माला दीक्षित, नई दिल्ली। अयोध्या राम जन्मभूमि पर बनाए गए विवादित ढांचे को इस्लामिक कानून में मस्जिद नहीं माना जा सकता क्योंकि मस्जिद न तो जबरदस्ती कब्जा की गई जगह पर बनाई जा सकती है और न ही मंदिर तोड़ कर बनाई सकती है। यह भी साबित नहीं हुआ कि बाबर ने इसे अल्लाह को समर्पित किया था। ये दलीलें गुरुवार को अखिल भारत श्रीराम जन्मभूमि पुनुरोद्धार समिति की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दी गईं। यह भी कहा गया कि 1992 में ढहाया गया ढांचा मंदिर था जहां रामलला विराजमान स्थापित हैं, वह बाबरी मस्जिद नहीं थी।

समिति के वकील पीएन मिश्रा और रंजना अग्निहोत्री ने हाईकोर्ट में दी गई मुस्लिम विद्वानों की गवाही का हवाला देकर गुरुवार को यह साबित करने की कोशिश की कि विवादित ढांचा मस्जिद नही था। दिन भर चली दलीलों पर पीठ की ओर से भी कई सवाल पूछे गए। कोर्ट ने कहा कि 500 साल बाद कोर्ट के लिये यह तय करना थोड़ा मुश्किल होगा कि बाबर ने उसे अल्लाह को समर्पित किया था कि नहीं। पीएन मिश्रा की बहस शुक्रवार को भी जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि राम जन्मस्थान के राजस्व रिकार्ड में छेड़छाड़ हुई है और गुरुवार को समय कम होने के कारण वह शुक्रवार को इस बारे मे कोर्ट में ब्योरा पेश करेगे।

बुहरानुद्दीन की हाईकोर्ट मे हुई गवाही 
मिश्रा ने मस्जिद के बारे में इस्लाम के विशेषज्ञ के तौर पर सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश किये गए गवाह मोहम्मद इदरिश और बुहरानुद्दीन की हाईकोर्ट मे हुई गवाही और जिरह का हवाला दिया। दोनों विद्वानों ने उसमें कहा है कि इस्लाम में कुरान और हदीस के मुताबिक मस्जिद खाली जगह पर बनवाई जाती है। मस्जिद के लिए वक्फ बनाना जरूरी है और वाकिफ उस जमीन का मालिक होना चाहिए। जहां देवी देवता या स्त्री पुरुष पशु की मूर्तियां हों वहां पढ़ी गई नमाज नाजायज होती है।

मिश्रा ने कहा कि विवादित ढांचे में वाराह की मूर्ति बनी थी। मिश्रा ने हाईकोर्ट के निष्कर्षो का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने बहुमत से माना है कि मुस्लिम पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि वहां बाबर ने मस्जिद बनवाई थी और न ही यह साबित हुआ कि बाबर उस जमीन का मालिक था। इस पर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने फैसले का अगला खंड पढ़ाया जिसमें बाबर द्वारा मस्जिद बनाए जाने की बात थी। मिश्रा ने कहा कि जस्टिस एसयू खान के फैसले में विरोधाभासी बातें दर्ज हैं जिससे पीठ के न्यायाधीशों ने भी सहमति जताई।

जहां दो वक्त की अजान नहीं वह मस्जिद नहीं
मिश्रा की दलीलों पर जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि यहां तीन बातें मुख्य हैं कि क्या वहां कोई ढांचा था। क्या वह ढांचा मस्जिद थी। और क्या वह ढांचा अल्लाह को समर्पित किया गया था। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यहां सवाल यह नहीं है कि किसने उसे बनवाया था और क्या उसे अल्लाह को समर्पित किया गया था। सवाल यह है कि लोग उसे क्या मानते हैं। जैसे तिरुपति का मंदिर कब बना यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि लोग उसे क्या मानते हैं वह महत्वपूर्ण है। मिश्रा ने कहा कि यहां हिन्दू उसे मंदिर कहते है और मुसलमान मस्जिद बताते हैं। वहां 1934 के बाद सिर्फ शुक्रवार को नमाज होती थी। इस्लामिक कानून मे जहां दो वक्त अजान नहीं होती उसे मस्जिद नहीं कहा जा सकता।

शासक भी धर्म के आधीन है
इस्लाम मे शासक कितना भी स्वतंत्र क्यों न हो लेकिन वह धर्म के आधीन होता है वह धर्म के खिलाफ नहीं जा सकता। बाबर ने अगर उस ढांचे को अल्लाह को समर्पित नहीं किया था तो उसे मस्जिद नहीं माना जाएगा उसे महज बाबर की हवेली (मैंशन)कहा जा सकता है

जस्टिस बोबडे पूछा कि क्या कोई राजा राज्य की संपत्ति को वक्फ कर सकता है मिश्रा ने कहा नहीं कर सकता। उन्होंने इस बारे में मदीना की मस्जिद के लिए जमीन लेने और ताजमहल बनवाने के लिए राजा जयसिंह से जमीन खरीदने के शाहजहां के फरमान का भी जिक्र किया।

किस्सों पर मुस्लिम पक्ष ने उठाई आपत्ति
मुस्लिम पक्ष के वकील ने मिश्रा की दलीलों पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि ये अभी तक की बहस में 24 ऐसे किस्से कहानियों का जिक्र कर चुके हैं जो केस का हिस्सा नहीं हैं। मिश्रा ने कहा कि वह अपने ढंग से बहस करने के लिए स्वतंत्र हैं। हालांकि कोर्ट ने सीधे तौर पर मिश्रा से कुछ नहीं कहा बस इतना कहा कि वह बहस के साथ ही संबंधित दस्तावेजों का हवाला देते रहें।

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Posted By: Dhyanendra Singh

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