नई दिल्ली। महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री और एनसीपी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल की गिनती राज्य के बड़े नेताओं में की जाती रही है। उनका ताल्लुक मुंबई के बेहद आम परिवार से है। उनकी मां सब्जी बेचकर घर का गुजारा किया करती थी। लिहाजा उन्होंने गरीबी को करीब से देखा है। लेकिन आज उनके परिजनों के पास में करोड़ों की सपंत्ति है। हालांकि उन्हें सत्ता के ईर्दगिर्द रहने वाले राजनेताओं में भी गिना जाता रहा है। यही वजह थी कि उन्होंने पहले शिवसेना और फिर कांग्रेस से नाता तोड़कर एनसीपी का दामन थामा था। सत्ता की यही कसक उन्हें कई बार अपनों से दूर ले गई और राजनीति में कई घुर विरोधी भी सामने आ गए।

मुंबई के दो बार मेयर बने भुजबल

महाराष्ट्र की राजनीति पर यदि नजर डालें तो छगन भुंजबल हमेशा से ही एक अहम किरदार रहे हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद बाल ठाकरे के विचारों से प्रभावित होकर भुजबल शिवसेना से जुड़े। वे पहली बार 1973 में शिवसेना से पार्षद का चुनाव लड़े और जीते। 1973 से 1984 के बीच छगन मुंबई के पार्षदों में सबसे तेज तर्रार नेता माने जाते थे। जिसकी बदौलत वे दो बार मुंबई महानगरपालिका के मेयर भी रहे। लेकिन मुंबई के दो बार मेयर रहे भुजबल ने कुछ सियासी गलतियां भी की जिसकी बदौलत वह शीर्ष पर जाने से चूक गए। भुजबल को एक अच्छा वक्ता के तौर पर भी गिना जाता रहा है। उनके पास आम आदमी से जुड़ने की अनूठी कला भी है। यही वजह थी कि वह अपने मतदाताओं के बीच लोकप्रिय शिवसेना नेता के तौर पर प्रसिद्ध हुए। मेयर पद पर रहते हुए चलाए गए 'ग्रीन एंड क्लीन मुंबई' के लिए मीडिया में उनकी काफी तारीफ भी हुई थी।

सत्ता पाने की ललक

1990 के विधानसभा चुनाव में जब भुजबल शिवसेना का हिस्सा हुआ करते थे तब भाजपा-शिवसेना गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा था। फलस्वरूप राज्य की सत्ता पर कांग्रेस के सीएम के तौर पर कभी कांग्रेस के बागी रहे शरद पवार काबिज हुए थे। यह सब भुजबल की अपेक्षा के अनुरूप नहीं था। उन्हें इस चुनाव में जीत की पूरी उम्मीद थी, इसके लिए उन्होंने जबरदस्त मेहनत भी की थी। राज्य में उनकी छवि शिवसेना के एक सक्रिय और मेहनती कार्यकर्ता की थी। लेकिन चुनाव में हार के बाद उन्हें अपनी मंजिल दूर लगने लगी थी।

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शिवसेना से तोड़ा नाता

यही वजह थी कि उनकी शिवसेना से दूरी बढ़ने लगी जिसका फायदा शरद पवार ने उठाया और उन्हें कांग्रेस में शामिल कर लिया। इसके बाद उन्हें पवार केबिनेट में मंत्री पद दिया गया। लेकिन उनके लिए यह फैसला सुखद नहीं रहा था। शिवसेना के लिए भी यह एक सदमे की ही तरह था। उन्हें शिवसेना से अलग कर पहले कांग्रेस और फिर एनसीपी में जोड़ने का श्रेय पार्टी प्रमुख शरद पवार को ही जाता है। शिवसेना से भुजबल की दूरी का फायदा उठाते हुए पवार ने उन्हें वर्ष 1991 में अपने साथ मिला लिया था।

थामा एनसीपी का साथ

1991 में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच जहां कांग्रेस को नुकसान हुआ वहीं भाजपा-शिवसेना गठबंधन को महाराष्ट्र की जनता ने जीत दिलाकर सत्ता पर काबिज करवा दिया। इस दौरान भुजबल विधानसभा के अंदर सबसे कांग्रेसी के सबसे मुखरनेता थे। इसके बाद 1999 में शरद पवार द्वारा कांग्रेस में फिर बागी तेवर अपनाने के लिए निकाला गया और उन्होंने एक अलग पार्टी बनाने की घोषणा की तो भुजबल ने पवार का हाथ थामना मुनासिब समझा। इस दौरान उन्होंने दोनों पार्टियों के बीच में एक सेतू का काम किया जिसके परिणास्वरूप महाराष्ट्र में फिर हुए विधानसभा चुनाव कांग्रेस को जीत मिली और इस सरकार में भुजबल को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया।

मनी लाॅड्रिंग मामले में हुई गिरफ्तारी

भुजबल पर धन को लेकर काफी आरोप लगे हैं। मौजूदा समय में उन्हें महाराष्ट्र सदन घोटाला मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया है। उनकी यह गिरफ्तारी मनी लाॅड्रिंग के मामले में हुई है। इस मामले में उनके भतीजे और पूर्व सांसद समीर भुजबल को ईडी पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। भुजबल ने अपने राजनैतिक जीवन में सफलता पाने के लिए कई उचाइयों को सफलतापूर्वक पार किया है। शिव सेना के प्रमुख बाला साहब ठाकरे के करीबी रहे भुजबल का नाम एक बार राज्य के मुख्यमंत्री के लिए भी सामने आया था लेकिन यहां पर उनकी किस्मत साथ नहीं दे सकी और वह इस पद से चूक गए।

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Edited By: Kamal Verma