117 सालों से लंदन के म्यूजियम में है वाग्देवी की प्रतिमा, भारत में खुदाई में निकली मूर्ति कैसे पहुंची इंग्लैंड?
इंदौर हाई कोर्ट ने धार की भोजशाला को मां वाग्देवी का मंदिर घोषित किया है और सरकार को लंदन से ...और पढ़ें
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लंदन कैसे पहुंची मां वाग्देवी की मूर्ति?

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी धार में स्थित भोजशाला को लेकर इंदौर हाई कोर्ट ने शुक्रवार, 15 मई को बड़ा फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने भोजशाला को मां वाग्देवी का मंदिर मान लिया है।
इंदौर हाई कोर्ट ने ये फैसला तो सुना दिया कि भोजशाला एक मंदिर है, लेकिन इस मंदिर में देवी की पूजा के लिए वो मूर्ति ही नहीं है, जिनकी लोग पूजा करना चाहते हैं। अब सवाल ये उठता है कि मां वाग्देवी की मूर्ति कहां हैं, तो बता दें कि मां वाग्देवी की मूर्ति लंदन में है।
कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को ये निर्देश भी दिए हैं वो लंदन से माता की मूर्ति लाने का प्रयास करें। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी कहा है कि वे केंद्र सरकार के साथ मिलकर कोर्ट के इस फैसले पर काम करेंगे।
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लंदन कैसे पहुंची मां वाग्देवी की मूर्ति?
भोजशाला के इस ऐतिहासिक मंदिर को राजा भोज ने बनवाया था। माना जाता है कि राजा भोज का शासनकाल साल 1010 से 1053 तक रहा था। राजा भोज के नाम पर ही भोपाल के निकल भोजपुर बसा हुआ है। राजा ने अपने शासनकाल में कई मंदिरों का निर्माण कराया। राजा ने ही धार की भोजशाला का निर्माण भी कराया।
ब्रिटिश म्यूजियम से मिले ऐतिहासिक विवरण के मुताबिक, 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान भोजशाला परिसर का एक बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था।
रिकॉर्ड्स के मुताबिक, अंग्रेजों ने 1875 में मां वाग्देवी की प्रतिमा को खुदाई के दौरान जमीन से निकाला था। माता की मूर्ति निकालकर अंग्रेज इस मूर्ति को भारत की मिट्टी से अलग कर इंग्लैंड ले गए। तब से लेकर आज तक वो प्रतिमा लंदन में ही है और भारत नहीं आ पाई।

हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का मंदिर और प्राचीन विद्या केंद्र मानते हैं। वहीं मुस्लिम पक्ष हमेशा ही इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है और जैन समुदाय के पक्ष का दावा है कि यह मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल था। लेकिन अब हाई कोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला परिसर को मंदिर कहा गया है।
क्या अब भारत लौटेगी माता की मूर्ति?
भोजशाला की मां वाग्देवी की मूर्ति लंदन के एक म्यूजियम में प्रदर्शन के तौर पर रखी हुई है। 1875 में अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड इसे धार से निकालकर अपने साथ ले गए थे। हाई कोर्ट के धार परिसर को 'मंदिर' घोषित किए जाने के बाद अब इस प्रतिमा की वापसी की कानूनी और कूटनीतिक संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
माता वाग्देवी की मूर्ति करीब चार फुट ऊंची है। इस प्रतिमा का वजन करीब 250 किलोग्राम है। यह प्रतिमा भोजशाला से जुड़ी सबसे अधिक ऐतिहासिक महत्व वाली कलाकृतियों में से एक मानी जाती है। इस प्रतिमा पर देवनागरी लिपि में उकेरे गए संस्कृत शिलालेख इसके सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व को और भी बढ़ा देते हैं।
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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, 'माननीय उच्च न्यायालय का दिया गया वह निर्णय, जिसमें धार की ऐतिहासिक भोजशाला को एक संरक्षित स्मारक और मां वाग्देवी के पूजा स्थल के रूप में मान्यता दी गई है, हमारी सांस्कृतिक विरासत, आस्था और इतिहास के सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण क्षण है।'
मोहन यादव ने आगे लिखा, 'ASI के संरक्षण और प्रबंधन में भोजशाला की गरिमा और सुदृढ़ होगी, तथा श्रद्धालुओं के पूजा-अर्चना करने के अधिकार को सुनिश्चित किया जाएगा। केंद्र सरकार को मां वाग्देवी की प्रतिमा को UK से वापस भारत लाने पर विचार करने का निर्देश देना अत्यंत सराहनीय है। राज्य सरकार भी इस दिशा में आवश्यक प्रयास करेगी।'
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आगे लिखा, 'हमारी संस्कृति सदैव सर्व धर्म समभाव, सामाजिक सौहार्द और भाईचारे की वाहक रही है। हम न्यायालय के निर्णय का पूर्ण सम्मान करते हैं और प्रदेश में सौहार्द, सांस्कृतिक गौरव तथा सामाजिक सद्भावना को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए कटिबद्ध हैं।'
मोहन बताया ने आगे बताया, 'माननीय न्यायालय का यह निर्णय अत्यंत सराहनीय है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने में राज्य सरकार पूर्ण सहयोग प्रदान करेगी।'
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