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वोटर लिस्ट से फॉर्म 6 तक, ECI के इन बड़े मुद्दों पर क्यों आमने-सामने आए आयुक्त? 7 प्वाइंट्स में समझिए पूरी कहानी

Published: Sat, 26 Sep 2026 07:48 PM (IST)

चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच फॉर्म 6, वोटर डेटाबेस जैसे अहम मुद्दों पर ...और पढ़ें

चुनाव आयोग में मतभेद और उठते सवाल

चुनाव आयोग में मतभेद और उठते सवाल

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में चुनाव जीवंत और प्रतिस्पर्धी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जहां राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत झोंकते हैं। जनता अपना वोट देकर जनादेश तय करती है। इस पूरी प्रक्रिया में भारत का निर्वाचन आयोग एक निष्पक्ष रेफरी की भूमिका निभाता है।

चुनाव आयोग का मुख्य दायित्व नियम बनाना है, उन्हें बिना किसी पक्षपात के लागू करना और सभी दलों को बराबरी का मैदान प्रदान करना है।

हालांकि, हाल ही में पूरा ध्यान मैदान में लड़ रहे राजनीतिक खिलाड़यों से हटकर निष्पक्ष रेफरी, यानी चुनाव आयोग पर आ टिका है। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयुक्तों के बीच आंतरिक मतभेदों की खबरें सामने आईं, जिसने देश में एक नई बहस छेड़ दी है।

इस पूरे विवाद, ECI के कामकाज और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।

क्या है यह पूरा विवाद?

हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के सामने कई प्रशासनिक व नीतिगत फैसलों पर बार-बार आपत्ति दर्ज कराई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर ऐसी आपत्तियां उठाई गईं।

दोनों आयुक्तों का आरोप था कि कई अहम फैसलों और आधिकारिक संचार उनकी पूर्व जानकारी या लिखित सहमति के बिना जारी किए गए थे। इन मुद्दों में चुनावी फॉर्म में बदलाव, इलेक्टोरल डेटाबेस तक पहुंच, काम का आंतरिक बंटवारा और वोटर लिस्ट से जुड़ी अपीलों का प्रबंधन शामिल था।

इस खबर के सामने आने के बाद विवाद गहरा गया। आयोग में सामूहिक फैसले लेने की वजह मुख्य चुनाव आयुक्त का एकाधिकार बढ़ने के आरोप लगने लगे।

किन मुद्दों पर जताईं आपत्तियां?

रिपोर्ट के अनुसार, आयुक्त संधू और जोशी ने आयोग के कामकाज की कई व्यवस्थाओं पर औपचारिक नोट के जरिए चिंता व्यक्त की थी।

नए वोटरों के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में किए गए बदलावों पर दोनों आयुक्तों ने आपत्ति जताई। विवेक जोशी ने चेताया था कि 'Registration of Electors Rules, 1960' में आधिकारिक संशोधन किए बिना यह बदलाव गैर-कानूनी है। वहीं, संधू ने इसे तुरंत वापस लेने की मांग की थी।

आयुक्तों ने चिंता जताई कि वोटर डेटाबेस का केंद्रीकरण किया जा रहा है और कानूनी अधिकारियों (जैसे EROs) की ERONet पोर्टल पर पूरी पहुंच सीमित कर दी गई है। उन्होंने IT महानिदेशक के अधिकारों और राज्य-स्तरीय अधिकारियों की शिकायतों का हवाला देते हुए डेटा सुरक्षा और पहुंच का ऑडिट कराने का प्रस्ताव दिया।

इसके साथ ही दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर IT इंफ्रास्ट्रक्चर की निगरानी से जुड़े नियमों में बदलाव पर आपत्ति जताई और कहा कि यह कदम उनकी जानकारी के बिना उठाया गया।

पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान दायर लगभग 16.10 लाख अपीलों की प्रक्रिया और आधार से उन्हें सूचित नहीं रखा गया। इसी तरह, गोवा में 97 योग्य वोटरों के नाम सॉफ्टवेयर में विकल्प न होने के कारण समय पर बहाल न हो पाने पर भी सवाल उठे।

संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के नए कानून का हवाला देते हुए आयुक्तों ने कहा कि आयोग के नाम से जारी कुछ आधिकारिक संचार पूरे आयोग की मंजूरी के बिना बाहर भेजे गए।

चुनाव आयोग ने आरोपों को किया खारिज

चुनाव आयोग ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया है कि आंतरिक नोट्स या मतभेदों का मतलब संस्था के कामकाज में कोई गड़बड़ी या रुकावट है। आयोग ने एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि किसी भी बहु-सदस्यीय निकाय में अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना एक सामान्य और स्वस्थ संस्थगत विचार-विमर्श का हिस्सा है।

चुनाव आयोग के अनुसार, पिछले एक साल में देश भर में वोटर लिस्ट में सुधार, 40 से अधिक नई पहलों और विभिन्न चुनावी सुधारों से जुड़े सभी अंतिम फैसले पूरे आयोग की आम सहमति से ही लिए गए हैं।

आयोग ने मीडिया रिपोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि 10 महीनों की अवधि में से केवल कुछ चुनिंदा अंदरूनी नोट्स को सामने लाना स्थिति की अधूरी और एकतरफा तस्वीर पेश करता है, जबकि सर्वसम्मति से जारी दर्जनों बड़े फैसलों को नजरअंदाज कर दिया गया है।

किसका होता है अंतिम फैसला?

कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त के पास अन्य चुनाव आयुक्तों की तुलना में कोई विशेषाधिकार या वीटो पावर नहीं होती है।

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 में स्पष्ट प्रावधान है कि आयोग को अपने सभी कार्य जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से करने चाहिए। हालांकि, यदि किसी विषय पर आयुक्तों के बीच राय अगल अलग होती है, तो फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाता है।

इसका अर्थ यह है कि संवैधानिक रूप से तीन सदस्यों वाले इस आयोग में CEC केवल "बराबर वालों में सबसे आगे" होता है। यदि दोनों चुनाव आयुक्त किसी प्रस्ताव पर एक तरफ हो जाएं, तो बहुमत का फैसला ही मान्य होगा और CEC उसे अकेले नहीं पलट सकता।

2023 का कानून क्यों है विवादों में?

इस पूरे विवाद की जड़ में चुनाव आयोग की स्वायत्तता और उसकी नियुक्ति प्रक्रिया शामिल है।

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक CEC और ECs का चयन एक 3 सदस्यीय समिति करेगी, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, और मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे।

हालांकि, इसके बाद संसद द्वारा पारित 'मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023' में चयन समिति का ढांचा बदल दिया गया। इसमें CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया।

इस कानून को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाया कि चयन समिति में 2 सदस्यों के सरकार से होने के कारण यह समिति पूरी तरह से कार्यपालिका के पक्ष में झुक जाती है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होती है।

इस नए कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। जजों की दो सदस्यीय पीठ की राय बंटी होने के बाद इस मामले की सुनवाई 5 सदस्यीय संविधान पीठ कर सकती है।

CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया कठिन क्यों?

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया आसान नहीं है। संविधान ने उन्हें पद की सुरक्षा देने के लिए बेहद कठिन प्रक्रिया तय की है। ताजा विवाद के बीच विपक्षी दलों द्वारा CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की खबरें सामने आई हैं।

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत, CEC को केवल उसी प्रक्रिया और आधार पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को। यानी केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर।

संसद में इसके लिए नंबर की मुख्य भूमिका है। प्रस्ताव शुरू करने के लिए लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाले नोटिस की आवश्यकता होती है।

संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में इस प्रस्ताव को पारित करने के लिए कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत अनिवार्य है। इसके बाद राष्ट्रपति औपचारिक रूप से हटाने का आदेश जारी करते हैं।

अन्य चुनाव आयुक्तों को सीधे संसद द्वारा नहीं, बल्कि केवल CEC की लिखित सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।

चुनाव आयोग का ढांचा 1950 से अब तक कैसे बदला?

भारत का निर्वाचन आयोग हमेशा से बहु-सदस्यीय निकाय नहीं था। इसका विकास तीन चरणों में हुआ है:

1950 - 1989: आयोग एक-सदस्यीय निकाय था, जिसमें केवल मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) होते थे।

1989 - 1990: इसे पहली बार 3-सदस्यीय निकाय बनाया गया, लेकिन 1990 में वापस एक-सदस्यीय कर दिया गया।

1993 से अब तक: अक्टूबर 1993 में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने अध्यादेश लाकर इसे स्थायी रूप से 3-सदस्यीय निकाय (1 CEC और 2 ECs) बना दिया। तात्कालिक CEC टी.एन. शेषन ने इसे अपने अधिकारों में कटौती मानकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

1995 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए बहु-सदस्यीय ढांचे को सही ठहराया और स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग किसी एक व्यक्ति के आदेश से चलने वाला पदानुक्रम नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक संस्था है जहां तीनों सदस्यों को सामूहिक रूप से काम करना है।