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घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने के लिए होगा ‘समुद्र मंथन’, कैबिनेट से नई योजना को मंजूरी

Published: Fri, 31 Jul 2026 09:03 PM (IST)

पश्चिम एशिया संकट के कारण ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने 'समुद्रमंथन' राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंजूरी दी है।

(यह तस्वीर AI से बनाई गई है)

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संकट की वजह से भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा का जो खतरा बढ़ रहा है, उसे देखते हुए केंद्र सरकार ने घरेलू स्तर पर हाइड्रोकार्बन खोज की कोशिशों को तेज करने का फैसला लिया है।

पीएम नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में ‘समुद्रमंथन’ नाम की राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंजूरी दे दी गई। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना की कुल लागत 84,084 करोड़ रुपये है।

केंद्र ने 'समुद्रमंथन' अपतटीय अन्वेषण योजना को दी मंजूरी

इसे वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य भारत की समुद्री सीमा के भीतर डीपवाटर और अल्ट्रा-डीपवाटर क्षेत्रों तथा फ्रंटियर बेसिनों में तेल व गैस की खोज को तेजी से आगे बढ़ाना है।

केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसके बारे में जानकारी देते हुए बताया कि, “योजना के तहत गहरे समुद्र और बहुत गहरे समुद्र में खोदे जाने वाले प्रत्येक अन्वेषण कुएं के लिए सरकार 650 करोड़ रुपये तक की सहायता देगी।

योजना की कुल लागत में से 43,200 करोड़ रुपये अगले पांच वर्षों में गहरे समुद्री तटों में तेल व गैस खोज के लिए ड्रिलिंग के लिए आवंटित किए गए हैं।” भारत अभी तक अपने समुद्री तटों से तेल व गैस निकालने के काम पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दे पाया है।

वजह इनकी बेहिसाब लागत है। गुजरात के समुद्री तट के पास अल्ट्रा-डीपवाटर क्षेत्रों (जहां पानी की गहराई 1,500 मीटर से अधिक हो) में एक तेल कुआं ड्रिलिंग करने लागत करीब 950 करोड़ से 2,400 करोड़ रुपये तक होती है। कई बार असलता मिलने से पूरी परियोजना चौपट हो जाती है।

₹84,084 करोड़ की लागत से 2030-31 तक लक्ष्य

कई ड्रिलिंग के बाद सफलता मिलती है और यह भी पता नहीं होता कि वहां से तेल व गैस कितनी निकलेगी। केजी बेसिन एक बड़ा उदाहरण है। कभी इस क्षेत्र के बारे में बताया गया था कि इससे निकलने वाली गैस व तेल से भारत आत्मनिर्भर हो जाएगा। ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कैबिनेट से मंजूरी नई योजना के तहत 10,000 करोड़ रुपये साझा बुनियादी ढांचे के विकास के लिए रखे गए हैं, ताकि नई खोजों को उत्पादन से जोड़ा जा सके। यह मदद उन कंपनियों को दी जाएगी जो अपतटीय क्षेत्रों के ल लि जोखिम लेंगे।

इसके अलावा अपतटीय डेटा अधिग्रहण के लिए 28,534 करोड़ रुपये और तेल-गैस विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रों के विकास के लिए 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस तरह से देखा जाए तो अगर कोई वैश्विक तेल कंपनी भारत के गहरे समुद्री क्षेत्र में तेल व गैस खोजने के लिए आती है तो उसे काफी आर्थिक मदद केंद्र की तरफ से दी जाएगी।

योजना में बड़े पैमाने पर भूकंपीय सर्वेक्षण, वैज्ञानिक ड्रिलिंग, डिजिटल कार्यक्रम प्रबंधन, तकनीक अपनाने, क्षमता निर्माण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे उपाय भी शामिल हैं। सरकार को उम्मीद है कि इस योजना से 60 करोड़ टन तेल या गैस या अन्य हाइड्रोकार्बन भंडार खोजे जा सकते हैं।

घरेलू तेल-गैस उत्पादन बढ़ाकर आयात निर्भरता घटाना

पिछले एक दशक में भारत की कच्चे तेल आयात पर निर्भरता 77 फीसद से बढ़कर 88 फीसद हो गई है। प्राकृतिक गैस की जरूरत का करीब आधा हिस्सा भी आयात से पूरा होता है, जिसका इस्तेमाल उर्वरक उत्पादन, बिजली उत्पादन, सीएनजी और घरेलू पाइप गैस में होता है। पश्चिम एशिया में हालिया संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान पैदा कर दिखा दिया कि आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं कितनी संवेदनशील हैं।

यह स्थिति भारत की विकास यात्रा के लिए गंभीर खतरा बन गई है क्योंकि ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों में उतार-चढ़ाव आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन और आम आदमी के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। यह देखा जा रहा है कि कैसे भारत की तेल आयात को लेकर दबाव बनाने की रणनीति अपनाये हुए है।

ऐसे में पुराने तेल-गैस क्षेत्रों में प्राकृतिक गिरावट और नए फ्रंटियर बेसिनों में निवेश की कमी ने घरेलू उत्पादन को दबाव में रखा है। घरेलू खोज और उत्पादन बढ़ाने की सरकार की पारंपरिक नीतियों का कोई खास नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है।

पिछले दशक में सरकार ने कई सुधारों जैसे पूरे अपतटीय क्षेत्र को खोलने, हाइड्रोकार्बन अन्वेषण एवं लाइसेंसिंग पॉलिसी (एचईएलपी) और ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (ओएएलपी) लागू करने, कंपनियों को राजस्व साझाकरण अनुबंधों की अनुमति देने जैसे कदमों से भी कोई असर नहीं हुआ है।

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