भारत क्यों बना रहा अपना 'सूरज'? असली सूर्य से 20 गुना अधिक तापमान संभालने की चुनौती
भारत के कृत्रिम सूरज परियोजना में गुजरात स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

भारत के कृत्रिम सूरज परियोजना में बड़ी सफलता (सांकेतिक तस्वीर)

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जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। भारत का कृत्रिम सूरज भविष्य में दुनिया को चौंधियाएगा। सुनने में ये आपको भले अटपटा लगे मगर इस दिशा में गुजरात की प्रयोगशाला में तेजी से काम हो रहा है। जिस फ्यूजन अभिक्रिया के चलते सूर्य में अनंत ऊर्जा पैदा होती है, उसी तर्ज पर कार्य प्रगति पर है।
यहां बड़ी बात यह भी है कि भारत के फ्यूजन अनुसंधान में पहले ही 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाला प्लाज्मा हासिल किया जा चुका है। यह तापमान सूर्य के केंद्र के तापमान से लगभग 20 गुना अधिक है। देखा जाए तो भारत ने परमाणु संलयन (न्यूक्लियर फ्यूजन) अनुसंधान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
भारत के कृत्रिम कितना पावरफुल
गुजरात स्थित इंस्टीट्यूट फार प्लाज्मा रिसर्च (आइपीआर) के एसएसटी-1 टोकामक में 82.6 गीगाहर्ट्ज और 400 किलोवाट क्षमता वाले नए जाइरोट्रान को सफलतापूर्वक स्थापित और कमीशन किया गया है।
इस तकनीकी नवाचार से वैज्ञानिकों की अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को लंबे समय तक बनाए रखने और नियंत्रित करने की क्षमता मजबूत होगी। जाइरोट्रान एक खास तरह का उपकरण है जो हाई फ्रिक्वेंसी वाली माइक्रोवेव एनर्जी पैदा करता है।
एसएसटी-1 यानी स्टेडी स्टेट सुपरकंडेक्टिंग टोकामक भारत की प्रमुख प्रायोगिक फ्यूजन मशीन है। इसका उद्देश्य उन परिस्थितियों को प्रयोगशाला में तैयार करना है, जिनमें सूर्य और दूसरे तारों के भीतर ऊर्जा पैदा होती है।
सूर्य में परमाणु संलयन की प्रक्रिया के दौरान हल्के परमाणु नाभिक आपस में जुड़कर भारी नाभिक बनाते हैं और बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है।
कैसे मेंटेन होता है सूर्य से 20 गुना ज्तादा तापमान?
फ्यूजन ऊर्जा के लिए वैज्ञानिकों को बेहद गर्म प्लाज्मा तैयार करना पड़ता है। प्लाज्मा पदार्थ की एक अत्यधिक गर्म और विद्युत आवेशित अवस्था है। इसे टोकामक के भीतर शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों की मदद से नियंत्रित किया जाता है। टोकामक की संरचना सामान्यतः एक बड़े डोनट जैसी होती है।
भारत के फ्यूजन अनुसंधान में पहले ही 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाला प्लाज्मा हासिल किया जा चुका है। यह तापमान सूर्य के केंद्र के तापमान से लगभग 20 गुना अधिक है।
हालांकि, केवल इतना अधिक तापमान हासिल करना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिकों के लिए चुनौती यह है कि इस अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को स्थिर और नियंत्रित अवस्था में लंबे समय तक बनाए रखा जाए।
भारत क्यों बना रहा आपना सूरज?
नया 400 किलोवाट का जाइरोट्रान इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह माइक्रोवेव ऊर्जा के जरिए प्लाज्मा को गर्म करने में मदद करता है, जिससे वैज्ञानिक लंबे समय तक उच्च तापमान वाली प्लाज्मा परिस्थितियों का अध्ययन कर सकते हैं।
हालांकि, इस उपलब्धि का अर्थ यह नहीं है कि एसएसटी-1 अब बिजली पैदा करने वाला फ्यूजन पावर प्लांट बन गया है। भारत का ‘कृत्रिम सूर्य’ अभी ऊर्जा उत्पादन के चरण में नहीं पहुंचा है। लेकिन यह तकनीकी प्रगति भविष्य में नियंत्रित न्यूक्लियर फ्यूजन को व्यावहारिक बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।
फ्यूजन ऊर्जा को स्वच्छ और लगभग असीमित ऊर्जा के संभावित स्रोत के रूप में देखा जाता है। यदि वैज्ञानिक प्लाज्मा को लंबे समय तक नियंत्रित करने और संलयन से लगातार ऊर्जा हासिल करने में सफल होते हैं, तो भविष्य में तारों जैसी प्रक्रिया से पृथ्वी पर बिजली पैदा करने की संभावना बलवती होगी।
