एस.के. सिंह, नई दिल्ली। ‘एग्रीकल्चरल स्टैटिस्टिक्स एट के ग्लांस 2022’ में 2011 की आखिरी जनगणना के हवाले से बताया गया है कि देश की 68.9% आबादी ग्रामीण है और कुल श्रमिकों में 54.6% कृषि क्षेत्र में हैं। भारत के समावेशी विकास में ग्रामीण और कृषि क्षेत्र की अहमियत का अंदाजा इन तथ्यों से मिलता है। इसलिए ग्रामीण आबादी, खास कर किसानों को शामिल किए बगैर विकास समावेशी नहीं हो सकता है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार, गरीबी दूर करने और साझी संपन्नता के लिए कृषि सबसे शक्तिशाली जरिया है। गरीबों की आमदनी बढ़ाने में अन्य सेक्टर की तुलना में कृषि क्षेत्र दो से चार गुना अधिक सक्षम होता है।

किसानों की आय बढ़ाना आज सबसे बड़ी चुनौती है। छोटी होती जोत इसे और मुश्किल बना रही है। वर्ष 2010-11 में दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान 84.9% थे, और कृषि जनगणना 2015-16 में ऐसे छोटे और सीमांत किसानों का अनुपात बढ़ कर 86.1% हो गया। वर्ष 2019 के नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के 77वें दौर के सर्वेक्षण के अनुसार दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान परिवार 89.4% हो गए। छोटे और सीमांत किसान भारतीय कृषि की रीढ़ हैं, लेकिन तमाम संकटों से सबसे अधिक उन्हें ही जूझना पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार किसानों की आय बढ़ाने के लिए सबसे पहले जरूरी है कि उनकी लागत कम हो और उत्पादकता बढ़े। प्रिसीजन खेती (टेक्नोलॉजी से फसल प्रबंधन), बेहतर सिंचाई व्यवस्था, ज्यादा पैदावार वाले और रोग-रोधी बीज जैसे उपाय उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए सूखा-रोधी फसलें तैयार करने, जल संरक्षण और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने जैसी सस्टेनेबल खेती को बढ़ावा देना पड़ेगा। इससे खाद्य सुरक्षा भी मजबूत होगी। बेहतर सड़कें और स्टोरेज सुविधा से फसलों का नुकसान कम होगा और उपज समय पर बाजार में पहुंचेगी तो किसानों की कमाई भी बढ़ेगी। कृषि उपज की प्रोसेसिंग इसमें बड़ा योगदान कर सकती है। प्रोसेसिंग बढ़ेगी तो पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स में रोजगार निकलेंगे। कृषि में आधुनिकीकरण होगा तो स्किल्ड लोगों को भी रोजगार मिलेगा।

उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत

किसान संगठन भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ का मानना है कि उत्पादकता बढ़ाने के लिए कृषि रिसर्च में निवेश दोगुना करना पड़ेगा। वे बताते हैं, “कृषि रिसर्च में निवेश का 10 गुना रिटर्न मिलता है। सरकार एक रुपया लगाती है तो देश को 10 रुपये का रिटर्न मिलता है। इससे ज्यादा रिटर्न और किसी चीज में नहीं है। लेकिन पिछले 20 वर्षों में कृषि में रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च में जो वृद्धि हुई, उसमें 90% मौकों पर वृद्धि महंगाई दर से कम रही है। इसका मतलब है कि आरएंडडी पर खर्च वास्तव में घटा है। इस खर्च को कम से कम दोगुना करना पड़ेगा, तभी प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी और कम इनपुट में ज्यादा पैदावार मिलेगी।”

दरअसल, कृषि में उत्पादकता बढ़ाने की अब भी काफी गुंजाइश है। देश के विभिन्न राज्यों में ही उत्पादकता में बहुत अंतर है। ‘एग्रीकल्चरल स्टैटिस्टिक्स एट के ग्लांस 2022’ के अनुसार देश स्तर पर चावल की यील्ड का औसत 2021-22 में 2809 किलो प्रति हेक्टेयर था। पंजाब में यील्ड 4340 किलो प्रति हेक्टेयर है। इसके अलावा सिर्फ आंध्र प्रदेश (3470), तमिलनाडु (3658) और तेलंगाना (3366) में यह 3000 किलो प्रति हेक्टेयर से ज्यादा है।

इसी तरह, गेहूं की यील्ड देश स्तर पर 2021-22 में 3507 किलो प्रति हेक्टेयर थी। हरियाणा में यील्ड सबसे ज्यादा 4533 किलो प्रति हेक्टेयर है। उसके बाद पंजाब में 4206 किलो, राजस्थान में 3676 किलो, उत्तर प्रदेश में 3604 किलो और मध्य प्रदेश में 3449 किलो है। दालों की उत्पादकता 892 किलो प्रति हेक्टेयर और तिलहन की 1292 किलो प्रति हेक्टेयर है।

कंसल्टिंग फर्म ईवाई के पार्टनर और कृषि मामलों के प्रमुख सत्यम शिवम सुंदरम उत्पादकता बढ़ाने के लिए इनपुट को बेहतर बनाना जरूरी मानते हैं। उनके मुताबिक, “इसमें बीज की क्वालिटी, सिंचाई में टेक्नोलॉजी लाना (जैसे माइक्रो इरिगेशन), प्रिसीजन खेती आदि शामिल हैं। हार्वेस्टिंग में भी नई टेक्नोलॉजी आ गई है जिनका प्रयोग बढ़ाने की जरूरत है।”

थिंक टैंक सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (CSTEP) के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. जय आसंदी के अनुसार, भारत की बड़ी आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन, तापमान में वृद्धि और कुछ इलाकों में कम बारिश सचमुच हमारे लिए चुनौती बनेगी। यह न सिर्फ समावेशी विकास के लिए बल्कि हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती है।

वे कहते हैं, “दूसरी जटिल समस्याओं की तरह इस समस्या का समाधान भी किसी एक टेक्नोलॉजी से नहीं हो सकता है। किसानों को सूखा रोधी अनाज की किस्में अपनानी पड़ेंगी और इसके साथ बेहतर जल प्रबंधन के तरीके अपनाने होंगे। उन्हें उपज की अधिक से अधिक कीमत मिले, इसके लिए बाजार से उनका जुड़ाव (सप्लाई चेन) बेहतर करना होगा। किसान खेती से जुड़े कामों में रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल करके भी अपनी कमाई बढ़ा सकते हैं।”

वैसे, खास कर दूध उत्पादन में भारत की उत्पादकता हाल के वर्षों में बढ़ी है। एनडीडीबी चेयरमैन डॉ. मीनेश शाह के अनुसार बीते एक दशक में पशुधन की उत्पादकता एक-चौथाई या उससे ज्यादा बढ़ी है। वर्ष 2013-14 से 2022-23 के दौरान देसी नस्ल की गायों की औसत उत्पादकता 2.50 किलो से बढ़ कर 3.44 किलो, क्रॉस ब्रीड की 6.78 किलो से बढ़ कर 8.55 किलो और भैंस की 4.91 किलो से बढ़ कर 6.06 किलो प्रति दिन हो गई। इस तरह तीनों में क्रमशः 37.6%, 26.1% और 23.4% वृद्धि हुई है।

उत्पादकता के साथ उपज का उचित स्टोरेज भी महत्वपूर्ण है। सत्यम के अनुसार, “प्याज, आलू जैसी चीज अगर हम स्टोरेज में रखते हैं तो वहां नमी का ध्यान रखना पड़ेगा। जिस इलाके में जो उपज ज्यादा होती है वहां उसके हिसाब से स्टोरेज का इंतजाम करना पड़ेगा।”

नीति को भी समावेशी बनाने की जरूरत

जाखड़ के अनुसार, “किसी उपज के दाम बढ़ने पर सरकार निर्यात पर रोक या स्टॉक लिमिट तय करने की नीति अपनाती है। लेकिन इससे किसानों को नुकसान होता है। अगर सरकार किसी उपज की कीमत कृत्रिम रूप से घटाती है, तो उसे साथ में किसानों को नुकसान की भरपाई की नीति भी लानी चाहिए। तभी किसानों की भी तरक्की होगी और विकास समावेशी होगा। समावेशी विकास में ऐसा नहीं हो सकता कि समाज के एक वर्ग की कीमत पर दूसरा वर्ग आगे बढ़े।”

वे कहते हैं, “सरकार एक तरफ तो किसानों को एमएसपी देने की बात कहती है, दूसरी तरफ वह खुद एमएसपी से कम कीमत पर आयात की अनुमति देती है। इससे भी घरेलू बाजार में दाम कृत्रिम रूप से नीचे आते हैं। सरकार को एमएसपी से कम कीमत पर आयात की अनुमति नहीं देनी चाहिए।”

छोटे किसानों के लिए उत्पादन लागत अधिक होती है। सत्यम के अनुसार, “इसे कम करने के लिए क्लस्टर अप्रोच अपनाना पड़ेगा। सरकार एक निश्चित क्षेत्र के लिए तय कर दे कि यहां इस फसल की खेती होगी। इससे उत्पादन लागत बहुत कम हो जाएगी, क्योंकि बीज, सिंचाई, लॉजिस्टिक्स आदि का खर्च किसानों में बंट जाएगा। इसमें एफपीओ की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर 300 किसान मिल कर बीज खरीदें तो उनका खर्च बहुत कम हो जाएगा।”

उनका सुझाव है कि सरकार निजी क्षेत्र को भी इसमें शामिल कर सकती है। कोई निजी एजेंसी किसानों के लिए काम करे, बदले में उसे सरकार की तरफ से भुगतान मिल जाए। या सरकार वह पैसा किसानों को ट्रांसफर करे और किसान उस एजेंसी को भुगतान कर दें ताकि उनके खेतों में भी वह एजेंसी काम करे। इससे भी किसानों की लागत कम होगी। अभी कस्टम हायरिंग सेंटर से ट्रैक्टर, थ्रेशर जैसी चीजों का साझा इस्तेमाल होता है। इस तरीके को फसलों पर भी लागू किया जा सकता है।

फूड प्रोसेसिंग बढ़ा सकता है रोजगार

इंडस्ट्री के हिसाब से देखें तो टेक्सटाइल के बाद फूड प्रोसेसिंग दूसरा सबसे अधिक रोजगार देने वाला सेक्टर है। यह भारत की जीडीपी में 13% योगदान करता है। जैसा कि खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की सचिव अनिता प्रवीण ने फिक्की के एक कार्यक्रम में कहा, “यह किसानों की आय बढ़ाने का प्रमुख माध्यम हो सकता है…। फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री का अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए विस्तार किया जाना चाहिए।” भारत में इस इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में और कम कीमत में उपलब्ध है। दूसरी तरफ इसके प्रोडक्ट की डिमांड घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में है। इसमें लघु और छोटे उपक्रम काफी हैं। उन्हें बड़ी इंडस्ट्री से इंटीग्रेट करके निर्यात बढ़ाया जा सकता है।

ईवाई के सत्यम के अनुसार, किसानों की आय बढ़ाने के लिए फूड प्रोसेसिंग को गंभीरता से लेना होगा। उनका कहना है कि फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय के तहत लागू की गई पीएम किसान संपदा योजना के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे हैं। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में नियमित फसलों का और उत्तर-पूर्व में ऑर्गेनिक का क्लस्टराइजेशन हुआ है। लेकिन एक तो यह क्लस्टराइजेशन कुछ क्षेत्रों तक सीमित है और दूसरा, हम उसे प्रोसेसिंग के स्तर तक नहीं ले जा सके हैं।

मजबूत सप्लाई चेन के कई फायदे

कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी ने करीब साल भर पहले सीआईआई के एक कार्यक्रम में कहा था कि भारत में हर साल लगभग एक लाख करोड़ रुपये के खाद्य पदार्थों का नुकसान होता है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट, यूके की सीनियर फेलो और डायरेक्टर लिज गुडविन का आकलन है कि दुनिया में जितना खाद्य पदार्थ उपजाया जाता है, वजन के हिसाब से उसका एक-तिहाई नष्ट हो जाता है। इससे विश्व अर्थव्यवस्था को हर साल 450 अरब डॉलर का नुकसान होता है। एक अन्य आकलन है कि ग्लोबल फूड सिस्टम में प्रयोग होने वाली ऊर्जा का 38% बर्बाद हुए खाने में चला जाता है। कोल्ड चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर से न सिर्फ उपज का नुकसान कम होगा, बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी घटेगा।

कोल्ड चेन पर 29 मई को जारी ग्रांट थॉर्नटन-फिक्की रिपोर्ट के अनुसार भारत की फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पिछले पांच वर्षों में सालाना 8.3% की दर से बढ़ी है। इसमें कोल्ड चेन इंडस्ट्री ने बड़ी भूमिका निभाई है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, उत्पादों की गुणवत्ता बरकरार रखने और खाद्य पदार्थों की बर्बादी कम करने के लिए कोल्ड चेन इंडस्ट्री महत्वपूर्ण है।

इसके महत्व को नॉर्वे की सीफूड इंडस्ट्री के उदाहरण से समझा जा सकता है। वहां कोल्ड चेन टेक्नोलॉजी अपनाने से पहले सीफूड इंडस्ट्री में क्वालिटी बरकरार रखने की समस्या रहती थी। सीफूड नष्ट होने के कारण 30% का नुकसान होता था। अब यह नुकसान पांच से दस प्रतिशत रह गया है।

रिपोर्ट में 2047 के बारे में अनुमान लगाया गया है कि उस समय भारत की नॉमिनल जीडीपी 30 लाख करोड़ डॉलर होगी। 2047-48 तक खाद्य पदार्थों की मांग सालाना 2.44% की दर से बढ़ेगी। भारत का कोल्ड चेन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर 2047 में 100 अरब डॉलर का होगा। ब्लॉकचेन से 50% शिपमेंट की ट्रैकिंग होने से उन्हें ट्रेस करना आसान होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग से लागत भी 20% कम होगी। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार कोल्ड चेन सेक्टर अभी करीब 2 लाख करोड़ रुपये का है। यह हर साल 10% की दर से बढ़ रहा है।

शहरीकरण से भी खाने-पीने की चीजों की डिमांड बदल रही है और उसी हिसाब से उनके उत्पादन और सप्लाई चेन में भी बदलाव हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा बदलाव यह आ रहा है कि प्रोटीन की खपत पशु आधारित से अब पौधा आधारित हो रही है। इसका असर फूड इंडस्ट्री पर पड़ेगा। सत्यम के अनुसार, “कोविड के बाद सेहतमंद भोजन की तरफ लोगों का झुकाव बढ़ा है। खान-पान में लोगों की पसंद के हिसाब से फूड प्रोसेसिंग, स्टोरेज, वैल्यू चेन, ट्रांसपोर्टेशन सब बदलेगा।”

चुनौतियांः रिपोर्ट में इस इंडस्ट्री की कुछ चुनौतियां भी बताई गई हैं। ये हैं- लॉजिस्टिक्स पार्क के साथ कोल्ड चेन के इंटीग्रेशन का अभाव, दूरदराज के इलाकों में सीमित कनेक्टिविटी और नियंत्रित तापमान वाले स्टोरेज की सीमित सुविधा, जमीन अधिग्रहण में देरी, रेगुलेटरी जटिलताएं, क्लस्टर आधारित एप्रोच का अभाव और ब्लॉकचेन, एआई तथा रोबोटिक्स जैसी नई टेक्नोलॉजी का सीमित प्रयोग। ईंधन की लागत भी भारत में ज्यादा है। यह कोल्ड स्टोरेज के ऑपरेटिंग खर्च का लगभग 45% है, जबकि पश्चिमी देशों में यह सिर्फ 10% है।

समाधानः रिपोर्ट में इसके कुछ समाधान भी बताए गए हैं। जैसे, उत्पादन और खपत केंद्रों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाना, मल्टीमॉडल पार्क को रेल, सड़क, समुद्र और वायु चारों तरह के यातायात से जोड़ना, सस्ती और घरेलू टेक्नोलॉजी डेवलप करने के लिए आरएंडडी पर फोकस, एडवांस टेक्नोलॉजी के लिए निजी क्षेत्र के साथ करार, एफपीओ और स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण देने के लिए संस्थानों के साथ गठजोड़, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए बड़ी वैश्विक कंपनियों के साथ सहयोग।

जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए सबसे बड़ा संकट

हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन दुनियाभर में कृषि के लिए सबसे बड़ा संकट बन कर उभरा है। सत्यम इससे जुड़ी पांच समस्याएं और उनके समाधान बताते हैं। एक तो पानी की उपलब्धता की समस्या है। इससे निपटने के लिए प्रिसीजन खेती अपनाने की जरूरत है। दूसरा, पानी की ज्यादा जरूरत वाली किस्मों से कम जरूरत वाली किस्मों की तरफ जाना पड़ेगा। इस दिशा में काम हो भी रहा है। जैसे, धान की डायरेक्ट सीडिंग में पानी की जरूरत कम पड़ती है। इस तरह के इनोवेशन पर ज्यादा फोकस करने की जरूरत है। तीसरा है मांग के अनुसार उत्पादन। इसके लिए इजरायल का उदाहरण ले सकते हैं। वहां देखा जाता है कि आने वाले समय में किस फसल की अधिक मांग रहेगी। उसी हिसाब से उसकी बुवाई होती है। इससे दाम में स्थिरता रहती है और बर्बादी भी कम होती है।

चौथा है मिट्टी का क्षरण। जलवायु परिवर्तन से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है। इसके लिए फसलों का चयन उसी हिसाब से करना पड़ेगा। पहले भारत में पूरा फसल चक्र होता था। जैसे धान के बाद तिलहन, दलहन की फसलें लगाई जाती थीं जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती थी। यह फसल चक्र अब टूट गया है। आज हम इंटरक्रॉपिंग टेक्नोलॉजी की बात करते हैं, जबकि भारत में इसका प्रयोग बहुत पहले से होता रहा है। पांचवां है कीट नियंत्रण। सत्यम के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों पर कीटों के हमले बढ़े हैं। पौधों पर तरह-तरह के कीटाणु आने लगे हैं। इस पर ध्यान देना होगा। वन हेल्थ की अवधारणा में मानव, पशु और पौधे, सेहत के मामले में तीनों को एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इसे आगे ले जाने की जरूरत है।

जलवायु परिवर्तन से फसलों की उत्पादकता तो घटती ही है, उनमें पोषक तत्वों की भी कमी रहती है। विभिन्न फसलों पर जलवायु परिवर्तन के असर का सरकार ने आकलन किया है। यह आकलन वर्ष 2050 और 2080 के लिए है। कृषि मंत्रालय ने संसद में दिए गए एक सवाल के जवाब में बताया कि अनुकूलन के उपाय नहीं अपनाने पर वर्षा सिंचित इलाकों में चावल की उत्पादकता 2050 तक 20% और 2080 तक 47% घट सकती है। सिंचित क्षेत्रों में उत्पादकता में क्रमशः 3.5% और 5% की गिरावट का अंदेशा है। इसी तरह गेहूं की उत्पादकता 2050 तक 19.3% और 2080 तक 40% घट सकती है। मक्के की यील्ड में क्रमशः 18% और 23% गिरावट आ सकती है।

स्पष्ट है कि समावेशी विकास के लिए ग्रामीण विकास जरूरी है। इसके लिए वहां स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं भी बेहतर करनी पड़ेंगी। इसलिए सत्यम कहते हैं, “ग्रामीण विकास के लिए सर्विस सेक्टर को भी साथ लेना पड़ेगा। आज आईटी सर्विसेज कंपनियां टियर-2 शहरों में जाना चाहती हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्र में सर्विस इकोनॉमी भी बढ़ेगी। यह तभी संभव होगा जब वहां बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध होंगी। इन सुविधाओं के विकास से वहां सर्विसेज के साथ एमएसएमई भी तेजी से बढ़ सकती हैं।”

वे दो औद्योगिक राज्यों महाराष्ट्र और तमिलनाडु का उदाहरण देते हैं। महाराष्ट्र में विकास मुंबई, पुणे, नागपुर जैसी चुनिंदा जगहों तक सीमित है। दूसरी तरफ तमिलनाडु में कोई निवेश करना चाहता है तो वह मदुरई और शिवकाशी भी जाने को तैयार रहता है। “आज 49% तमिलनाडु शहरी हो चुका है। इस तरह के निवेश से सेकंडरी और टर्शियरी स्तर पर अनेक नौकरियों का सृजन होता है।”

बहरहाल, कृषि की चुनौतियां भारत की अकेली नहीं हैं। दुनिया के सभी देश इसका सामना कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव फसलों की उत्पादकता घटा रहा है। हमारी खाद्य प्रणाली लगभग 30% ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। दूसरी तरफ, वर्ष 2030 तक दुनिया से भूख का संकट खत्म करने का सतत विकास लक्ष्य (SDG) ट्रैक से हट चुका है। युद्ध, जलवायु परिवर्तन और खाद्य महंगाई खाद्य के साथ पोषण असुरक्षा को भी बढ़ा रही हैं। दुनिया में करीब 25 करोड़ लोग भीषण खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। भारत के लिए चुनौती गंभीर है, क्योंकि विश्व जीडीपी में कृषि का हिस्सा भले सिर्फ 4% हो, भारत में यह 15% है और इस पर देश की बड़ी आबादी निर्भर है।