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बांकीपुर-दतिया में कैसे पलटा गेम? मांजलपुर में कमल... 3 राज्य-3 सीटों के नतीजों की Inside Story

Published: Mon, 03 Aug 2026 10:50 PM (IST)Updated: Tue, 04 Aug 2026 01:57 AM (IST)

बांकीपुर और दतिया उपचुनाव के नतीजों ने केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों को नई उम्मीद दी है।

बांकीपुर-दतिया उपचुनाव ने विपक्षी राजनीति को नई उम्मीद दी

बांकीपुर-दतिया उपचुनाव ने विपक्षी राजनीति को नई उम्मीद दी

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संजय मिश्र, नई दिल्ली। केंद्र में सत्तासीन भाजपा के राजनीतिक ऑपरेशन से हलकान विपक्षी राजनीति को बांकीपुर तथा दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने भविष्य की चुनावी लड़ाइयों के लिए नई उम्मीद दिखाई है।

इसमें संदेह नहीं कि हाल में तृणमूल कांग्रेस तथा शिवसेना यूबीटी के 26 लोकसभा सदस्यों की बड़ी टूट के आपरेशन से बुरी तरह लड़खड़ाई विपक्षी राजनीति को फिर से मुकाबले के ट्रैक पर लाने के लिए उपचुनाव के ये नतीजे मनोवैज्ञानिक उत्प्रेरक का आधार तैयार कर सकते हैं।

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बांकीपुर-दतिया उपचुनाव ने विपक्षी राजनीति को नई उम्मीद 

इन नतीजों को विपक्षी पार्टियां विशेषकर कांग्रेस जेन-जी छात्रों के आंदोलन को लेकर पहले सड़क से संसद तक चुनौतियों का सामना कर रही भाजपा के खिलाफ व्यापक सियासी विमर्श खड़ा करने का जरिया बना सकती हैं।

छात्रों के खिलाफ पुलिस लाठीचार्ज को लेकर पहले ही आक्रामक सियासी तेवर अपना रही कांग्रेस ने उपचुनाव के नतीजों को जनता विशेषकर जेन-जी की भाजपा से बढ़ती नाराजगी से जोड़ विपक्ष के ऐसे इरादों का संकेत भी दे दिया।

दतिया और बांकीपुर उपचुनाव के परिणाम विपक्षी खेमे के लिए कितने अहम हैं, इसका अंदाजा भाकपा-माले, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना यूबीटी और सपा जैसे दलों की प्रतिक्रिया से लगाया जा सकता है।

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माकपा-माले के अलावा बाकी तीनों दलों का बांकीपुर और दतिया ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश तथा बिहार की राजनीति से भी सीधे कोई लेना-देना नहीं है।

फिर भी वे भाजपा की हार में अपनी परोक्ष जीत देख रहे हैं। कुछ महीनों बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को चुनौती देने उतर रहे अखिलेश यादव की सपा के लिए इन नतीजों में भविष्य की उम्मीदें नजर आएंगी। उत्तर प्रदेश के अगले चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है।

कांग्रेस ने दतिया में भाजपा के गढ़ में प्रभावशाली जीत दर्ज की

ऐसे में बांकीपुर और दतिया के नतीजों के मायने इस लिहाज से भी हैं कि बिहार तथा मध्य प्रदेश दोनों उत्तर प्रदेश के पड़ोसी राज्य हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में बिहार तो बुंदलेखड क्षेत्र में मध्य प्रदेश से अपने तरह की राजनीतिक और सांस्कृतिक समानताएं हैं।

जाहिर तौर पर भाजपा के गढ़ माने जाने वाले दतिया में कांग्रेस की प्रभावशाली जीत पार्टी को भविष्य में मध्य प्रदेश की सत्ता-सियासत में वापसी के लिए भरोसा पैदा करेगी। वहीं सपा को अपने भावी गठबंधन साझेदार कांग्रेस की भाजपा से सीधे मुकाबले की राजनीतिक क्षमता बरकरार रहने का भरोसा देगी।

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दतिया में कांग्रेस की जीत इस दृष्टि से भी अहम है कि सूबे में पार्टी के नए नेतृत्व ने जहां जुझारूपन दिखाया, वहीं दिग्वियज सिंह और कमलनाथ जैसे पुराने दिग्गज लगभग राजनीतिक परिदृश्य से बाहर ही रहे।

विपक्ष के लिए बांकीपुर तथा दतिया के परिणाम छात्रों के आंदोलन में उठाए जा रहे मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव और गहरा करने का संदेश भी है।

जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर भले ही अभी विपक्षी राजनीति के किसी फ्रेमवर्क का हिस्सा नहीं हैं, मगर बांकीपुर में उनकी जीत में गैर भाजपा-राजग खेमे के दल भविष्य के उभरते सामाजिक-सियासी परिदृश्य की झांकी देख रहे हैं।

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पटना के प्रमुख शहरी इलाके की इस सीट पर उच्च वर्ग के मतदाताओं की काफी बड़ी संख्या है, जो परंपरागत रूप से बीते तीन दशक से भाजपा के अटूट समर्थक रहे हैं। मगर प्रशांत किशोर की जीत के बाद विपक्षी दलों को अब राष्ट्रीय स्तर पर शहरी मध्यम वर्ग तथा उच्च वर्ग के बीच अपनी स्वीकार्यता की संभावनाएं दिखाई देने लगेंगी।

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