्ट्रीय दल होने के नाते यह कांग्रेस का जिम्मा है कि वह एक भाजपा-विरोधी मोर्चे की धुरी बने और चुनाव से पहले इसे आकार दे। कुछ दिन पूर्व द्रमुक के मुखिया एमके स्टालिन द्वारा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के आश्चर्यजनक प्रस्ताव के मूल में भी यही भाव निहित था। स्टालिन संभवत: कांग्रेस को उकसा रहे थे कि वह जल्द गठबंधन तैयार करे।

कौन करेगा नेतृत्‍व
यह बात मायने नहीं रखती कि कांग्रेस संभावित मोर्चे का नेतृत्व करती है या कोई और अथवा भावी गठबंधन चुनाव में जाने से पहले प्रधानमंत्री पद के दावेदार के नाम की घोषणा करता है या नहीं। अहम यह कि इस गठबंधन का कोई नाम हो, ढांचा हो और कोई दस्तावेज भी हो, जो विपक्ष के साझा एजेंडे को बयान करता हो। अब कांग्रेस के समक्ष मौजूद दूसरे और संभवत: ज्यादा मुश्किल सवाल पर आते हैं। क्या इन चार-पांच दलों के साथ मिलकर वह इतनी सीटें जीत सकेगी कि एनडीए को पीछे छोड़ दे और सरकार गठन के लिहाज से मजबूत स्थिति में हो? या फिर कांग्रेस को मजबूरी में ही सही, बसपा सुप्रीमो मायावती और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी को अपने पाले में लाना होगा, जो भाजपा के प्रति तो कोई लगाव नहीं दिखा रही हैं, लेकिन दूसरे पक्ष के प्रस्तावों के प्रति भी अनमनी बनी हुई हैं?

चुनाव-पूर्व गठजोड़
बेशक ऐसा कोई चुनाव-पूर्व गठजोड़, जिसमें यूपी का बसपा-सपा और रालोद से मिलकर बना जिताऊ घटक शामिल हो, शो स्टॉपर हो सकता है। और उत्तर प्रदेश के ये क्षत्रप अपनी इस अहमियत से भलीभांति अवगत हैं। यदि इस साल की शुरुआत में हुए तीन लोकसभा उपचुनाव के नतीजों को संकेत मानें तो कह सकते हैं कि सपा-बसपा-रालोद का गठजोड़ यूपी में विरोधियों का सूपड़ा साफ कर सकता है। लेकिन कांग्रेस को यूपी के इन क्षत्रपों को साथ मिलाने की ऊंची कीमत देनी होगी, खासकर मायावती को। उनके साथ अपने पिछले अनुभवों को देखते हुए कांग्रेस फूंक-फूंककर चलना चाहेगी। इसी तरह ममता भी कांग्रेस के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेल रही हैं।

 

फेडरल फ्रंट बनाने का विचार
वह विपक्षी दलों की बैठकों से खुद तो दूर रहती हैं, लेकिन अपने किसी प्रतिनिधि को भेजते हुए अपना एक पांव भी उसके भीतर रखती हैं। इसके साथ-साथ वह टीआरएस के मुखिया के चंद्रशेखर राव द्वारा पेश गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस फेडरल फ्रंट के विचार के कभी साथ जाती तो कभी दूर हटती दिखती हैं। केसीआर का फेडरल फ्रंट बनाने का विचार भाजपा के खिलाफ एकजुट विपक्ष की लड़ाई के कांग्रेस के प्रयासों को पलीता लगा सकता है।

नफा-नुकसान पर करना होगा विचार
कांग्रेस को मायावती और ममता के साथ गठजोड़ के नफा-नुकसान पर सावधानी से विचार करना होगा। ये महिलाएं एनडीए के हारने की सूरत में खुद को किंगमेकर की भूमिका में तो देखना ही चाहती हैं। लिहाजा उनकी कोशिश एक-दूसरे से ज्यादा सीटें जीतने की होगी, ताकि वे कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरें। ममता के पास पश्चिम बंगाल की 42 सीटें हैं। लेकिन चूंकि मायावती को यूपी की 80 सीटें सपा और रालोद के साथ भी बांटनी होंगी, लिहाजा वे ममता से आगे निकलने के लिए इस राज्य से बाहर भी संभावनाएं तलाशना चाहेंगी। ऐसे में कांग्रेस मायावती को मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब और हरियाणा में कुछ सीटों पर लड़ने की पेशकश कर सकती है। अब काफी कुछ इस पर निर्भर है कि कांग्रेस अपने लिए 2019 की राह आसान बनाने की सौदेबाजी में कितनी अक्लमंदी और विनम्रता दर्शाती है। यह तय है कि 2019 की चुनावी जंग दिलचस्प होने वाली है।

(वरिष्ठ पत्रकार)

Posted By: Kamal Verma

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