केरल के बाद अब कर्नाटक में कांग्रेस के सामने नेतृत्व की चुनौती, डीके शिवकुमार के समर्थकों ने तेज की मांग
केरल में नेतृत्व परिवर्तन के बाद कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर हलचल तेज हो गई है। डीके शिवकुमार ...और पढ़ें

केरल के बाद अब कर्नाटक में कांग्रेस के सामने नेतृत्व की चुनौती। (सोशल मीडिया)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केरल में वी डी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद अब कांग्रेस के भीतर कर्नाटक नेतृत्व को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के समर्थकों का मानना है कि राज्य में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही खींचतान को अब ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता।
शुक्रवार को डीके शिवकुमार के 64वें जन्मदिन के मौके पर उनके समर्थकों ने पूरे कर्नाटक, खासकर बेंगलुरु में पोस्टर, बैनर और डिजिटल होर्डिंग्स लगाए। इनमें शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने की मांग प्रमुखता से दिखाई दी।
कर्नाटक कांग्रेस में हलचल तेज
हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि सिद्दरमैया ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे, लेकिन केरल में हुए नेतृत्व परिवर्तन ने शिवकुमार खेमे को नई उम्मीद दी है। 20 मई को कर्नाटक सरकार के तीन साल पूरे होने जा रहे हैं, ऐसे में राजनीतिक हलचल और बढ़ गई है।
क्या कर्नाटक में होना नेतृत्व परिवर्तन?
राजनीतिक विश्लेषक और अधिवक्ता हिदायतुल्ला कुवेंदा ने कहा कि कांग्रेस हाईकमान के सामने अब बड़ा फैसला लेने की स्थिति है। उनके मुताबिक, "सिद्दरमैया का अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन कर्नाटक के भविष्य के लिए ऐसे नेता की जरूरत है जो ग्रामीण और शहरी दोनों वर्गों को साथ लेकर चल सके। डीके शिवकुमार पार्टी के संकटमोचक रहे हैं और उन्हें आगे लाना कांग्रेस के लिए जरूरी कदम हो सकता है।"
उन्होंने यह भी कहा कि अगर शिवकुमार को अभी मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो अगले विधानसभा चुनाव से पहले उनके पास लगभग दो साल होंगे, जिनमें वह अपनी सरकार की उपलब्धियां दिखा सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार, सिद्दरमैया और शिवकुमार दोनों खेमे इस बात को समझते हैं कि अगर आने वाले कुछ हफ्तों में कोई फैसला नहीं हुआ, तो चुनाव के करीब जाकर इस मुद्दे को उठाना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो सकता है।
'राजनीतिक समझौतों का सम्मान होना चाहिए'
कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने कहा कि मामला अब केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नहीं, बल्कि संगठनात्मक स्पष्टता का बन चुका है। उनका कहना है कि सरकार के कार्यकाल का आधा समय गुजरने के बाद शिवकुमार समर्थक अधिक मुखर हो गए हैं और कई विधायकों को लगता है कि राजनीतिक समझौतों का सम्मान होना चाहिए। वहीं सिद्दरमैया समर्थकों का मानना है कि पार्टी नेतृत्व फिलहाल इस मुद्दे को दोबारा नहीं छेड़ेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केरल और कर्नाटक की परिस्थितियां अलग हैं। विश्लेषक विश्वास शेट्टी के अनुसार, "केरल में कांग्रेस को चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिए नया चेहरा चाहिए था, जबकि कर्नाटक में कांग्रेस पहले से सत्ता में है। यहां अचानक नेतृत्व परिवर्तन प्रशासन, जातीय समीकरण और गुटबाजी पर असर डाल सकता है। जब तक सिद्दरमैया खुद पद छोड़ने का फैसला नहीं करते, तब तक बदलाव की संभावना कम है।"
