माला दीक्षित, नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता का मुद्दा बहस से निकल कर एक बार फिर सुप्रीमकोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीमकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है जिसमें केन्द्र सरकार को पूरे देश के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश मांगा गया है। यह याचिका राष्ट्रवादी मुस्लिम महिला संघ की अध्यक्ष फराह फैज ने दाखिल की है।

पेशे से वकील फराह फैज ने मुस्लिमों में प्रचलित तीन तलाक, चार शादियां और निकाह हलाला को भी सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दे रखी है जिस पर कोर्ट तीन तलाक मुद्दे पर 11 मई से होने वाली सुनवाई मे विचार करेगा।पूरे देश के लिए समान नागरिक संहिता की मांग करते हुए कहा गया है कि गत 14 फरवरी को तीन तलाक मामले में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की पीठ ने साफ कर दिया था कि वे सिर्फ तीन तलाक और बहुविवाह पर विचार करेंगे। वे समान नागरिक संहिता पर विचार नहीं करेंगे। कहा गया है कि इसी कारण समान नागरिक संहिता पर यह अलग याचिका दाखिल की है। कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश दिया गया है लेकिन राजनीति के चलते संसद ने सिर्फ हिन्दू कानूनों के अधिनियम ही पास किये। ये संविधान के नीति निदेशकतत्वों के खिलाफ है।

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देश का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा समुदाय होने के बावजूद मुस्लिमों को कभी नहीं छुआ गया। सुप्रीमकोर्ट संविधान का संरक्षक है इसलिए यह मुद्दा कोर्ट में उठाया गया है। कोर्ट भारत सरकार को निर्देश दे कि वह भेदभाव को खत्म कर देश भर के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करे ताकि देश के मुसलमान प्रगतिवादी सुधारों से वंचित न रहें।कहा है कि राज्यो ने इसे लागू करने केलिए कोई कदम नहीं उठाया। सामान्य तौर पर इसके लिए अल्पसंख्यकों को जिम्मेदार ठहराया जाता है जबकि वास्तविकता ये है कि सामान्य मुसलमानों का इससे कोई लेना देना नहीं है। सिर्फ नेताओं जो या तो राजनेता हैं या स्वघोषित कम्युनिटी लीडर हैं, अपने हितों के लिए और अपनी प्रभुता बनाए रखने के लिए इस मुद्दे का राजनीतिकरण करते हैं। याचिकाकर्ता ने इस बारे में विभिन्न राजनेताओं को पत्र लिखे राष्ट्रपति को भी पत्र लिखा पर कुछ नहीं हुआ।

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समान नागरिक संहिता आज की सबसे बड़ी जरूरत है ताकि धर्म निरपेक्ष देश में नागरिकों के बीच क्षेत्र और धर्म के आधार पर भेदभाव खत्म हो और वोट बैंक की राजनीति बंद हो। कहा गया है कि समान नागरिक संहिता कोई नई थ्योरी नहीं है बल्कि मोहम्मद साहब ने मदीना चार्टर में 622 सीई में जो कि दुनिया का पहला लिखित संविधान है, में ये प्रस्तुत की है। कहा गया है भारतीय संविधान में मिले बराबरी और सम्मान से जीवन जीने के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी है।

इस देश में विभिन्न जाति, वर्ण, समुदाय के लोग रहते हैं यहां शादी, तलाक, संरक्षक और उत्तराधिकार के कानून हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई धर्मो में अलग अलग हैं। विभिन्न पर्सनल ला में कोई समानता नहीं है। पर्सनल ला में अधिकार धर्म और लिंग पर आधारित हैं। शादी, तलाक, उत्तराधिकार आदि सामाजिक मुद्दे हैं और ये धर्मनिरपेक्ष प्रकृति के हैं इसलिए इन्हे कानून से नियमित किया जा सकता है। अनुच्छेद 44 संविधान में दिए गये धार्मिक आजादी (अनुच्छेद 25 और 26) का उल्लंघन नहीं करता। उदाहरण के तौर पर यूनीफार्म फैमिली ला हैं। हिन्दू कोड बिल सिर्फ हिन्दुओं के लिए नहीं है बल्कि ये सिख बौद्ध और जैन पर भी लागू होता है और पिछले 6 दशकों से किसी ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई।

समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। हिन्दू कोड बिल के समय भी कई वरिष्ठ नेताओं ने विरोध किया था लेकिन ये पारित हुआ क्योंकि नेहरू जी की दृड राजनैतिक इच्छाशक्ति थी।

Posted By: Ravindra Pratap Sing

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