UPI पर भारत में सबसे कम चार्ज, US-चीन समेत अन्य देशों में कितना लगता है शुल्क?
15 अक्टूबर से UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होगा, लेकिन 2000 रुपये तक के भुगतान मुफ्त रहेंगे और यह शुल्क सिर्फ बड़े व्यापारियों पर लगेगा।

दुनिया में सबसे कम UPI पर चार्ज भारत में

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI वही सिस्टम है जिसकी वजह से आज हम मोबाइल से एक सेकंड में किसी को भी पैसे भेज या मंगवा सकते हैं। आज इसके जरिये हर महीने 2,400 करोड़ से भी ज्यादा लेनदेन हो रहे हैं। इसने नकदी पर निर्भरता को बड़े पैमाने पर कम किया।
साथ ही बैंकिंग को उन लोगों तक पहुंचाया, जिनके पास पहले कभी डेबिट-क्रेडिट कार्ड नहीं था। यूपीआई ने भुगतान की लागत को शून्य कर दिया, जिससे औपचारिक अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ा है। अब इस मुफ्त सिस्टम में 15 अक्टूबर से एक छोटा-सा शुल्क जुड़ने जा रहा है, जिसे मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) कहा जाता है।
दो हजार रुपये तक के UPI भुगतान फ्री
नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के अनुसार, दो हजार रुपये तक के यूपीआई भुगतान पूरी तरह से मुफ्त रहेंगे। यह रकम कुल दुकान भुगतान (मर्चेंट पेमेंट) का 95 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा है। मतलब यह है कि सौ में से 95वें से ज्यादा बार जब आप चाय की दुकान, सब्जी या आटो वाले को यूपीआई से पैसे देंगे तो कोई शुल्क नहीं लगेगा।
शुल्क सिर्फ उन पांच प्रतिशत से भी कम लेनदेन पर लगेगा, जो दो हजार रुपये से ज्यादा के होंगे। वह भी सिर्फ बड़े दुकानदारों-कारोबारियों पर। जो छोटे दुकानदार महीने में एक लाख रुपये तक यूपीआइ क्यूआर कोड पेमेंट लेते हैं, उनके लिए सब कुछ पहले जैसा मुफ्त ही रहेगा।
कितना शुल्क देना होगा?
यूपीआइ पेमेंट पर एमडीआर की दर भी बहुत मामूली सिर्फ 0.4 प्रतिशत रखी गई है। 75 हजार रुपये या इससे अधिक के लेनदेन पर अधिकतम 300 रुपये की सीमा है। यह शुल्क ग्राहक से नहीं, बल्कि दुकानदार से लिया जाएगा।
रेलवे टिकट, बीमा प्रीमियम, बिजली-पानी का बिल, पेट्रोल पंप और स्कूल-कालेज की फीस जैसी चीजों पर तो सिर्फ पांच रुपये का स्थायी शुल्क ही लगेगा, चाहे रकम कितनी भी बड़ी क्यों न हो।
बड़ी बात यह है कि यह दर बाकी भुगतान तरीकों के मुकाबले सबसे कम है। भारत में क्रेडिट कार्ड पर दुकानदारों को आमतौर पर 1.5 से 2.5 प्रतिशत तक शुल्क देना पड़ता है, जबकि डेबिट कार्ड पर यह करीब 0.9 प्रतिशत तक है।
दुनिया के दूसरे देशों से भी कम शुल्क?
दुनिया के बड़े बाजारों से तुलना करें तो भारत की यह दर वाकई कम ठहरती है। चीन में अलीपे जैसे मोबाइल-वालेट दुकानदारों से 0.6 प्रतिशत तक शुल्क लेते हैं। ब्राजील में डेबिट कार्ड पर एक प्रतिशत से ज्यादा और क्रेडिट कार्ड पर तो 2.2 प्रतिशत तक शुल्क लगता है।
अमेरिका में तो कोई सरकारी सीमा तय नहीं है और क्रेडिट कार्ड की फीस अक्सर 2 से 3 प्रतिशत तक चली जाती है। इन सबकी तुलना में भारत की 0.4 प्रतिशत दर बहुत ही कम बैठती है।
क्यों जरूरी है यह शुल्क?
एक अनुमान के अनुसार, भारत में डिजिटल पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सालाना करीब 20 हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। जब कोई चीज बिल्कुल मुफ्त होती है, तो अक्सर सिर्फ बड़ी और गहरी जेब वाली कंपनियां ही लंबे समय तक घाटा झेल पाती हैं और नई-छोटी कंपनियों के लिए बाजार में टिकना मुश्किल हो जाता है।
एक छोटा-सा पूर्व-निर्धारित शुल्क इस बाजार में और प्रतिस्पर्धा ला सकता है और नई तकनीक में निवेश को बढ़ावा दे सकता है।
(एजेंसी के इनपुट के साथ)
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