प्रदीप सिंह, रांची। 'हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है', 'मयखाने से शराब से साकी से जाम से अपनी तो जिंदगी शुरु होती है शाम से, 'दे दारू दे दारू ओ मेरे भैया दे दारू' या फिर 'ठुकराओ अब के प्यार करो मैं नशे में हूं जो चाहो मेरे यार करो मैं नशे में हूं'। आप सोच रहे होंगे हम शराब से संबंधित गानों और गजलों का जिक्र क्यों कर रहे हैं। इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण है। कारण यह है कि झारखंड में विधायकों ने मांग की है कि विधानसभा परिसर में ही उनके लिए शराब की दुकान खोली जाए, क्योंकि सरकार ने राज्य में आंशिक शराबबंदी लागू की है, जिसकी वजह से विधायकों को शराब लेने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यह मांग विपक्ष की तरफ से आई है और विपक्ष की दलील है कि जब सरकार ही शराब बेच रही है तो फिर विधानसभा परिसर में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है। दरअसल, झारखंड में सरकारी शराब की दुकानें माननीय विधायकों को रास नहीं आ रही हैं। वजह, सरकारी शराब दुकानों की संख्या काफी कम है और यहां शराब खरीदने के लिए भारी भीड़ लगती है और शराब के शौकीन लंबी लाइन में खड़े होने को मजबूर होते हैं।

विधायकों को खासी परेशानी 

राजधानी रांची में भी कुछ ऐसे ही हालात हैं लिहाजा विधायकों और उनके खास समर्थकों को खासी परेशानी झेलनी पड़ती है। इससे बचने के लिए उन्होंने सरकार के समक्ष विधानसभा परिसर में शराब की एक दुकान खोलने की मांग उठाने का निर्णय लिया है। राज्य विधानसभा का शीतकालीन सत्र 12 दिसंबर से आरंभ होने वाला है और विधायक अपनी इस मांग से विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव समेत सरकार के मुखिया रघुवर दास को अवगत कराएंगे। झारखंड मुक्ति मोर्चा विधायक दल के सचेतक कुणाल षाडंगी कहते हैं कि सरकार को सोचना चाहिए कि आखिरकार विधायक कैसे भीड़भाड़ भरी शराब दुकानों में जाएंगे। जाहिर है इससे परेशानी हो रही है। बेहतर होगा कि सरकार विधानसभा परिसर में ही एक दुकान खोल दे। इससे विधायकों को शराब खरीदने में आसानी हो जाएगी।

बोले नेता प्रतिपक्ष : जब सरकार को ही शराब बेचनी है तो इस मांग को पूरा करने में परेशानी क्या है? झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायकों ने अपनी इस अनूठी मांग पर पूर्व मुख्यमंत्री सह नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन से भी रायशुमारी की है। हेमंत सोरेन कहते हैं कि सरकार पोषाहार तो ठीक से बंटवा नहीं पाती लेकिन खुद शराब बेचने का निर्णय लेती है। विधायकों ने उनके समक्ष परेशानी उठाई है। वे चाहते हैं कि यह मामला विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान उठाया जाए। हम सरकार से मांग करेंगे कि विधायकों की सुविधाओं का ख्याल रखा जाए। बेहतर होगा कि सरकार विधानसभा परिसर में ही शराब की एक दुकान खोल दे। जब सरकार को हीं शराब बेचनी है तो इस मांग को पूरा करने में परेशानी क्या है?

सरकारी नियंत्रण के कारण घटी दुकानों की संख्‍या
राज्य सरकार की नई शराब वितरण नीति के तहत शराब की नियंत्रित बिक्री हो रही है। सरकार इसे नियंत्रित शराबबंदी का भी नाम देती है। इसके तहत दुकानों की संख्या सीमित कर दी गई है। दुकानें दोपहर एक से चार बजे तक खुलती हैं। इसके बाद एक घंटे तक दुकानें बंद कर दी जाती हैं। फिर शाम पांच बजे से रात दस बजे तक शराब की दुकानें खुलती हैं। ज्यादा भीड़भाड़ होने की वजह से अधिकतर दुकानों का स्टाक रात दस बजे के पहले ही समाप्त हो जाता है। कई स्थानों पर भीड़भाड़ ज्यादा होने के कारण पुलिस भीड़ को नियंत्रित करती नजर आती है। पहले जब शराब का वितरण नीलामी के जरिए होता था तो राज्य भर में डेढ़ हजार से ज्यादा दुकानें थीं। अब इसकी संख्या बमुश्किल पांच सौ रह गई है।

विधानसभा में विधायकों के लिए मौजूद सुविधाएं
बैंक की शाखा, रेलवे टिकट रिजर्वेशन काउंटर, दवाखाना, कैंटीन, आवास, गेस्ट हाउस, खादी बोर्ड का काउंटर आदि।

एक अगस्त से सरकारी शराब दुकानें हैं चालू
झारखंड सरकार ने शराब वितरण की नई व्यवस्था एक अगस्त से प्रभावी की है। पहले शराब दुकानों की बोली नीलामी के जरिये लगती थी। नई व्यवस्था के तहत शराब दुकानों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण है। सरकार ने मैनपावर एजेंसी बहाल कर शराब बेचने के लिए कर्मी बहाल किए हैं। सख्त हिदायत दी गई है कि शराब दुकान का कोई प्रचार नहीं होगा। दुकान पर शराब कंपनियां अपने ब्रांड का प्रचार तक नहीं करेंगी। इसका सख्ती से पालन किया जा रहा है।

शराबबंदी की भी उठती रही है मांग
बिहार में शराबबंदी के बंद झारखंड में भी शराब को पूर्णतः प्रतिबंधित करने की मांग उठी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके लिए बकायदे कई स्थानों पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लिया। मुख्यमंत्री रघुवर दास का कहना है कि सरकारी शराब दुकानें भी शराबबंदी का ही हिस्सा है। इससे शराब का वितरण कम होगा जो धीरे-धीरे एच्छिक शराबबंदी की तरफ बढ़ेगा। राज्य सरकार ने इसी मुहिम के तहत नशामुक्त गांवों को एक लाख रुपए का पुरस्कार देने की घोषणा की है। हाल हीं में रांची से सटे आरा नामक एक गांव को नशामुक्त गांव के तहत मुख्यमंत्री ने पुरस्कृत किया है।

महंगे ब्रांड के लिए तरस रहे शौकीन
झारखंड सरकार की तरफ से संचालित शराब दुकानों में चलताऊ किस्म की शराब और बीयर उपलब्ध हैं। प्रीमियम ब्रांड की शराब यहां शौकीनों को मयस्सर नहीं है सो इन्हें पड़ोसी राज्यों समेत अन्य साधनों का रुख करना पड़ता है। हालांकि, इससे निपटने के लिए शापिंग माल में शराब उपलब्ध कराने की तैयारी चल रही है। फिलहाल यह प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन है। अगर इसपर मुहर लगी तो लोग लंबी लाइन में लगकर पसंदीदा शराब खरीदने की परेशानी से बच पाएंगे। इसके साथ हीं उन्हें पसंदीदा ब्रांड भी मयस्सर हो पाएगा।

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Posted By: Gunateet Ojha

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