विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

भारत के लिए क्यों 'गुड न्यूज' है बांग्लादेश में तारिक रहमान की वापसी? 5 प्वाइंट में समझें

By Jaiprakash RanjanEdited By: Shubham Tiwari
Published: Fri, 13 Feb 2026 10:18 AM (GMT+05:30)Updated: Fri, 13 Feb 2026 12:06 PM (GMT+05:30)

बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, और तारिक रहमान नए प्रधानमंत्री होंगे। भारत इसे चुनौती से ...और पढ़ें

बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन भारत के लिए सहयोग का नया अवसर (फोटो रॉयटर्स)

बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन भारत के लिए सहयोग का नया अवसर (फोटो रॉयटर्स)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। बांग्लादेश के आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना और जमात-ए-इस्लामी का बहुमत से दूर रहना दक्षिण एशिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। आवामी लीग की अनुपस्थिति में यह चुनाव पूरी तरह नई राजनीतिक व्यवस्था लेकर आया है। पूर्व पीएम खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान नए प्रधानमंत्री होंगे।

मौजूदा भू-राजनीतिक और आर्थिक हालात को देखते हुए यह परिणाम भारत के लिए प्रतिकूल से अधिक संतुलित अवसर प्रदान करने वाला माना जा सकता है। भारत भी तारिक रहमान की अगुवाई में गठित होने वाली नई सरकार के साथ काम करने को तत्पर है।

पीएम नरेंद्र मोदी ने चुनाव परिणाम पर स्थिति साफ होते ही बधाई संदेश भेजा है, तारिक रहमान को बधाई दी है और कहा है कि, “बांग्लादेश की जनता ने तारिक रहमान के नेतृत्व के प्रति अपना भरोसा जताया है। भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिवादी और समावेशी बांग्लादेश के साथ हमेशा खड़ा रहेगा। मैं आपके साथ मिलकर हमारे बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और हमारे साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हूं।”

नीचे पांच बिंदुओं में विस्तार से समझिए कि क्यों ये नतीजे भारत के लिए बहुत खराब नहीं कहे जा सकते:

1. जमात को बहुमत न मिलना- सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से राहत -

बीएनपी की पुरानी सरकारों में भारत के अनुभव बहुत सुखद नहीं हैं, फिर भी किसी भी स्थिति में तारिक रहमान की पार्टी जमात-ए-इस्लामी से बेहतर साबित होगी। जमात-ए-इस्लामी का वैचारिक झुकाव लंबे समय से पाकिस्तान समर्थक राजनीति और इस्लामी कट्टरपंथी धाराओं की तरफ माना जाता रहा है। यदि उसे स्पष्ट बहुमत मिलता, तो भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं पर अस्थिरता, कट्टरपंथी नेटवर्क की सक्रियता और सीमा पार घुसपैठ जैसी चिंताएं बढ़ सकती थीं।

jamat (1)

जमात ने इस चुनाव में भारत के लिए भले ही नरम रवैया अपनाया है लेकिन पूर्व में वह हमेशा से भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने वाला रहा है। भारत में घटित घटनाओं के खिलाफ बांग्लादेश में रैली निकालना उसका प्रमुख राजनीतिक हथियार रहा है। बहुमत से दूर रहना संकेत देता है कि बांग्लादेश की सत्ता पूरी तरह वैचारिक ध्रुवीकरण की दिशा में नहीं गई है। इससे भारत को सुरक्षा मोर्चे पर तत्काल दबाव का सामना नहीं करना पड़ेगा।

2. आर्थिक संकट प्राथमिक चुनौती: भारत की भूमिका अहम

बांग्लादेश की मौजूदा आर्थिक स्थिति दबाव में है, विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट, निर्यात क्षेत्र पर दबाव और मुद्रास्फीति जैसी चुनौतियां सामने हैं। ऐसी परिस्थिति में बीएनपी सरकार की पहली प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को स्थिर करना और विकास की पटरी पर लौटाना होगी। भारत और बांग्लादेश के बीच पिछले वर्षों में (शेख हसीना के कार्यकाल में) द्विपक्षीय कारोबार तेजी से बढ़ा था। ऊर्जा सहयोग, बिजली निर्यात, पेट्रोलियम पाइपलाइन, रेल और सड़क संपर्क, बंदरगाह उपयोग जैसे कई प्रोजेक्ट दोनों देशों को जोड़ते हैं। भारतीय कंपनियों का वहां कुल निवेश पांच अरब डालर के करीब है।

नई सरकार के लिए इन परियोजनाओं को जारी रखना और व्यापार प्रवाह को सामान्य बनाए रखना व्यावहारिक आवश्यकता होगी। बीएनपी के घोषणा पत्र में भारत के प्रति कोई नकारात्मक या टकरावपूर्ण रुख नहीं अपनाया गया। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी आर्थिक यथार्थ को समझते हुए भारत के साथ संबंधों को टकराव के बजाय सहयोग के आधार पर आगे बढ़ाना चाहेगी। आर्थिक पुनर्निर्माण में भारत की निवेश, बाजार और ऊर्जा सहायता अहम साबित हो सकती है।

Tarique Rahmanp


3. भारत की ओर से पहले से संपर्क-सुधार की पहल

नई दिल्ली ने पिछले कुछ महीनों में यह स्पष्ट संकेत दिया था कि वह शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग से आगे बढ़ने को तैयार है। कूटनीतिक स्तर पर बीएनपी नेतृत्व के साथ संवाद के चैनल खुले रखे गए। बैकचैनल वार्ता, राजनयिक संपर्क और राजनीतिक स्तर पर संतुलित संदेशों के जरिए यह सुनिश्चित किया गया कि सत्ता परिवर्तन की स्थिति में भी रिश्ते अचानक तनावपूर्ण न हों।

विदेश मंत्री एस जयशंकर खालिदा जिया की मौत के बाद ढाका गये, भारतीय संसद ने उनकी मौत पर शोक जताया। इस रणनीतिक तैयारी का लाभ अब मिल सकता है। नई सरकार के लिए भारत विरोधी रुख अपनाना उतना आसान नहीं होगा, क्योंकि संवाद की बुनियाद पहले से मौजूद है।

4. परस्पर निर्भरता और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं

भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी में बांग्लादेश की भूमिका महत्वपूर्ण है। रेल मार्ग, अंतर्देशीय जलमार्ग, सड़क गलियारे और सीमा हाट जैसी व्यवस्थाएं दोनों देशों की स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करती हैं।

बीएनपी के लिए इन परियोजनाओं को रोकना या धीमा करना आर्थिक रूप से नुकसानदेह होगा। इसके उलट, इन्हें आगे बढ़ाना उसे घरेलू स्तर पर विकासोन्मुख छवि देगा। इसलिए व्यावहारिक राजनीति संबंधों को स्थिर रखने की दिशा में काम कर सकती है। शेख हसीना ने पूर्वोत्तर भारत की इकोनॉमी को बांग्लादेश से जोड़ने की पहल की थी। इससे बांग्लादेश को कई तरह के आर्थिक लाभ होने की संभावना है।

5. बदलती वैश्विक व्यवस्था: रणनीतिक संतुलन की जरूरत

दुनिया इस समय भू-राजनीतिक पुनर्संतुलन के दौर से गुजर रही है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा तेज़ है, चीन की आर्थिक सक्रियता और पाकिस्तान के साथ उसके समीकरण स्पष्ट हैं। ऐसे में बांग्लादेश के लिए किसी एक धुरी पर पूरी तरह झुकना जोखिम भरा होगा। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में स्थिर और विश्वसनीय साझेदार की आवश्यकता बढ़ती है।

भारत, जो क्षेत्रीय स्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, बांग्लादेश के लिए एक स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार बना रहेगा। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सहयोग और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में द्विपक्षीय रणनीतिक संबंध मजबूत करना ढाका की भी आवश्यकता होगी।

चुनाव परिणाम भारत के लिए पूर्ण संतोष का कारण नहीं, लेकिन गंभीर चिंता का संकेत भी नहीं हैं। जमात बहुमत से दूर है, बीएनपी का रुख व्यावहारिक दिख रहा है, और आर्थिक मजबूरियां सहयोग की दिशा में प्रेरित कर सकती हैं। हालांकि, आवामी लीग की अनुपस्थिति में जमात एक मजबूत विपक्षी शक्ति के रूप में उभरी है, जो भविष्य में भारत-विरोधी भावनाओं को हवा देने की कोशिश कर सकती है।

इसलिए नई दिल्ली को अवसर और चुनौती, दोनों को ध्यान में रखते हुए बहु-स्तरीय कूटनीति अपनानी होगी। भारत और बांग्लादेश के संबंधों में भी एक नये युग की शुरुआत होने जा रही है। भारत को राजनीतिक धैर्य के साथ सतर्कता और आगे बढ़ कर ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति को लागू करना होगा। अफगानिस्तान, मालदीव और श्रीलंका में भारत ऐसा कर चुका है।

यह भी पढ़ें- कौन हैं तारिक रहमान? 17 साल का वनवास खत्म कर बन सकते हैं बांग्लादेश के पीएम, 4 साल की उम्र में गए थे जेल

यह भी पढ़ें- पीएम मोदी ने तारिक रहमान को दी जीत की बधाई, कहा- बांग्लादेश के साथ खड़ा रहेगा भारत

यह भी पढ़ें- बांग्लादेश चुनाव में BNP की बंपर जीत, 17 साल बाद लौटे तारिक रहमान का पीएम बनना तय; 10 बड़ी बातें