मकसद एक, रास्ते अलग-अलग... INDI गठबंधन की पार्टियों का CJP को समर्थन लेकिन कांग्रेस ने क्यों बनाई दूरी?
INDI गठबंधन और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) चुनाव में कथित गड़बड़ी और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर अलग-अलग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

विरोध प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और अभिजीत दीपके। (फाइल फोटो।)
HighLights
INDI गठबंधन और CJP की CEC इस्तीफे की समान मांग।
कांग्रेस ने CJP के विरोध प्रदर्शनों से बनाई राजनीतिक दूरी।
NEET और अन्ना हजारे आंदोलन से मिलती-जुलती स्थिति।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चुनाव में गड़बड़ी और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर INDI गठबंधन की पार्टियां मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रही हैं और विरोध प्रदर्शन हो रहा है। वहीं, कॉकरोच जनता पार्टी भी सीईसी कुमार का इस्तीफा मांग रही है।
इन समानांतर विरोध प्रदर्शनों के बारे में जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी से पूछा गया तो उन्होंने कहा, "सभी विरोध प्रदर्शन असल में एक ही विरोध प्रदर्शन हैं।" सोमवार को INDI गठबंधन के नेताओं ने कथित चुनावी गड़बड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया, जबकि सीजेपी ने चुनाव आयोग के खिलाफ अपना अभियान जारी रखा। हालांकि मकसद एक ही होने के बावजूद भी कांग्रेस नेता और सीजेपी नेताओं ने कभी भी मंच साझा नहीं किया।
इरादा एक लेकिन रास्ते अलग-अलग
10 अक्टूबर के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान भी दोनों समूहों ने अलग-अलग रास्ते अपनाए थे। दिल्ली पुलिस ने जिन लोगों को हिरासत में लिया, उनमें सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी, आप नेता अरविंद केजरीवाल और वामपंथी नेता शामिल थे।
वहीं, राहुल गांधी चेन्नई में थे। हालांकि उन्होंने पुलिस की कार्रवाई की निंदा की। राहुल गांधी ने वोट चोरी को विपक्ष का मुख्य राजनीतिक नारा बनाया। सीजेपी ने भी अपने सड़क प्रदर्शनों में इसे अपनाया है लेकिन एक जैसी मांगों के बावजूद, दोनों पक्षों ने ज्यादातर अलग-अलग विरोध कार्यक्रम चलाए हैं।
खड़ा हुआ बड़ा राजनीतिक सवाल
कांग्रेस उस आंदोलन से दूरी क्यों बनाए हुए है जिसकी एक मुख्य राजनीतिक मांग उसकी अपनी मांग जैसी ही है? क्या यह राजनीतिक जगह पाने की लड़ाई है? चुनाव आयोग के खिलाफ सीजेपी का आंदोलन उस बड़ी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा है जिसे कांग्रेस ने अपनी विपक्ष की रणनीति का मुख्य आधार बनाया है।
राहुल गांधी के वोट चोरी कैंपेन में कर्नाटक, हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार में कथित चुनावी गड़बड़ियों को मुद्दा बनाया गया है। सीजेपी के विरोध प्रदर्शनों में अक्सर सुनाई देने वाला नारा वोट चोर, गद्दी छोड़ भी राहुल गांधी द्वारा लोकप्रिय बनाई गई राजनीतिक भाषा से ही लिया गया है। हालांकि, कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय झा इस बात को खारिज करते हैं कि दोनों पक्ष राजनीतिक जगह पाने के लिए एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं।
उनका कहना है, "मुझे नहीं लगता कि लड़ाई सीजेपी और कांग्रेस के बीच है। सिविल सोसाइटी के सभी सदस्य, छात्र, राजनीतिक पार्टियां, बुद्धिजीवी, लेखक, एक्टिविस्ट, एनजीओ और भारतीय लोकतंत्र की चिंता करने वाले सभी लोग अकेले और मिलकर, दोनों तरह से लड़ रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "यह कहना कि दोनों के बीच कोई मुकाबला है ये बीजेपी का प्रोपेगैंडा है और हमें इसके झांसे में नहीं आना चाहिए।" उनका तर्क है कि दोनों समूह बिना साथ काम किए भी एक जैसी मांगों के लिए काम कर सकते हैं।
NEET विरोध प्रदर्शनों में भी दिखा ऐसा ही पैटर्न
कांग्रेस और सीजेपी के बीच का रिश्ता सिर्फ एक-दूसरे से होड़ करने जैसा नहीं है। 2026 में नीट-यूजी विवाद पर उनकी प्रतिक्रियाओं से पता चला कि वे अपने अलग-अलग राजनीतिक एजेंडे को बनाए रखते हुए भी एक ही मुद्दे का समर्थन कर सकते हैं।
परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर हुए विवाद के बीच सीजेपी ने जवाबदेही, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। 20 जुलाई को सीजेपी ने जंतर-मंतर से संसद तक चलो संसद मार्च निकाला। दिल्ली पुलिस ने निषेधाज्ञा के उल्लंघन और हिंसा का हवाला देते हुए मार्च को रोक दिया, जबकि सीजेपी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल का प्रयोग किया।
अगले दिन कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के घर के बाहर एक अलग विरोध प्रदर्शन किया, जिसकी अगुवाई राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और प्रियंका गांधी वाड्रा ने की। पार्टी ने प्रधान के इस्तीफे, पेपर लीक और शिक्षा सुधारों पर संसदीय चर्चा और पुलिस की कार्रवाई के लिए छात्रों से माफी मांगने की मांग की।
सीजेपी के मार्च से पहले ही कांग्रेस परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर चिंता जता रही थी। राहुल गांधी कोटा और देहरादून में छात्रों से मिले थे, जबकि पुलिस की कार्रवाई के बाद उन्होंने और प्रियंका गांधी वाड्रा ने राम मनोहर लोहिया अस्पताल में घायल छात्रों से मुलाकात की थी।
दोनों पक्षों की मांगें एक जैसी थीं, लेकिन उन्होंने अपने कार्यक्रम अलग-अलग आयोजित किए। यही पैटर्न अब ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों में भी दिख रहा है।
असम की घटना से सामने आए मतभेद
असम में सीजेपी की हालिया गतिविधियों के बाद ये मतभेद और साफ हो गए। कांग्रेस प्रवक्ता रीतम सिंह ने आरोप लगाया कि सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने कांग्रेस नेताओं (जिनमें असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई भी शामिल थे) के साथ शिष्टाचार मुलाकात करने से इनकार कर दिया, जबकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हिरासत में लिए गए सीजेपी सदस्यों की रिहाई में मदद की थी।
रीतम सिंह का दावा है कि रांका ने बातचीत करने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि इस पहल को आम आदमी पार्टी की पहल माना जा रहा था। सिंह ने आरोप लगाया, "आम आदमी पार्टी दूसरों के मुद्दों को अपना बताने और उन पर कब्जा करने के लिए जानी जाती है।" उन्होंने आम आदमी पार्टी पर दूसरों के नेतृत्व वाले आंदोलनों से खुद को जोड़ने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया।
बता दें कि ये कांग्रेस के आरोप हैं और इनसे स्वतंत्र रूप से यह साबित नहीं होता कि सीजेपी प्रतिनिधियों ने बैठक से इनकार क्यों किया। यह बात राजनीतिक रूप से इसलिए अहम थी क्योंकि संविधान बचाओ राहुल गांधी के कैंपेन का एक मुख्य हिस्सा रहा है।
रंका ने उस इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों पर सीजेपी के फाउंडर अभिजीत दीपके को निशाना बनाने का आरोप भी लगाया, क्योंकि यह आंदोलन जोर पकड़ रहा था। हालांकि, जिन पोस्ट का जिक्र किया गया उनमें से किसी में भी सीधे तौर पर कांग्रेस का नाम नहीं लिया गया, लेकिन बाद में सिंह के साथ हुई बातचीत से दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आ गए।
इस बातचीत से राजनीतिक जुड़ाव और तालमेल को लेकर मतभेद साफ जाहिर हुए, जबकि दोनों पक्ष एक जैसी मांगें उठा रहे थे।
लेफ्ट, टीएमसी और आप इसमें क्यों शामिल हुईं?
10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक रुख में अंतर को और साफ कर दिया। प्रदर्शन से पहले ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से सीजेपी का समर्थन करते हुए कहा, "हम कॉकरोच जनता पार्टी और युवा पीढ़ी व छात्रों का पूरा समर्थन करते हैं और मेरी विनम्र अपील है कि कृपया इन अत्याचारों को रोकें।"
बाद में वह दिल्ली में विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं और टीएमसी नेताओं के साथ हिरासत में लिए जाने से पहले अपने मुंह पर बैंड-एड चिपका लिया। केजरीवाल ने घोषणा की कि वह अपने परिवार के साथ इसमें शामिल होंगे, जबकि लेफ्ट के वरिष्ठ नेताओं ने आंदोलन का समर्थन किया और प्रदर्शन से पहले लगाई गई पाबंदियों को चुनौती दी।
कांग्रेस ने इस तरह से इसमें शामिल होने की घोषणा नहीं की थी लेकिन जंतर-मंतर पर राहुल गांधी की गैर-मौजूदगी का मतलब पुलिस की कार्रवाई पर उनकी चुप्पी नहीं था। उन्होंने बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लिए जाने की निंदा की, दिल्ली पुलिस पर गुंडागर्दी का आरोप लगाया और कहा कि सरकार महिलाओं और युवा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दे रही है।
उन्होंने कांग्रेस और INDI गठबंधन के नेताओं के भारत के मुख्य न्यायाधीश से मिलने की योजना की भी घोषणा की। कांग्रेस ने सरकार को चुनौती देना जारी रखा और साथ ही अपनी राजनीतिक लामबंदी और संस्थागत हस्तक्षेप भी जारी रखे। फर्क इस बात में है कि किसी मकसद का समर्थन करना और किसी खास विरोध मंच से जुड़ना... ये दोनों अलग-अलग चीजें हैं।
अन्ना हजारे वाला सबक
सीजेपी को लेकर चल रहे तनाव में 2011 के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन की झलक मिलती है। बीजेपी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन का खुलकर समर्थन किया था। बाद में कांग्रेस ने बीजेपी और आरएसएस पर आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी सरकार को कमजोर करने के लिए इस आंदोलन का फायदा उठाया।
इस आंदोलन का राजनीतिक असर काफी अहम रहा। इसके प्रमुख चेहरों में से एक अरविंद केजरीवाल ने 2012 में आम आदमी पार्टी बनाई। यह समानता कांग्रेस और सीजेपी के बीच मौजूदा खींचतान के संदर्भ में भी प्रासंगिक है। कांग्रेस प्रवक्ता रीतम सिंह ने आरोप लगाया है कि सीजेपी की असम में सक्रियता को आप की पहल के तौर पर देखा गया। उन्होंने पार्टी पर दूसरों के मुद्दों का फायदा उठाने और उन्हें हथियाने का आरोप लगाया।
यह आरोप एक सवाल खड़ा करता है कि क्या कांग्रेस सीजेपी को सिर्फ एक नागरिक आंदोलन के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे मंच के तौर पर देखती है जिसके राजनीतिक संबंध और भविष्य की दिशा मायने रखती है।
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