सूरज पर दुनिया की दो आंखें: भारत के आदित्य L-1 और यूरोप के प्रोबा -3 ने मिलकर खोले सौर विस्फोट के गहरे राज
भारत के आदित्य-L1 और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्रोबा-3 मिशनों ने मिलकर सौर विस्फोटों (CME) का विश्लेषण किया है। इस ...और पढ़ें

आदित्य-L1 और प्रोबा-3 ने सौर विस्फोटों का संयुक्त विश्लेषण किया (AI जेनेरेटेड)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पृथ्वी से देखने पर सूरज स्थिर लग सकता है, लेकिन इसका बाहरी वायुमंडल तेज विस्फोटों का केंद्र है, जो भारी मात्रा में पदार्थ को अंतरिक्ष में फेंकते रहता है।
ये विस्फोट कैसे शुरू होते हैं और कैसे विकसित होते हैं, इसे समझना 'स्पेस वेदर' (अंतरिक्ष मौसम) और पृथ्वी के आसपास के पर्यावरण पर इसके प्रभावों के अध्ययन के लिए जरूरी है। हालांकि, सूरज के करीब से इसका अवलोकन करना लंबे समय से एक चुनौती रहा है।
'आदित्य-L1' और 'प्रोबा-3' का साझा मिशन
पहली बार, वैज्ञानिकों ने भारत के 'आदित्य-L1' मिशन और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के 'प्रोबा-3' मिशन द्वारा रिकॉर्ड किए गए एक ही 'कोरोनल मास इजेक्शन' (CME) के डेटा का संयुक्त रूप से विश्लेषण किया है। टीम ने 14 और 16 सितंबर, 2025 को देखे गए दो विस्फोटों की जांच की।
पहला विस्फोट लगभग 645 किमी प्रति सेकंड की गति से आगे बढ़ा, जबकि दूसरा लगभग 145 किमी प्रति सेकंड की गति से चला। दोनों मिशनों के डेटा को मिलाकर, वैज्ञानिकों ने इन विस्फोटों के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जा का अध्ययन किया, जिससे उन्हें यह समझने में मदद मिली कि सूर्य के पास के इलाके में ये कैसे विकसित होते हैं।
इस अध्ययन का नेतृत्व बेंगलुरु स्थित 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स' (IIA) के शोधकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर किया है और इसे 'एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स' नामक जर्नल में प्रकाशित किया।
'कोरोनल मास इजेक्शन' (CME) क्या है?
कोरोनल मास इजेक्शन (CME) सूर्य से अंतरिक्ष में बड़ी मात्रा में चुम्बकीय प्लाज्मा का निकलना है। प्लाज्मा पदार्थ की एक ऐसी अवस्था है जिसमें आवेशित कण (charged particles) स्वतंत्र रूप से घूमते हैं; सूर्य के बाहरी वायुमंडल, जिसे 'कोरोना' कहा जाता है, में यही अत्यंत गर्म पदार्थ मौजूद होता है।
CME के दौरान, भारी मात्रा में प्लाज्मा और चुम्बकीय क्षेत्र बाहर की ओर फेंके जाते हैं। हर विस्फोट पृथ्वी को प्रभावित नहीं करता है। लेकिन जब कोई CME हमारी पृथ्वी की ओर आता है, तो पृथ्वी के निकट के अंतरिक्ष वातावरण को बाधित कर सकता है, जिससे 'स्पेस वेदर' (अंतरिक्ष मौसम) से जुड़े प्रभाव पैदा होते हैं, जिनका अध्ययन वैज्ञानिक करते हैं।
एक CME का व्यवहार कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे कि उसका द्रव्यमान, घनत्व, गति और ऊर्जा कितना है। जैसे-जैसे यह फैलता है और सूर्य से दूर जाता है ये सभी कारक बदलते रहते हैं। समस्या यह है कि वैज्ञानिकों के लिए सूर्य के बहुत करीब CME को ट्रैक करना काफी कठिन रहा है।
अंतरिक्ष में स्थित पुराने कोरोनोग्राफ ने डेटा तो दिया है लेकिन वे हल्के विस्फोटों को देखने और उनके शुरुआती विकास को समझने में संघर्ष करते रहे हैं। इतनी ऊंचाई से किए गए अवलोकनों में कवरेज की कमी और सीमित विवरण जैसी समस्याएं भी थीं।
नतीजतन, इस बात के बहुत कम प्रमाण मौजूद हैं कि आंतरिक कोरोना में CME की ऊर्जा उसकी गति, गर्मी और चुंबकीय क्षेत्र के बीच किस तरह बंटती है।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विस्फोट के स्रोत के पास होने वाली प्रक्रियाएं ही तय करती हैं कि आगे चलकर वह कैसे विकसित होगा। साथ ही, सूर्य से काफी दूर जाने के बाद CME का अध्ययन करना, उसके शुरुआती विकास को देखने का पूरा विकल्प नहीं हो सकता।
दोनों मिशन एक-दूसरे के पूरक कैसे हैं?
आदित्य-L1 और प्रोबा-3 अलग-अलग मिशन हैं, लेकिन सूर्य के एक ही हिस्से को देखते समय इनके उपकरण एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। भारत का पहला समर्पित सौर मिशन, आदित्य-L1, 2 सितंबर 2023 को PSLV-C57 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था।
6 जनवरी 2024 को इसे सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु के चारों ओर एक 'हेलो ऑर्बिट' में स्थापित किया गया, जो सूरज के अवलोकन के लिए एक बेहतरीन जगह है। इसके उपकरणों में से एक, 'विजिबल एमिशन लाइन कोरोनोग्राफ' (VELC) को IIA ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के सहयोग से विकसित किया है।
VELC स्पेक्ट्रोस्कोपी के जरिए कोरोना का अध्ययन करता है। यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें प्रकाश के गुणों का विश्लेषण करके उस पदार्थ के बारे में जानकारी जुटाई जाती है जिससे वह प्रकाश निकल रहा है।
इस अध्ययन में, 'ग्रीन कोरोनल एमिशन लाइन' में VELC द्वारा किए गए अवलोकनों ने शोधकर्ताओं को विस्फोटों से जुड़ी गर्म गैस की जांच करने में मदद की, जिसमें गैस के घनत्व और थर्मल ऊर्जा का अनुमान लगाना भी शामिल है।
ESA का मिशन 'प्रोबा-3', 5 दिसंबर 2024 को श्रीहरिकोटा से भारत के PSLV-XL रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसमें दो अंतरिक्ष यान शामिल हैं, जो एक-दूसरे से लगभग 150 मीटर की दूरी पर बहुत सटीक तरीके से एक साथ उड़ान भरते हैं। इस व्यवस्था के कारण एक अंतरिक्ष यान दूसरे पर अपनी छाया डालता है, जिससे अंतरिक्ष में एक कृत्रिम सूर्य ग्रहण बन जाता है।
इससे 'एसोसिएशन ऑफ स्पेसक्राफ्ट फॉर पोलारिमेट्रिक एंड इमेजिंग इन्वेस्टिगेशन ऑफ द कोरोना ऑफ द सन' (ASPIICS) कोरोनाग्राफ को सूर्य के बाहरी वातावरण के उस धुंधले हिस्से को देखने में मदद मिलती है, जिसे सूर्य की तेज चमक के कारण देखना मुश्किल होता है।
ASPIICS सूर्य के कोरोना को लगभग 1.1 से 3 सौर त्रिज्या की दूरी तक देखता है, जबकि VELC लगभग 1.05 से 1.5 सौर त्रिज्या तक के हिस्से को कवर करता है। इस ओवरलैप की वजह से दोनों उपकरण कुछ समान संरचनाओं को देख पाते हैं।
दोनों के काम अलग-अलग
ASPIICS की तस्वीरें वैज्ञानिकों को CME (कोरोनल मास इजेक्शन) के आकार, गति और द्रव्यमान का अनुमान लगाने में मदद करती हैं। VELC की स्पेक्ट्रोस्कोपी गर्म प्लाज्मा के बारे में जानकारी देती है, जिससे उसके घनत्व और तापीय ऊर्जा का अनुमान लगाया जा सकता है।
इन दोनों की तुलना करने से टीम को अलग-अलग तकनीकों और मान्यताओं के जरिए निकाले गए मापों को क्रॉस-चेक करने का मौका मिलता है। हालांकि, यह सहयोग दोनों मिशनों का विलय नहीं था। इसमें एक ही सौर घटना का अध्ययन करने के लिए दोनों के अवलोकनों के बीच तालमेल बिठाना शामिल था।
वैज्ञानिकों ने क्या देखा?
यह शोध उन दो CME के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जा पर केंद्रित था, जिन्हें 14 और 16 सितंबर, 2025 को VELC और ASPIICS दोनों ने एक साथ देखा था।
टीम द्वारा अध्ययन की गई जुलाई-दिसंबर 2025 की अवधि के दौरान, प्रोबा-3 के उपकरण ने दस से अधिक CME रिकॉर्ड किए, लेकिन इनमें से केवल दो को ही दोनों उपकरणों ने एक साथ देखा।
इससे शोधकर्ताओं को इन अवलोकनों की सीधे तुलना करने का मौका मिला। टीम ने इन विस्फोटों से जुड़ी ऊर्जा के तीन रूपों का अध्ययन किया।
- गतिज ऊर्जा: गति से जुड़ी होती है और एक CME के मामले में, यह बाहर निकले पदार्थ के द्रव्यमान और उसकी गति पर निर्भर करती है।
- तापीय ऊर्जा: प्लाज्मा की गर्मी से संबंधित है।
- चुंबकीय ऊर्जा: चुंबकीय क्षेत्र में जमा होती है।
ASPIICS की तस्वीरों का इस्तेमाल विस्फोटों के द्रव्यमान, आयतन, घनत्व और गति का अनुमान लगाने के लिए किया गया, जबकि VELC ने प्लाज्मा के गुणों (जैसे घनत्व और तापीय ऊर्जा) के स्वतंत्र अनुमान दिए। इसके बाद शोधकर्ताओं ने जांच की कि जैसे-जैसे ये विस्फोट आंतरिक कोरोना से बाहर की ओर बढ़ते हैं, ऊर्जा के अलग-अलग घटक कैसे बदलते हैं।
एक मुख्य सवाल यह था कि क्या अलग-अलग तकनीकों और मान्यताओं का उपयोग करने के बावजूद, दोनों उपकरण एक ही भौतिक गुणों के लिए लगभग एक जैसे अनुमान देंगे। यह तुलना उपयोगी थी क्योंकि तस्वीरें एक दायरे में संरचनाओं और गति को दर्शाती हैं, जबकि स्पेक्ट्रोस्कोपी पदार्थ और उसकी भौतिक स्थितियों पर प्रकाश डालती है।
निष्कर्ष क्या बताते हैं
दोनों विस्फोटों का व्यवहार अलग-अलग था - उनकी गति और ऊर्जा के वितरण, दोनों ही मामलों में अलग-अलग थे। 14 सितंबर का CME (कोरोनल मास इजेक्शन) अधिक तेज था, जिसकी गति लगभग 645 किमी प्रति सेकंड थी।
16 सितंबर की घटना काफी धीमी थी, जिसकी गति लगभग 145 किमी प्रति सेकंड थी। दूसरे CME का घनत्व भी सूर्य से दूरी बढ़ने के साथ बहुत तेजी से कम हुआ, जो इसके शुरुआती चरण में अधिक तेज विस्तार का संकेत देता है।
ऊर्जा का वितरण भी अलग-अलग था। 14 सितंबर की घटना में अनुमानित गतिज और चुंबकीय ऊर्जा लगभग बराबर थीं, जबकि कुल ऊर्जा में तापीय ऊर्जा का हिस्सा केवल एक प्रतिशत के आसपास था। 16 सितंबर की घटना में, आगे बढ़ने के दौरान तापीय ऊर्जा में वृद्धि हुई और अंततः यह गतिज ऊर्जा के बराबर हो गई।
दोनों ही मामलों में, देखी गई ऊंचाई की सीमा के भीतर, अनुमानित चुंबकीय ऊर्जा, गतिज ऊर्जा के बराबर या उससे अधिक थी। हालांकि, चुंबकीय ऊर्जा के ये आंकड़े न्यूनतम अनुमान हैं, न कि सीधे तौर पर मापे गए सटीक मान।
एक और महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि दो अलग-अलग उपकरणों से प्राप्त द्रव्यमान और तापीय ऊर्जा के अनुमान काफी हद तक मेल खाते थे, भले ही उनके अवलोकन के तरीके और ज्यामितीय धारणाएं अलग-अलग थीं।
यह इस बात का समर्थन करता है कि सूर्य के करीब CME का अध्ययन करने के लिए इमेजिंग और स्पेक्ट्रोस्कोपी को एक साथ इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्या अभी भी अनसुलझा है?
इन निष्कर्षों के साथ कुछ सीमाएं भी जुड़ी हैं। इस अध्ययन में केवल दो अपेक्षाकृत कमजोर विस्फोटों की जांच की गई है, इसलिए इन परिणामों के आधार पर सभी CME के लिए कोई एक समान पैटर्न तय नहीं किया जा सकता।
शोधकर्ताओं को ऊर्जा - विशेष रूप से चुंबकीय ऊर्जा - का अनुमान लगाते समय कुछ धारणाएं भी माननी पड़ीं, क्योंकि संबंधित ऊंचाई पर चुंबकीय क्षेत्र और प्लाज्मा के तापमान का सीधा मापन उपलब्ध नहीं था।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि अधिक शक्तिशाली विस्फोटों सहित CME के एक बड़े समूह का अवलोकन किया जाए, तो इन निष्कर्षों की पुष्टि करने में मदद मिलेगी। सूर्य के अधिक करीब किए गए मापन और समन्वित अवलोकनों से यह समझने में और अधिक स्पष्टता मिल सकती है कि ये विस्फोट कैसे विकसित होते हैं।
यह अध्ययन कोई नया व्यावहारिक 'स्पेस-वेदर' (अंतरिक्ष मौसम) पूर्वानुमान सिस्टम स्थापित नहीं करता है। बल्कि, यह सौर विस्फोटों के शुरुआती विकास को समझने के लिए दो पूरक उपकरणों के उपयोग की वैज्ञानिक क्षमता को दर्शाता है।
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