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CEC ज्ञानेश कुमार पर सियासी घमासान: जानिए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और महाभियोग के नियम

Published: Sat, 26 Sep 2026 08:21 PM (IST)

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे सियासी घमासान के बीच, यह लेख चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और ...और पढ़ें

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया (जागरण ग्राफिक्स)

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया (जागरण ग्राफिक्स)

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गरिमा सिंह, नई दिल्ली। हाल के दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है। विपक्ष जहां एक ओर महाभियोग प्रस्ताव लाने की बात कर रह है वहीं दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि सभी फैसले सर्व सम्मति से लिए गए थे।

एक अंग्रेजी अखबार की रिपोट में यह दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कई महीनों में आयोग के फैसलों और कामकाज की प्रक्रिया पर बार-बार आंतरिक आपत्तियां दर्ज कराई।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि पिछले साल स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले दोनों चुनाव आयुक्तों को बताए बिना ही लिए गए थे। शनिवार को आयोग ने कहा कि किसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर विचार-विमर्श, आपत्तियां और सुझाव आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) और तकनीक से जुड़े सभी अंतिम फैसले तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति और पूर्ण सहमति से ही लिए गए थे, लेकिन कांग्रेस समेत पूरा विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में हैं।

वहीं कॉकरोच जनता पार्टी एक कदम और आगे बढ़कर सीधे ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही है। आइए विस्तार से जानते हैं इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उन्हें हटाने की प्रक्रिया के बारे में।

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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?

देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग (ECI) की होती है। संविधान का अनुच्छेद 324 CEC और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023, CEC की नियुक्ति, कार्यकाल और उन्हें हटाने से जुड़े नियम तय करता है।

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (LoP) और केंद्रीय कैबिनेट के एक सदस्य वाली तीन-सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति होती हैं।

2023 के अधिनियम के अनुसार, नियुक्त होने वाले व्यक्ति ने पहले सरकार में सचिव स्तर के पदों पर काम किया हो और वो 'ईमानदार व्यक्ति हों, जिन्हें चुनाव के प्रबंधन और संचालन का अनुभव हो।'

इन पदों पर नियुक्ति छह साल के कार्यकाल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, के लिए की जाती है। CEC को वही सेवा और आर्थिक लाभ मिलते हैं जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को मिलते हैं।

Election Commission of India (3)

मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?

संविधान का अनुच्छेद 324 (5) कहता है कि CEC को पद से केवल 'उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।'

यह बात 2023 के एक्ट की धारा 11(2) में भी कही गई है। अनुच्छेद में आगे कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय चुनाव आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया जाएगा।

चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए, CEC को हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर बहुत कठिन रखा गया है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है, उन्हें केवल 'साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर' ही हटाया जा सकता है।

कदाचार में कोई भी भ्रष्ट तरीका या पद का दुरुपयोग शामिल हो सकता है। समय के साथ, अदालतों ने इसका मतलब यह निकाला है कि इसमें ऐसे काम शामिल हैं जो CEC के पद के अनुकूल नहीं हैं या CEC अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों को निभाने में नाकाम रहे हैं। अक्षमता का मतलब ऐसी स्थिति से है जब अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में असमर्थ हो।

CEC को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, दोनों सदनों के सदस्यों को गलत व्यवहार या अक्षमता का साफ आरोप लगाते हुए एक प्रस्ताव का नोटिस लाना होगा।

महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए, लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं। वे प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए लोगों और जानकारो से सलाह ले सकते हैं। अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की सच्चाई की जांच के लिए एक समिति बनाई जाती' है।

हटाने के प्रस्ताव को हर सदन के कुल सदस्यों में से ज्यादातर का सपोर्ट मिलना चाहिए और संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पास होना चाहिए।

एक बार प्रस्ताव पास होने के बाद, राष्ट्रपति, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का निर्देश देते हैं। संवैधानिक जरूरतें पूरी होने के बाद कोई फैसला नहीं होता, क्योंकि इस मामले में राष्ट्रपति संसंद की सलाह पर काम करते हैं।

क्या भारत में किसी चीफ इलेक्शन कमिश्नर पर महाभियोग हुआ है?

नहीं। अप्रैल में, राज्यसभा सभापति और लोकसभा स्पीकर ने CEC कुमार को हटाने के लिए विपक्ष द्वारा दोनों सदनों में जमा किए गए महाभियोग प्रस्ताव को रिजेक्ट कर दिया था। दोनों प्रेसाइडिंग ऑफिसर्स ने अपने फैसलों के लिए कोई वजह नहीं बताई और अपोजिशन लीडर्स ने इस कदम की निंदा की।

12 मार्च को लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश करने में TMC ने विपक्ष का नेतृत्व किया; लोकसभा वाले प्रस्ताव पर 130 सांसदों और राज्यसभा वाले प्रस्ताव पर 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए।

दोनों प्रस्तावों में चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) का जिक्र किया गया और CEC पर 'पक्षपाती और भेदभावपूर्ण व्यवहार' करने और 'चुनावी धोखाधड़ी और SIR की जांच में बाधा डालने' का आरोप लगाया गया।

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