इलाहाबाद। पद्मविभूषण व पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित प्रख्यात बांसुरी वादक पं.हरिप्रसाद चौरसिया ने कहा कि फिल्मकारों व साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने का औचित्य मेरी समझ से परे है। विरोध करने के कई तरीके हैं, जिसे अपनाया जा सकता है। पुरस्कार लौटाने से समाज में गलत संदेश जा रहा है। अनायास औचित्यहीन बहस छिड़ गई है। देश में गलत परंपरा शुरू हुई है।

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एक कार्यक्रम में रविवार को अपने गृहनगर आए पं. हरिप्रसाद चौरसिया सम्मान लौटाने के पीछे कन्नड़ लेखक कलबुर्गी व दादरी में एखलाक की हत्या का तर्क देने से असहमत हैं। कहते हैं जो होना है वह होकर रहता है, उसे दूसरा रंग देना गलत है। मां के गर्भ से जन्म लेने वाले कई बच्चे चंद घंटों, दिनों व साल में किसी न किसी बहाने मर जाते हैं, उसमें कोई क्या कर सकता है यह विधि का विधान है।

उन्होंने कहा कि पुरस्कार लौटाने से देश की छवि दुनिया में खराब हो रही है, जिससे मैं अत्यंत आहत हूं। लगा है कि ऐसा करने वाले पुरस्कार चाहते नहीं थे। सरकार को देखना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है। खुद को मिला पुरस्कार लौटाने से साफ इनकार करते हुए उन्होंने कहा कि मेरे लिए हर पुरस्कार राष्ट्र से मिली अमूल्य धरोहर जैसी है, उसे लौटाकर देश व देशवासियों का अपमान नहीं कर सकता। पुरस्कार लौटाने वालों के लिए गायक अभिजीत द्वारा नपुंसक शब्द के इस्तेमाल पर कहा कि ऐसे अमर्यादित शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

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फिल्मों से गायब हुआ स्वर

चांदनी, लम्हे व सिलसिला जैसी फिल्मों में संगीत देने वाले पं. हरिप्रसाद मौजूदा दौर के गानों से भी व्यथित दिखे। कहा कि आज की फिल्मों में सुर नहीं है, जहां सुर नहीं है वहां मेरा कोई काम नहीं। आज हनी सिंह का जमाना है। कुछ समय यही चलेगा, लेकिन बदलाव जल्द होगा ऐसा मेरा विश्र्वास है। शास्त्रीय संगीत का भविष्य अत्यंत उज्जवल है, युवा पीढ़ी उससे जुड़ रही है।

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