'हमने मॉडिफाइड फॉर्म 6 को नहीं दी मंजूरी', चुनाव आयोग के SIR फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी किया, लेकिन अंतरिम ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग को नोटिस

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कई मामलों में एकतरफा फैसले लेने और दो चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना निर्णय लिए जाने के आरोप लगाने वाली याचिकाओं पर नोटिस तो जारी कर दिया है लेकिन किसी भी तरह का अंतरिम आदेश नहीं दिया।
कोर्ट ने कहा कि समाचारपत्र की रिपोर्ट के आधार पर फैसला नहीं लिया जा सकता है। दूसरे पक्ष को सुनना जरूरी है। कोर्ट ने ये भी कहा कि आयोग का यदि कोई निर्णय कानून के अनुरूप नहीं पाया गया तो वह उसे रद कर देगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जोयमाल्या बाग्ची और वी. मोहना की पीठ ने पटना निवासी राकेश कुमार सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान सोमवार वरिष्ठ वकील विकास सिंह की दलीलें सुनने के बाद याचिका में प्रतिपक्षी बनाई गई केंन्द्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डाक्टर सुखबीर सिंह संधू, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और चुनाव आयोग में महानिदेशक (आइटी) सीमा खन्ना को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
इससे पहले सुनवाई के दौरान विकास सिंह ने कहा कि सीईसी की नियुक्ति से जुड़े कानून का मसला बड़ी पीठ के समक्ष विचाराधीन है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को 2023 के संशोधित कानून की धारा 16 के तहत दिए गए विशेष संरक्षण पर सवाल उठाया।
कहा इस धारा के मुताबिक उन्हें पद छोड़ने के बाद भी संरक्षण मिलेगा ऐसा तो किसी के बारे में नहीं होता। विकास सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित करने की भी मांग की। लेकिन कोर्ट मे कहा कि जवाब आने दीजिए, इस तरह एक तरफा फैसला नहीं लिया जा सकता है।
चीफ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर सीईसी को निलंबित कर दिया गया तो चुनाव आयोग का काम ठप हो जाएगा। चुनाव कौन कराएगा। चीफ जस्टिस ने कहा कि चुनाव आयोग से अपेक्षा की जाती है कि वह सर्वसम्मति से या बहुमत से फैसला करेगा। ये भी कहा कि यदि कोई निर्णय कानून के अनुरूप नहीं पाया गया, तो वह उसे रद कर देगा।
सीजेआई ने कहा- परिवर्तित फार्म 6 को कभी नहीं दी मंजूरी, चुनाव आयोग ने कहा कोर्ट ने सही कहा
इस मामले में और भी कई याचिकाएं हैं जिनमें चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने फार्म छह में किए गए बदलावों पर चिंता जताई, जिसका उपयोग नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल करने का आवेदन करने के लिए करते हैं।
इन दलीलों पर चीफ जस्टिस ने कहा कि फार्म छह में किये गए किसी भी संशोधन को हमने मंजूरी नहीं दी है। हम यह बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं। जब रिकार्ड प्रस्तुत किया जाएगा, तो हम यह देखना चाहेंगे कि किसने संशोधन किया है।
कोर्ट के इस बयान से विपक्ष उत्साहित है और आयोग कोर्ट के इस बयान से सहमत है। लेकिन यह भी स्पष्ट किया जा रहा है कि खुद आयोग ने स्पष्ट किया था कि फार्म 6 संशोधित नहीं किया गया है। उसके साथ एक घोषणापत्र एसआइआर वाले राज्यों में जोड़ा गया है।
मामले के मुताबिक फार्म छह में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई है जिसमें मतदाता सूची में शामिल होने का आवेदन करने वाले को यह बताना आवश्यक है कि क्या उनका अपना नाम, या उनके माता-पिता, दादा-दादी का नाम पहले से एसआइआर के समय की मतदाता सूची में दर्ज था।
आलोचकों का तर्क है कि इससे पहली बार मतदाता सूची में शामिल होने वालों के लिए एक बाधा उत्पन्न होती है। इस मामले में चुनाव आयोग का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई के फैसले में इसे मंजूर किया है।
मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट के 27 मई के फैसले के पैरा 45 के बिंदु एफ जो कि पृष्ठ 58 पर है, में फार्म छह के साथ घोषणा का जिक्र है जो कि कोर्ट ने चुनाव आयोग की एसआइआर प्रक्रिया के आदेश को उद्धत किया है। उसमें केवल भारतीयों के वोटर बनने की बाध्यता की बात कही गई थी।
उसके अगले पैरा में कोर्ट ने माना था कि चुनाव आयोग ने एसआइआर कराने की प्रक्रिया जिसमें फार्म 6 के साथ घोषणापत्र जोड़ा गया, उसके तहत प्रभावशाली तर्क दिए है। यानी कोर्ट ने इसे स्वीकार्यता दी थी।
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