क्या चुनाव चिह्न पर उनका हक होना चाहिए जिन्होंने दलबदल का संवैधानिक पाप किया? सुप्रीम कौर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के चुनाव चिह्न विवाद पर सुनवाई करते हुए दलबदल करने वालों को पार्टी चिह्न देने पर गंभीर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल को 'संवैधानिक पाप' कहकर गंभीर टिप्पणी की

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। शिवसेना के भीतर हुए ऐतिहासिक राजनीतिक विभाजन और चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बेहद तल्ख टिप्पणी की।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह जानना चाहा कि क्या पार्टी के चुनाव चिह्न पर उन लोगों का हक होना चाहिए जिन्होंने दलबदल का 'संवैधानिक पाप' किया है।
कोर्ट इस बात पर दलीलें सुन रहा था कि क्या शिंदे गुट को चुनाव चिह्न आवंटित करने के लिए मुख्य रूप से विधायी संख्या बल पर निर्भर रहने का चुनाव आयोग का फैसला सही था।
शिंदे गुट ने किया बचाव
सुनवाई के दौरान शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए निर्वाचन आयोग के उस निर्णय का पुरजोर बचाव किया, जिसमें विधायी बहुमत परीक्षण को आधार बनाया गया था।
उन्होंने दलील दी कि चुनाव चिह्न संबंधी आदेश के तहत यह परीक्षण राजनीतिक दल की पहचान तय करने में पूरी तरह कानूनी और वैध है। हालांकि, पीठ ने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
दलबदल को बताया संवैधानिक उल्लंघन
न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि जब सदस्य अयोग्यता की कार्यवाही का सामना कर रहे हों और अंततः अपनी सदस्यता खो दें, तो ऐसी स्थिति में पार्टी का चिह्न किसके पास जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि क्या चुनाव चिह्न का यह भाव उस पक्ष के लिए काम करेगा जिसने दलबदल जैसे संवैधानिक उल्लंघन की शिकायत की है, या फिर उन लोगों के लिए जो इसके दोषी हैं?
साथ ही, कोर्ट ने भारतीय राजनीति की उलझी हुई वास्तविकताओं का हवाला देते हुए केवल संगठनात्मक सदस्यों की गिनती करके जमीनी समर्थन तय करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
'सुभाष देसाई' मामले का किया जिक्र
नीरज किशन कौल ने कहा कि अयोग्यता का प्रभाव हमेशा पूर्वप्रभावी (रेट्रोस्पेक्टिव) नहीं होता है और 'सुभाष देसाई' मामले के संविधान पीठ के फैसले ने भी विधायी बहुमत परीक्षण के उपयोग पर रोक नहीं लगाई है। उन्होंने कहा कि जब प्रतिद्वंद्वी गुट सामने आते हैं, तो स्पीकर को यह तय करना होता है कि असली राजनीतिक दल कौन सा है।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि क्या संगठनात्मक परीक्षण वास्तव में जमीनी हकीकत को दर्शाता है, विशेषकर तब जब पार्टी का आंतरिक संविधान लोकतांत्रिक ढांचे पर आधारित न हो।
इस संवेदनशील और राजनीतिक रूप से भूचाल लाने वाले मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई अनिर्णायक रही और बुधवार को भी यह जारी रहेगी।
यह भी पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे HC का फैसला पलटा, FDA पर लगा पांच लाख रुपए का मुआवजा हटाया
यह भी पढ़ें- NHAI के पास हाईवे पर खड़ी गाड़ियों के किए क्यों नहीं है निगरानी सिस्टम? सुप्रीम कोर्ट ने पूछा सवाल
