यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 15, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
रिश्वतखोर बन रहे हैं गंगा की सफाई में रोड़ा : सुप्रीम कोर्ट
गंगा की सफाई में रिश्वतखोर रोड़ा बन रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति पर अफसोस जताते हुए कहा कि जिन्हें ...और पढ़ें

नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। गंगा की सफाई में रिश्वतखोर रोड़ा बन रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति पर अफसोस जताते हुए कहा कि जिन्हें काम करना चाहिए वे नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे रिश्वत ले रहे हैं। पुलिस फेल होती है तो सेना बुलाई जाती है लेकिन जब सेना फेल हो जाए तो क्या किया जाए? कोर्ट ने बुधवार को गंगा सफाई मामले में सुनवाई के दौरान नदियों में गंदगी रोकने के लिए जिम्मेदार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की निष्क्रियता पर ये टिप्पणियां की।
न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने छह महीने से खाली पड़े सीपीसीबी चेयरमैन के पद पर सरकार से जवाब भी मांगा है। कोर्ट ने सरकार से बुधवार को भी कहा कि वह गंगा को स्वच्छ बनाने की योजना पर स्पष्ट नजरिया पेश करे। यह बताए कि कौन-कौन सी योजनाएं हैं और उन्हें कैसे लागू किया जाएगा किस चरण में क्या काम होगा? शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही सरकार से नदी में प्रदूषण करने वाली औद्योगिक इकाइयों की निगरानी के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से रियल टाइम मानीटरिंग पर मांगी गई रिपोर्ट का अपडेट भी देने को कहा है। इसके अलावा कोर्ट ने सीपीसीबी से गंगा को प्रदूषित करने वाली 222 औद्योगिक इकाइयों पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है। दोनों को 27 तक जवाब देना है। 29 अक्टूबर को फिर सुनवाई होगी।
इससे पहले सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने गंगा को निर्मल बनाने के लिए हो रहे प्रयासों का ब्योरा देते हुए बताया कि गंगा क्षेत्र में पड़ने वाले पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के 118 कस्बे और 1640 ग्राम पंचायतों को चिन्हित किया गया है जहां स्वच्छता अभियान चलाया जाएगा। इसके गंगा सफाई की योजनाएं चल रही हैं। जिनमें एसटीपी लगाना, इंटरसेप्शन बनाना और जलीय जीवजंतु संरक्षण व स्वच्छता के लिए जागरुकता लाना शामिल है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डो से रिपोर्ट मांगी गई है। कुमार ने कहा कि केंद्र योजनाएं बनाकर पैसे देती है लेकिन जल और स्वच्छता राज्य का विषय है और योजनाएं लागू करना राज्यों की जिम्मेदारी है उनके सहयोग के बगैर कुछ नहीं हो सकता। कोर्ट इस पर राज्यों से जवाब मांगे।
उधर, उत्तराखंड की ओर से पेश अपर महाधिवक्ता मुकेश गिरि ने कहा कि राज्य ने गोमुख से भागीरथी तक के क्षेत्र को इको सेंस्टिव क्षेत्र घोषित किया है और वहां निर्माण पर रोक है। उनका राज्य योजनाएं लागू कर रहा है।
सुनवाई के दौरान सीलिंग की निगरानी की तरह गंगा को प्रदूषित करने वाली औद्योगिक इकाइयों की निगरानी पर भी चर्चा हुई और भूरेलाल जैसी विशेषज्ञ समिति बनाने की राय आई। कोर्ट ने भी मैट्रो मैन श्रीधरन जैसे विशेषज्ञ को गंगा सफाई योजना में शामिल करने की बात कही। चर्चा चलते चलते सीपीसीबी तक पहुंची जिसे कानून में नदियों में प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी मिली है। जब कोर्ट ने सीपीसीबी के वकील विजय पंजवानी से इस पर सवाल किया तो पंजवानी ने कहा कि औद्योगिक इकाइयों की जांच का काम राज्य बोर्डो का है और राज्य बोर्ड सीपीसीबी के आदेशों का पालन नहीं करते हैं। कोर्ट ने स्थिति पर अफसोस जताते हुए कहा कि जिन लोगों पर गंगा में गंदगी न जाने देने की जिम्मेदारी है वे चुप बैठे हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें यह काम पसंद नहीं बल्कि इसलिए कि वे रिश्वत ले रहे हैं। पुलिस फेल होती है तो सेना बुलाई जाती है और अगर सेना फेल हो जाए तो क्या हो।
