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बेहतर जीवन की तलाश में 72 फीसदी प्रवासी मजदूर कर रहे दक्षिण भारत का रुख, सर्वे में खुलासा

Published: Tue, 29 Sep 2026 10:47 AM (IST)

दक्षिण भारत में काम करने वाले 72 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों का मानना है कि उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ है, लेकिन 86 प्रतिशत के पास लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं है।

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दक्षिण भारत के तीन बड़े राज्यों में काम करने वाले लगभग 72 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों का मानना है कि घर से दूर आकर काम करने से उनके रहन-सहन और जीवन के स्तर में अच्छा सुधार हुआ है। यही कारण है कि इनमें से 57% से ज्यादा मजदूर उसी राज्य में रहकर आगे भी काम करना चाहते हैं।

हालांकि, उनका जीवन पहले से बेहतर तो हुआ है, लेकिन कानूनी और सामाजिक सुरक्षा के मामले में हालात अब भी चिंताजनक हैं। 86 प्रतिशत से भी ज्यादा मजदूरों के पास काम करने का कोई लिखित समझौता या कॉन्ट्रैक्ट नहीं है।

इसके साथ ही, उन्हें भाषा की दिक्कत, समाज से जुड़ाव न हो पाने और सरकारी योजनाओं का फायदा न मिल पाने जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है।

क्या है पलायन का मुख्य कारण?

साउथ इंडिया इंटरस्टेट माइग्रेशन सर्वे (SIIMS) 2026 के अनुसार, गृह राज्यों में आजीविका की असुरक्षा और रोजगार के सीमित अवसर ही पलायन की सबसे बड़ी वजह हैं। अधिकांश कामगारों ने अपने गृह क्षेत्र में मिलने वाली कम मजदूरी, नौकरियों का अभाव, अनियमित काम, गरीबी और भारी कर्ज को घर छोड़ने का मुख्य कारण बताया।

यह अध्ययन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट (IIMAD) द्वारा संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) और अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) के सहयोग से 1824 प्रवासी मजदूरों पर किया गया, जिसमें कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में काम कर रहे श्रमिकों के जीवन और कामकाज के तौर-तरीकों का विश्लेषण किया गया है।

सर्वेक्षण में शामिल 92 प्रतिशत से अधिक कामगार मुख्य रूप से उत्तरी और पूर्वी राज्यों से ताल्लुक रखते हैं। इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी पश्चिम बंगाल (26.2 प्रतिशत) की है, जिसके बाद बिहार (21.8 प्रतिशत), असम (17.1 प्रतिशत), ओडिशा (12 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (9.6 प्रतिशत) और झारखंड (5.6 प्रतिशत) आते हैं।

यह अध्ययन तीनों राज्यों में कृषि, मत्स्य पालन और दैनिक मजदूरी के अलावा केरल के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर, तमिलनाडु के गारमेंट व टेक्सटाइल उद्योग और कर्नाटक में स्क्रैप संग्रहण के काम से जुड़े श्रमिकों के अनुभवों को सामने लाता है।

कामकाजी घंटे, मजदूरी और वेतन में भारी अंतर

रिपोर्ट से यह भी सामने आया है कि 77 प्रतिशत से अधिक कामगार बिना किसी ठेकेदार के सीधे माध्यमों से काम पर लगे हैं, जबकि लगभग 58 प्रतिशत श्रमिकों को उनकी मजदूरी का भुगतान नकद में किया जाता है। इन प्रवासियों का औसत कार्य दिवस 9.87 घंटे लंबा होता है और इनकी औसत मासिक आय 17640 रुपये दर्ज की गई है।

इस अध्ययन ने कार्यस्थल पर वेतन असमानता को भी उजागर किया है, जहां महिला प्रवासी कामगारों को समान काम के बावजूद पुरुषों की तुलना में हर महीने औसतन ₹3313 कम मजदूरी मिलती है।

औपचारिक बैंकिंग सेवाओं के मामले में 88.2 प्रतिशत श्रमिक शामिल हैं, लेकिन कर्नाटक में 26.8 प्रतिशत और कबाड़ बीनने वाले मजदूरों में 31.3 प्रतिशत अब भी औपचारिक वित्तीय दायरे से बाहर हैं।

कल्याणकारी और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच में बाधाएं

सर्वेक्षण के सबसे चौंकाने वाले आंकड़े सामाजिक सुरक्षा लाभों से जुड़े हैं, जहां केवल 19 प्रतिशत प्रवासी कामगार ही राज्य बदलने पर अपनी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ आसानी से उठा पाते हैं।

वहीं लगभग 35 प्रतिशत को आंशिक लाभ मिलता है और 45 प्रतिशत ऐसे लाभों से लगभग वंचित रह जाते हैं। कुल मिलाकर 73% से अधिक मजदूरों को कल्याणकारी लाभों और 69 प्रतिशत को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में गंभीर बाधाओं से जूझना पड़ता है।

इस स्थिति को सुधारने के लिए अध्ययन में वन नेशन वन राशन कार्ड की तर्ज पर अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभों की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करने, बहुभाषी हेल्पडेस्क व हेल्पलाइन शुरू करने, श्रम निरीक्षण तंत्र को सख्त करने और संबंधित राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की सिफारिश की गई है।

UNFPA की भारत प्रतिनिधि एंड्रिया एम. वोजनार के अनुसार, यह अध्ययन स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं की कमियों को उजागर कर नीति निर्माताओं को ठोस कार्रवाई करने का एक स्पष्ट रोडमैप देता है।

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