'UN एक्सपर्ट्स शब्द अपने आप में विरोधाभासी हैं', रूबियो ने विरोध प्रदर्शनों को बताया भारत का आंतरिक मामला
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत में चुनाव आयोग के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर संयुक्त राष्ट्र की आलोचना को सिरे से खारिज कर दिया।
-1792575000301_m.webp)
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो(फोटो: पीटीआई)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बुधवार को भारत में चुनाव आयोग के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की आलोचना को सिरे से खारिज कर दिया।
उन्होंने यूएन विशेषज्ञों शब्द को विरोधाभासी बताते हुए कहा कि यह भारत का पूरी तरह से घरेलू राजनीतिक मामला है, इसपर फैसला भारतीयों को ही करना चाहिए।
यूएन एक्सपर्ट्स पर कसा तंज
भारत में विपक्षी दलों और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों तथा उन पर कार्रवाई को लेकर यूएन विशेषज्ञों के आरोपों पर पूछे गए सवाल के जवाब में रूबियो ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन भारत की अंदरूनी राजनीति में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा।
उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यूएन एक्सपर्ट्स उनका पसंदीदा विषय हैं और यह शब्द ही अपने आप में विरोधाभासी है। रूबियो ने कहा कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जहां चुनाव होते हैं, इसलिए वह देश के राजनीतिक या आंतरिक मामलों पर अपनी कोई राय नहीं देंगे।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और उपद्रव में फर्क
अमेरिकी विदेश मंत्री ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और तोड़फोड़ वाली हिंसा के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक समाजों में अलग-अलग राजनीतिक विचार व्यक्त करने की आजादी एक अहम खूबी है।
यूरोप के हिंसक प्रदर्शनों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वह उन दंगों की बात नहीं कर रहे हैं जहां इमारतों में तोड़फोड़ की जाती है या उन्हें जला दिया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख
इससे पहले, यूएन विशेषज्ञों ने भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पाबंदी, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित रूप से जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और गायब होने की घटनाओं को लेकर चिंता जताई थी।
भारत ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। भारतीय राजनयिक बरखा ताम्रकार ने कहा कि असत्यापित आरोपों और अधूरे आंकड़ों के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की गलत छवि पेश करने की कोशिशों का भारत कड़ा विरोध करता है।
उन्होंने रेखांकित किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 मानवाधिकारों की रक्षा करता है और मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए। भारत ने मानवाधिकारों के मुद्दे पर निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित चर्चा की मांग की।
