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दो रुपये का नशा, चुकानी पड़ रही करोड़ों की कीमत... भारत को अंदर से खा रहा गुटखा, सिगरेट से ज्यादा खतरनाक

Published: Sun, 31 May 2026 09:49 PM (IST)

भारत में तंबाकू, विशेषकर गुटखा जैसे धुआं रहित तंबाकू का गंभीर प्रभाव है, जो सस्ता, व्यापक रूप से उपयोग किया ...और पढ़ें

सिगरेट से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा गुटखा (AI द्वारा जनरेटेड फोटो)

सिगरेट से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा गुटखा (AI द्वारा जनरेटेड फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में तंबाकू के नुकसान से शायद ही कोई अनजान हो। सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले तंबाकू विरोधी विज्ञापन दिखाए जाते हैं और सिगरेट या तंबाकू के पैकेटों पर डरावनी चेतावनी वाली तस्वीरें छपी होती हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग तंबाकू का सेवन करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चेतावनियां दिखाकर लत को खत्म नहीं किया जा सकता।

समस्या यह भी है कि एक ओर लोगों को तंबाकू छोड़ने की सलाह दी जाती है, वहीं फिल्मों और मनोरंजन जगत में धूम्रपान को कई बार आकर्षक और प्रभावशाली अंदाज में दिखाया जाता है। इससे युवाओं पर अलग तरह का प्रभाव पड़ता है।

भारत में तंबाकू की समस्या केवल सिगरेट तक सीमित नहीं है। यहां बड़ी संख्या में लोग धुआं रहित तंबाकू जैसे गुटखा, खैनी और जर्दा का सेवन करते हैं। अनुमान है कि देश में करीब 20 करोड़ लोग रोजाना ऐसे उत्पादों का उपयोग करते हैं। ये उत्पाद बेहद सस्ते दाम पर लगभग हर दुकान पर उपलब्ध हैं।

भारत में सबसे ज्यादा धुआं रहित तंबाकू उपभोक्ता

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय की शोधकर्ता डॉ. मधुरिमा नंदी के अनुसार, धुआं रहित तंबाकू उत्पादों से 28 से अधिक प्रकार के कैंसर पैदा करने वाले तत्व निकाले जा चुके हैं। दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक धुआं रहित तंबाकू उपभोक्ता भारत में रहते हैं।

जहां सिगरेट पर भारी टैक्स लगाया जाता है और पैकेटों पर बड़ी चेतावनियां होती हैं, वहीं धुआं रहित तंबाकू अभी भी अपेक्षाकृत सस्ता और आसानी से उपलब्ध है। यही वजह है कि यह समस्या लगातार बढ़ रही है।

देश में गुटखा और अन्य तंबाकू उत्पादों के सेवन के बाद थूकने की समस्या भी गंभीर है। एक अनुमान के अनुसार भारतीय हर साल इतना थूक फैलाते हैं कि उससे 211 ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल भर सकते हैं। भारतीय रेलवे को ट्रेनों और स्टेशनों की सफाई पर हर साल लगभग 1200 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

औपनिवेशिक दौर से शुरू हुई कहानी

भारत में तंबाकू की खेती की शुरुआत 1605 में हुई थी, जब पुर्तगाली इसे गुजरात के कुछ इलाकों में लेकर आए। समय के साथ यह भारतीय समाज का हिस्सा बन गया और कई क्षेत्रों में इसकी खपत बढ़ती गई।

बाद में गुजरात के उद्योगपति मनसुखभाई कोठारी ने गुटखा को छोटे और सस्ते पैकेटों में बेचना शुरू किया। दो से पांच रुपये में मिलने वाला यह उत्पाद सिगरेट की तुलना में कहीं अधिक सुलभ था। विशेषज्ञों के अनुसार गुटखा निकोटिन को तेजी से शरीर में पहुंचाता है और इसकी लत सिगरेट की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक हो सकती है।

भारत में सिगरेट और धुआं रहित तंबाकू के उपभोक्ताओं की सामाजिक पृष्ठभूमि भी अलग है। सिगरेट का उपयोग अपेक्षाकृत संपन्न और शहरी वर्ग में अधिक देखा जाता है, जबकि गुटखा और खैनी का उपयोग ग्रामीण, कम शिक्षित और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में ज्यादा पाया जाता है।

गरीबी और तंबाकू का गहरा संबंध

डॉ. मधुरिमा नंदी के अनुसार धुआं रहित तंबाकू के उपयोग के प्रमुख कारणों में कम शिक्षा, ग्रामीण क्षेत्र में निवास, कमजोर आर्थिक स्थिति, कम टैक्स, साथियों का दबाव और परिवार में पहले से मौजूद तंबाकू सेवन की आदत शामिल हैं।

दैनिक मजदूरी करने वाले कई लोगों के लिए दो रुपये का गुटखा एक सस्ता नशा बन जाता है। निकोटिन भूख को कुछ समय के लिए दबा देता है, इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर लोग इसे भोजन के विकल्प की तरह भी इस्तेमाल करते हैं।

एक सर्वेक्षण में दिल्ली के नेहरू प्लेस मेट्रो स्टेशन के पास रहने वाले एक बच्चे ने कहा कि बिस्कुट से पेट नहीं भरता, जबकि गुटखा खाने से कुछ समय तक भूख कम लगती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही सोच गरीब तबकों में तंबाकू की लत को और बढ़ाती है।

हर साल लाखों परिवारों पर असर

रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत के सबसे गरीब परिवार अपने कुल खर्च का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा तंबाकू और नशीले पदार्थों पर खर्च करते हैं, जबकि शिक्षा पर केवल 2.5 प्रतिशत खर्च करते हैं।

तंबाकू से जुड़ी बीमारियों और मौतों के कारण हर साल लगभग 1.84 करोड़ भारतीय अत्यधिक गरीबी की स्थिति में पहुंच जाते हैं। कई परिवार अपने कमाने वाले सदस्य को खो देते हैं और आर्थिक संकट में फंस जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकू उद्योग गरीबी का कारण नहीं है, लेकिन वह गरीबी और मजबूरी का लाभ जरूर उठाता है। कई लोग तनाव और कठिन जीवन परिस्थितियों से राहत पाने के लिए इन उत्पादों का सेवन शुरू करते हैं।

क्या हो सकता है समाधान?

रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से समस्या खत्म नहीं होती, क्योंकि इससे अवैध बाजार विकसित हो सकता है। इसके बजाय उत्पादों को कम सुलभ, कम आकर्षक और महंगा बनाना अधिक प्रभावी उपाय हो सकता है।

2011 में गुटखा पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन कंपनियों ने तंबाकू और फ्लेवरिंग सामग्री को अलग-अलग पैकेटों में बेचना शुरू कर दिया। ग्राहक दोनों को मिलाकर गुटखा तैयार कर लेते हैं। रिपोर्ट में इस कानूनी खामी को बंद करने की मांग की गई है।

इसके अलावा प्लास्टिक पैकेटों पर प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने, न्यूनतम पैक कीमत 20-30 रुपये करने, तंबाकू बेचने के लिए लाइसेंस अनिवार्य बनाने, खरीदने की न्यूनतम आयु 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष करने और धुआं रहित तंबाकू पर अधिक टैक्स लगाने की सिफारिश की गई है।

विशेषज्ञों की चेतावनी

डॉ. मधुरिमा नंदी का कहना है कि धुआं रहित तंबाकू के उपयोग को कम करने के लिए सख्त कर नीति, प्रभावी तंबाकू नियंत्रण कानून, स्पष्ट चेतावनी लेबल और जागरूकता अभियान की जरूरत है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि केवल चेतावनी वाले विज्ञापन दिखाने से समस्या हल नहीं होगी। जब तक गुटखा और अन्य धुआं रहित तंबाकू उत्पाद सस्ते, आसानी से उपलब्ध और आकर्षक बने रहेंगे, तब तक उनकी खपत जारी रहेगी और इसके सामाजिक, आर्थिक तथा स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणाम भी सामने आते रहेंगे।

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