नई दिल्ली। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि ध्वनि और वायु प्रदूषण के बारे में पहले से ही मानक तय हैं। दीवाली पर ध्वनि और वायु प्रदूषण को लेकर सरकार सतर्क है और इसके स्तर की निगरानी के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों को एडवाइजरी जारी की गई है।

सरकार ने ये बात दिल्ली में आतिशबाजी पर रोक लगाने की तीन बच्चों की याचिका का जवाब देते हुए अपने हलफनामे में कही है। सुप्रीमकोर्ट इस मामले पर बुधवार को सुनवाई करेगा।

मालूम हो कि छह-छह और 14 महीने के तीन नन्हें मुन्नों की ओर से सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल कर दिल्ली में बढ़ते ध्वनि और वायु प्रदूषण को रोकने की मांग की गई है। याचिका में दीवाली व अन्य त्योहारों पर आतिशबाजी पर रोक लगाने और पड़ोसी राज्यों में फसलों की पराली जलाने पर रोक की मांग की गई है। याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा था।

सुप्रीमकोर्ट के इन आदेशों को ध्यान में रखते हुए अंतिम बार 11 जनवरी 2010 को ध्वनि प्रदूषण के नियम संशोधित किए गए। सरकार का कहना है कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक रात्रि मानी गई है और इस समय हार्न बजाने, निर्माण सामग्री के शोर और पटाखे बजाना मना है। इतना ही नही नियमों में औद्योगिक, व्यवसायिक और रिहायशी क्षेत्र में ध्वनि के अलग-अलग मानक तय हैं। स्कूल, अदालत और अस्पताल को साइलेंस जोन घोषित किया गया है।

सरकार ने कहा है कि पटाखों की आवाज के भी मानक तय हैं। नियमों के तहत राज्य सरकार निगरानी अथॉरिटी नियुक्त करती है जो कि जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त जैसा कोई अधिकारी हो सकता है। अथॉरिटी नियमों का उल्लंघन करने वालों को पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत अभियोजित कर सकती है। इन नियमों के अलावा अन्य कानूनों मे भी ध्वनि के मानक तय हैं।

पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि उसकी भूमिका ध्वनि और वायु प्रदूषण के मानक स्तर तय करने तक ही सीमित है। वायु प्रदूषण के कई कारण हैं जैसे की उद्योग, उड्डयन, रेलवे, शिपिंग, निर्माण गतिविधियां आदि और इन्हें काबू करने के लिए कई मंत्रालय या विभागों को मिल कर काम करना होगा।

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Posted By: Test1 Test1

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