16 साल पहले भाजपा-सपा ने मिलकर चलाई थी मॉक संसद, लालू बने थे प्रधानमंत्री; क्या थी मांग?
इंडी गठबंधन ने मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर मॉक संसद का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ...और पढ़ें

2010 में भाजपा-सपा ने लोकसभा में ही लगा दी थी मॉक पार्लियामेंट (फाइल फोटो- पीटीआई)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आज यानी शनिवार को इंडी गठबंधन के नेताओं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर मॉक संसद का आयोजन किया। इस आयोजन की अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने किया।
इसे संसदीय कार्यवाही की तर्ज पर आयोजित किया जा रहा है और इसे मॉक पार्लियामेंट का नाम दिया गया है। हालांकि, यह पहली मॉक पार्लियामेंट नहीं है, इससे पहले भी ऐसे मॉक संसद का आयोजन हो चुका।
दरअसल, हम बात कर रहे हैं, साल 2010 की, जब वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ तक की चार प्रमुख पार्टियों ने अपने सभी मतभेद भुलाकर एक घंटे से अधिक समय तक लोकसभा के भीतर ही मॉक पार्लियामेंट चलाई थी।
इस मॉक पार्लियामेंट में भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे ने स्पीकर की भूमिका निभाई थी। उस समय मॉक संसद का आयोजन सांसदों के वेतन वृद्धि के मुद्दे को लेकर हुई थी। जब भारी हंगामे के कारण लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई थी।
इकोनॉमिक टाइम्स की 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद आरजेडी नेता लालू प्रसाद, सपा नेता मुलायम सिंह और भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे मॉक पार्लियामेंट का ओयोजन किया था।
इसकी अध्यक्षता भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने की थी और लालू यादव ने सदन में खुद को प्रधानमंत्री के रोल में स्थापित किया था। वहीं सपा नेता मुलायम सिंह यादव ने उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाई थी। 2010 में हुई इस मॉक पर्लियामेंट में बीजेपी, वामपंथी दलों, सपा और राजद के लगभग 70 से अधिक सांसदों ने हिस्सा लिया था।
क्या थी मांग?
दरअसल, साल 2010 की तत्कालीन केंद्रीय कैबिनेट ने सांसदों का मूल वेतन 16,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस बढ़ोत्तरी से नाखुश होकर आरजेडी, एसपी, शिवसेना और अकाली दल जैसी पार्टियों ने सदन में विरोध प्रदर्शन किया और कार्यवाही बाधित कर दी थी।
लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव संसदीय समिति की उस सिफारिश पर अड़ गए थे, जिसमें सांसदों का वेतन 80,001 रुपये करने का सुझाव दिया गया था। उनका कहना था कि 80,001 रुपये दें या फिर कुछ भी नहीं।
हालांकि, 2010 में हुई इस मॉक संसद को लेकर सत्ताधारी दल के साथ-साथ भाजपा के भी कुछ वरिष्ठ नेताओं ने नाराजगी जताई थी। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने इस पूरी घटना पर असंतोष जताते हुए कहा था, 'संसद लोकतंत्र का मंदिर है और इसके साथ सर्वोच्च सम्मान व गरिमा का व्यवहार किया जाना चाहिए।'
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी इस मॉक संसद का विरोध किया था, उन्होंने अपनी ही पार्टी के सांसद गोपीनाथ मुंडे के मॉक पार्लियामेंट में शामिल होने पर नाराजगी जताते हुए उन्हें फटकार लगाई थी। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी इस गतिविधि को उचित नहीं माना था।
मीरा कुमार की भूमिका पर उठ रहें सवाल
इंडी गठबंधन द्वारा आयोजित आज के मॉक पार्लियामेंट की अध्यक्षता मीरा कुमार ने की, लेकिन 2010 में जब मॉक पार्लियामेंट का आयोजन हुआ था, तब मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष थीं और वह मॉक पार्लियामेंट का विरोध कर रही थीं। वहीं आज जब वह संवैधानिक पद पर नहीं हैं, तब वह खुद ऐसे मॉक पार्लियामेंट की अध्यक्षता कर रहीं हैं।
ऐसे में मीरा कुमार की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, कि जब वह 2010 में मॉक पार्लियामेंट लोकतंत्र के मंदिर की मर्यादा के विरुद्ध थी तो आज उसके समानांतर राजनीतिक कार्यवाही आयोजित करने का औचित्य क्या है?
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