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'फॉर्म 6 में किए गए गैर-कानूनी बदलाव हटा दिए जाएंगे', क्या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से मुश्किल में ECI?

Published: Tue, 06 Oct 2026 05:51 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 विवाद पर चुनाव आयोग से रिकॉर्ड मांगे हैं, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा किए गए कथित बदलावों पर सवाल उठाए गए हैं।

क्या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से मुश्किल में ECI।

क्या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से मुश्किल में ECI।

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 बदलावों पर चुनाव आयोग से रिकॉर्ड मांगे।

  2. चुनाव आयोग पर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अतिरिक्त घोषणा अनिवार्य करने का आरोप।

  3. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, बिना मंजूरी बदलाव रद किए जा सकते हैं।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। फॉर्म 6 विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने भारत के चुनाव आयोग (ECI) को कानूनी तौर पर मुश्किल में डाल दिया है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) ने एकतरफा तरीके से कानूनी फॉर्म में बदलाव किया। सवाल इससे कहीं ज्यादा बुनियादी है।

क्या चुनाव आयोग ने स्पेशन इंटेंसिव रिविजन (SIR) के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, SIR के अतिरिक्त घोषणा पत्र को वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए एक जरूरी डिजिटल गेटवे बना दिया? यही वह फर्क है जो मौजूदा कानूनी कार्रवाही में आगे क्या होगा, यह तय कर सकता है।

नए वोटर खुद को रजिस्टर करने के लिए फॉर्म 6 का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा कि उसने SIR के दौरान फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन फॉर्म 6 के साथ जुड़े एक एनेक्जर को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सोमवार, 5 अक्तूबर को, CJI सूर्यकांत जो तीन जजों की बैंच की अध्यक्षता कर रहे थे, ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए बर्जन को मंजूरी नहीं दी थी। शीर्ष अदालत ने यह पता लगाने के लिए ECI के रिकॉर्ड मांगे कि बदलावों को मंजूरी किसने दी और कहा अगर यह पाया जाता है कि फैसले जरूरी आम सहमति या बहुमत के बिना लिए गए थे, तो उन्हें रद किया जा सकता है।

यह CEC ज्ञानेश कुमार के लिए सीधी समस्या लगती है, लेकिन ECI के पास एक और तर्क है और यह बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट के ही मई के फैसले से आता है। क्या ECI यह साबित कर सकता है कि उठाए गए सभी कदम नियमों के अनुसार थे या क्या उसने कोई कानूनी कमी छोड़ दी है?

ECI ने बचाव में क्या कहा?

CI का बचाव हमेशा से यही रहा है कि उसने कानूनी फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया। इसके बजाय, उसने SIR प्रक्रिया के लिए एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा।

चुनाव आयोग ने तर्क दिया है कि यह घोषणा-पत्र SIR-विशिष्ट दस्तावेजीकरण ढांचे का हिस्सा था और SC के मई के फैसले ने इस तरह का ढांचा तय करने की उसकी शक्ति को बरकरार रखा था। यह तर्क सही है और इसके पीछे कानूनी आधार भी है।

मई में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' के तहत तय किया गया 'फॉर्म 6' आम वोटर लिस्ट में बदलाव के लिए बनाया गया था।

SIR के मकसद से तार्किक संबंध होना चाहिए- सुप्रीम कोर्ट

SIR जैसी अलग प्रक्रिया के लिए, कमीशन के पास सही डॉक्यूमेंटेशन फ्रेमवर्क बनाने का कुछ बचा हुआ अधिकार था। लेकिन कोर्ट ने उस समय एक जरूरी शर्त भी रखी थी। उसने कहा था कि यह अधिकार असीमित नहीं है,और कानूनी ढांचे से किसी भी तरह के बदलाव का SIR के मकसद से तार्किक संबंध होना चाहिए।

इसलिए, ECI पूरी तरह से यह तर्क दे सकता है कि उसने वही किया जिसकी इजाजत SC के मई के फैसले में दी गई थी। चुनाव आयोग यह तर्क देगा कि उसने 'फॉर्म 6' को बनाए रखा लेकिन साथ ही सघन पुनरीक्षण के लिए जरूरी दस्तावेजी लिंक स्थापित करने के लिए एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र की भी मांग की।

लेकिन इस तर्क का एक दूसरा पहलू भी है और यहीं पर कमीशन को SC की जांच का सामना करना पड़ सकता है। विवाद सिर्फ फिजिकल 'फॉर्म 6' के बारे में नहीं है। यह इस बारे में है कि ECINet पर इस फॉर्म को कैसे लागू किया गया।

डिजिटल गेटवे बन सकता है ECI के लिए समस्या?

कागज पर,'फॉर्म 6' और अतिरिक्त घोषणा-पत्र के बीच का अंतर कानूनी रूप से स्पष्ट लग सकता है। हालांकि, ECI के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet पर, यह अंतर काफी कम मायने रखता है अगर कोई आवेदक अतिरिक्त घोषणा-पत्र पूरा किए बिना 'फॉर्म 6' का आवेदन आगे नहीं बढ़ा सकता है।

ECI का अपना सिटिजन-सर्विस पोर्टल अभी SIR फ्रेमवर्क के तहत फॉर्म 6 भरें और घोषणा-पत्र भरें के लिए अलग-अलग विकल्प दिखाता है। यहीं पर कोर्ट की जांच आगे बढ़ सकती है और ECI को कानूनी झटका लग सकता है।

अगर घोषणा-पत्र सचमुच SIR का एक साथ वाला दस्तावेज है, तो कमीशन मई के फैसले के तहत इसके होने का बचाव कर सकता है। लेकिन अगर सॉफ्टवेयर घोषणा-पत्र को कानूनी 'फॉर्म 6' को पूरा करने के लिए भी एक जरूरी शर्त बना देता है, तो इसका व्यावहारिक असर यह हो सकता है कि कानूनी फॉर्म में एक अतिरिक्त शर्त जुड़ गई है।

दूसरे शब्दों में, कानूनी सवाल यह हो सकता है कि फॉर्म 6 में बदलाव किसने किया? सवाल यह है कि डिजिटल सिस्टम के जरिए फॉर्म 6 के लिए अतिरिक्त घोषणा को अनिवार्य किसने बनाया? ECI के लिए इसका जवाब देना ज्यादा मुश्किल हो सकता है।

आयोग ने उन राज्यों में ECINet से अतिरिक्त घोषणा को पहले ही हटा दिया है जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जबकि जहां यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है, वहां इसे बनाए रखा है। इस बदलाव से ECI को सुधारात्मक कदम उठाने का सबूत दिखाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे कोर्ट को जांच के लिए अमल का एक ठोस रिकॉर्ड भी मिल जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक ECI को इसके लिए दोषी नहीं माना है। उसने रिकॉर्ड्स मांगे हैं। इसलिए, अगला सवाल सिर्फ यह नहीं है कि फॉर्म 6 में बदलाव किसने किया। सवाल यह है कि उस बदलाव को लागू किसने किया और क्या मई के फैसले में कभी इसकी मंजूरी दी गई थी।

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