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सुप्रीम कोर्ट का प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस में दखल देने से इनकार, कहा- देश को डॉक्टरों की जरूरत

Published: Wed, 24 Jun 2026 09:20 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस में दखल देने से इनकार किया, लेकिन देश में डॉक्टरों की जरूरत पर जोर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- देश को डॉक्टरों की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- देश को डॉक्टरों की जरूरत

HighLights

  1. निजी मेडिकल कॉलेज फीस पर सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार।

  2. कोर्ट ने डॉक्टरों की जरूरत और छात्रवृत्ति का विकल्प बताया।

  3. सरकारी डॉक्टरों की विशेषज्ञता को जनहित के लिए महत्वपूर्ण माना।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चिकित्सा शिक्षा का सपना देखने वाले युवाओं के संघर्ष और सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट से दो बड़े संदेश सामने आए हैं।

देश में डॉक्टरों की कमी और चिकित्सा शिक्षा की सुलभता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद मानवीय और व्यावहारिक रुख अपनाया है। एक तरफ जहां कोर्ट ने प्राइवेट मेडिकल कालेजों की फीस तय करने में दखल देने से मना कर दिया, वहीं दूसरी तरफ सरकारी सेवा में कार्यरत डाक्टरों की विशेषज्ञता को जनहित के लिए अनमोल बताया।

कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें आरोप लगाया गया था कि राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में फीस बहुत ज्यादा है।

फीस पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

राजस्थान के एक मेडिकल छात्र ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सालाना फीस 18.90 लाख से 25 लाख रुपये के बीच है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) की आठ लाख रुपये की सालाना आय सीमा के बिल्कुल विपरीत है।

ऐसे में ईडब्ल्यूएस वर्ग का कोई मेधावी छात्र डॉक्टर कैसे बनेगा? याचिकाकर्ता छात्र ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-यूजी)-2025 में शामिल हुआ था।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस दर्द को समझा, लेकिन व्यावहारिक पक्ष रखते हुए याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने कहा, 'हमें इस देश में डॉक्टरों की जरूरत है।' लेकिन इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति यह मांग नहीं कर सकता कि स्व-वित्तपोषित (प्राइवेट) संस्थान भी सरकारी संस्थानों के बराबर ही फीस वसूलें।

कोर्ट ने छात्र को याद दिलाया कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए स्कॉलरशिप (छात्रवृत्ति) का विकल्प हमेशा खुला रहता है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इन्कार कर दिया।

सरकारी और प्राइवेट कॉलेज की फीस समान नहीं हो सकती

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि निजी मेडिकल कॉलेज और सरकारी कॉलेज में सालाना ट्यूशन फीस समान नहीं हो सकती। स्व-वित्तपोषित निजी कॉलेजों में हर खर्च कॉलेजों को खुद उठाना पड़ता है, जबकि सरकार अपने अधीन आने वाले कॉलेजों के खर्चों पर सब्सिडी देती है।

सरकारी रेट पर फीस ली तो बंद हो जाएंगे प्राइवेट कॉलेज

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि निजी कॉलेज भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं, जिसमें चिकित्सा क्षेत्र भी शामिल है। अगर उन्हें सरकारी दर पर फीस लेने के लिए कहा गया, तो वे बंद हो जाएंगे और चिकित्सा शिक्षा को नुकसान होगा। अगर दूसरे राज्यों ने EWS आरक्षण लागू किया है और राजस्थान ने ऐसा नहीं किया है, तो कोर्ट निजी कॉलेजों को फीस कम करने का निर्देश नहीं दे सकता।

19 लाख फीस नहीं भर सकते: याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता के माता-पिता की सालाना आय 8 लाख रुपये से कम है। ऐसे में उसने याचिका में गुहार लगाई थी कि निजी मेडिकल कॉलेज में मनमाने ढंग से सामान्य श्रेणी की सीट आवंटित की गई और उससे 19 लाख रुपये मांगे जा रहे थे, जो वह भर नहीं सकते। याचिकाकर्ता ने NEET-UG 2025 में क्वालीफाई किया था।
याचिकाकर्ता के वकील ऋषभ संचेती ने बेंच को बताया कि EWS श्रेणी के छात्रों, जिन्होंने उनसे कम अंक हासिल किए थे, उन्हें EWS आरक्षण की सीटें आवंटित की गईं। वहां अभ्यर्थी एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए सरकार द्वारा तय दर पर फीस देते हैं, जो निजी कॉलेजों में सामान्य श्रेणी की सीटों से कम है।

10% EWS आरक्षण न देना संवैधानिक उल्लंघन

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट यह समझने में विफल रहा कि राजस्थान सरकार द्वारा एमबीबीएस पाठ्यक्रम में EWS श्रेणी के छात्रों के लिए 10% सीटें न देना संवैधानिक उल्लंघन है और गरीब परिवारों से 19-25 लाख रुपये सालाना ट्यूशन फीस वसूलने की इजाजत दी गई। याचिकाकर्ता ने EWS आरक्षण की सीट के बजाय सामान्य श्रेणी की सीट के मनमाने आवंटन को भी चुनौती दी।

बंगाल-महाराष्ट्र में लागू है EWS कोटा, राजस्थान में क्यों नहीं

संचेती ने कहा कि पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने निजी कॉलेजों में भी 10% EWS आरक्षण लागू किया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि हमें हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने का कोई कारण नहीं दिखता। हालांकि, इस मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले से जुड़े कानून के सवाल को भविष्य के उपयुक्त मामले में फैसले के लिए खुला रखा गया है।

संचेती ने कहा कि संविधान (103वां संशोधन) अधिनियम के तहत जरूरी 10% EWS आरक्षण को लागू न करना, 150 सीटों वाले कॉलेज में सिर्फ 12 EWS सीटें देना, संवैधानिक अधिकार को कमजोर करता है।

निजी डॉक्टरों से बेहतर स्वास्थ्य सेवा देंगे सरकारी डॉक्टर

इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने तमिलनाडु का एक और संवेदनशील मामला आया। 'तमिलनाडु मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन' ने याचिका दायर कर मांग की थी कि शैक्षणिक वर्ष 2025-2026 के लिए खाली रह गईं 152 इन-सर्विस सुपर स्पेशियलिटी मेडिकल सीटों को 'अखिल भारतीय कोटा' में सरेंडर करने से रोका जाए।

इस मामले पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट सहमत हो गया और केंद्र एवं तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया। पीठ ने सरकारी डॉक्टरों की भूमिका की सराहना करते हुए एक बेहद भावपूर्ण टिप्पणी की - 'एक सरकारी डाक्टर अगर उच्च कौशल और विशेषज्ञता हासिल करता है, तो वह किसी निजी डॉक्टर की तुलना में सार्वजनिक स्वास्थ्य की बेहतर सेवा कर सकेगा।'

कोर्ट ने माना कि सेवा में रहते हुए पढ़ाई करने वाले डॉक्टर एक विशेष श्रेणी में आते हैं। बहरहाल, इस मामले की अगली सुनवाई अब जुलाई में होगी।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

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