चोल वंश के सेंगोल से दिवेर के युद्ध तक... आक्रांताओं की जगह अब छात्र पढ़ेंगे देश की बहादुरी की भी कहानियां
NCERT ने नौवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में बदलाव किए हैं, जिसमें अब विदेशी आक्रांताओं की जगह भारतीय बहादुरी ...और पढ़ें

नौवीं कक्षा में भारतीय बहादुरी की कहानियाँ पढ़ाई जाएंगी

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अरविंद पांडेय, जागरण। स्कूलों में लंबे समय से प्रमुखता से पढ़ाए जा रहे विदेशी आक्रांताओं की जगह छात्रों को अब देश की बहादुरी की कहानियां भी पढ़ने को मिलेगी।
इनमें महाराणा प्रताप का मुगलों के खिलाफ लड़ा गया ऐतिहासिक दिवेर युद्ध सहित दो ऐसी रानियां की वीरता की कहानियां भी शामिल है, जिनके बारे कभी बताया या पढ़ाया नहीं गया।
इसके साथ ही ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं या विद्रोह के बारे में भी पढ़ाया जाएगा, ताकि देश की नई पीढ़ी को यह बताया जा सके कि हमने गुलामी को आसानी से नहीं स्वीकारा था।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ( एनसीईआरटी) ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( एनईपी) के तहत नौवीं कक्षा के लिए तैयार की गई सामाजिक विज्ञान -भाग दो की पाठ्यपुस्तक में इसे शामिल किया है।
नौवीं कक्षा में भारतीय बहादुरी की कहानियां पढ़ाई जाएंगी
इनमें नए संसद भवन में स्थापित किए गए सेंगोल के बारे भी जानकारी दी है। यह जुडाव चोल राजवंश के समय से है। इसमें राजा अपना उत्तराधिकारी चुनता था तो सत्ता हस्तांतरण के दौरान प्रतीक के रूप में सेंगोल को सौंपता था।
खासबात ये है कि पाठ्यपुस्तक में मुगलों सहित विदेशी आंक्राताओं के भी पाठ है, लेकिन इसमें उनके साम्राज्य विस्तार की जगह कर व बाजार व्यवस्था, भूमि प्रबंधन आदि से जुड़ी विषयवस्तु को शामिल किया गया है।
यानी मूल रूप से किताब भारतीय हीरो को केंद्रित कर लिखी गई है। इसके साथ ही नौवीं कक्षा में चार खंड़ों में पढ़ाई जाने वाले सामाजिक विज्ञान विषय को अब दो पुस्तकों में बदल दिया गया है।
इनमें भाग दो में प्राचीन इतिहास के सात ही आधुनिक भारत की पहल, जैसे एनईपी, खेलो इंडिया नीति, स्टार्टअप, वित्तीय प्रबंधन आदि से जुड़ी विषय वस्तु को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है।
इनके बारे में विस्तार से पढेंगे छात्र
दिवेर का युद्धः यह युद्ध महाराणा प्रताप और मुगल शासक अकबर के बीच विजयादशमी के दिन 1582 में लड़ा गया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने शानदार जीत दर्ज की थी। इस ऐतिहासिक युद्ध में मेवाड़ की सेना ने मुगल बादशाह अकबर की फौज को करारी शिकस्त दी थी।
रानी नायकी देवी और रानी रूद्रमा देवीः चालुक्य साम्राज्य की रानी नायकी देवी ने 1178 में कसरहदा में मुहम्मद गोरी को हराया था। वहीं पूर्वी दक्कन के काकतीय वंश की रानी रुद्रमा देवी (शासन 1262 से 1289 तक) ने कई बार दिल्ली सल्तनत का विरोध किया और राज्य की रक्षा की।
रानी अब्बक्काः आज के कर्नाटक में स्थित उल्लाल की रानी अब्बक्का ने (1525–1570 तक) अपने शासन काल के दौरान पुर्तगाली नौसेना को करारी शिकस्त दी थी। यह समुद्र में किसी यूरोपीय औपनिवेशिक ताकत को पीछे खदेड़ने वाली एक ऐसी भारतीय शासक थी, जिन्हें कम लोग जानते है।
जाट विद्रोहः भारी टैक्स के बोझ का सामना करते हुए गंगा व यमुना दोआब के जाट किसानों ने मुगलों के खिलाफ दो बार विद्रोह किया। 1669 में गोकुल जाट के नेतृत्व में व 1686 में सिंसिनी और सोगर के जमींदारों के नेतृत्व में।
मुश्किल दौर में आस्थाः पाठ्यपुस्तक में सिख गुरुओं की हिम्मत और सहनशक्ति की विरासत के अध्याय को भी प्रमुखता से जगह दी गई है। जिसमें गुरु अर्जुन देव और गुरु तेग बहादुर की शहादत और खालसा की स्थापना पर विस्तार से चर्चा की गई है।
