'आजादी की लड़ाई से बड़ी है वैचारिक लड़ाई', जागरण एजुकेशन कॉन्क्लेव में बोले सुधांशु त्रिवेदी
जागरण एजुकेशन कॉन्क्लेव में भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि भारत पहले भी विश्वगुरु था और आज भी है, लेकिन 'एम' फैक्टर ने हमारे आत्मविश्वास को कमजोर किया है।

जागरण एजुकेशन कान्क्लेव में बोलते हुए भाजपा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। भारत के विश्वगुरु बनने को लेकर उठाए जाने वाले प्रश्नों पर भाजपा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने पुरातन काल से लेकर वर्तमान भारत की उपलब्धियों और अब तक रही परिस्थितियों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत पहले भी विश्वगुरु था और आज भी है, लेकिन 'एम' फैक्टर हमारे आत्मविश्वास को कमजोर करता रहा।
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जागरण एजुकेशन कान्क्लेव में शिक्षा नीति में बदलाव की मजबूत पैरोकारी करते हुए कहा कि यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि हमें वैज्ञानिक विकास से पहले वैज्ञानिक आत्मविश्वास प्राप्त करना है। 2014 के बाद सिर्फ सरकार नहीं बदली, बल्कि विचार बदला है। परिवर्तन के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने दावा किया कि यह वैचारिक लड़ाई आजादी की लड़ाई से भी बड़ी है। इसके लिए सरकार के साथ समाज को भी सक्रिय होना पड़ेगा।
मैकाले का हमारे माइंडसेट पर कब्जा: त्रिवेदी
जागरण एजुकेशन कान्क्लेव के 'विश्वगुरु भारत: संकल्प से वैश्विक नेतृत्व तक' सत्र में सुधांशु त्रिवेदी ने सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस संकल्प को दोहराया कि मैकाले ने 1835 में नई शिक्षा व्यवस्था लाकर हमारे माइंडसेट पर कब्जा कर लिया था। हमें 2035 तक उससे बाहर आना है। उन्होंने सीवी रमन, जेसी बोस, अमल कुमार रॉय, सत्येंद्र नाथ बोस जैसे भारतीय वैज्ञानिकों के आविष्कारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनकी आधारभूत वैज्ञानिक उपलब्धियों को भारत में भी मान्यता नहीं मिली।
क्या है 'M' फैक्टर?
भारतीय ज्ञान परंपरा के कमजोर आकलन का आरोप लगाते हुए कुछ उदाहरण भी दिए। बिना किसी का नाम लिए पुरानी व्यवस्था पर प्रश्न खड़े किए। कहा कि हमें ऐसी चीजें पढ़ाई गईं कि जैसे हम कुछ जानते ही नहीं। इसका मूल कारण था एम फैक्टर। एम फैक्टर को परिभाषित करते हुए बोले- 19वीं सदी में मैकाले फैक्टर आया, 20वीं सदी में मार्कसिस्ट, 21वीं सदी में मार्केटिंग और अब एक ऐसा एम फैक्टर है, जिसे सभी समझ गए होंगे।
भारत की ज्ञान परंपरा का किया जिक्र
भारत की ज्ञान परंपरा का ही उल्लेख करते हुए उन्होंने एक और उदाहरण दिया। कहा कि सप्ताह के दिनों का क्रम यदि ग्रहों के आकार या सूर्य से दूरी के आधार पर होता तो रविवार के बाद सोमवार और फिर मंगलवार नहीं होता। दिन में 24 घंटे की गणना भी आधार उन्होंने बताया कि वैदिक ज्योतिष में होरा होता है। उसी से ग्रीक मान्यता में होरोस्काेप और अंग्रेजी में आवर आया।
होरा में दिन के 12 घंटे और रात के 12 घंटे माने जाते हैं। इस तरह 24 घंटे होते हैं। वहीं, सूर्य के होरा के 24 घंटे बीतने के बाद 25वां घंटे में चंद्र का होरा आता है, फिर मंगल, बुध, गुरु का। इसी क्रम में सप्ताह के दिन निर्धारित हुए हैं। उन्होंने कहा कि वैदिक ज्योतिष के उसी क्रम को आज दुनिया मानती है, इसलिए कह सकते हैं कि हम विश्वगुरु थे नहीं, आज भी हैं।
शाम 5 बजे आता था बजट
त्रिवेदी ने कहा कि भारत में स्वतंत्रता का स्व किस्तों में आया है। देश 1947 में स्वतंत्र हुआ, लेकिन अंग्रेज गवर्नर 1948 तक रहा, अंग्रेज सेनाध्यक्ष 1949 तक, वायुसेना अध्यक्ष 1954 और नौसेना अध्यक्ष 1958 तक रहा। इसी तरह इंडिया गेट पर किंग जार्ज की मूर्ति 1986 तक रही। 1977 तक सभी अखिल भारतीय परीक्षाएं अंग्रेजी में होती थीं। 1997 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार आने तक भारत का बजट शाम पांच बजे आता था, क्योंकि उस समय लंदन में सुबह के 11 बजते थे।
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