Diwali 2026: राम के आयोध्या आगमन के अलावा किन पौराणिक मान्यताओं के चलते मनाई जाती है दीवाली? चेक करें फैक्ट्स
यह लेख दिवाली मनाने के विभिन्न पौराणिक और ऐतिहासिक कारणों पर प्रकाश डालता है, जो भगवान राम के अयोध्या आगमन ...और पढ़ें

Deepawali 2026
HighLights
भगवान राम के अयोध्या आगमन के अलावा अलग-अलग कारणों के चलते मनाई जाती है दिवाली।
लक्ष्मी-विष्णु आगमन, नरकासुर वध, काली पूजा, पांडवों की वापसी।
विक्रमादित्य राज्याभिषेक, बंदी छोड़ दिवस और महावीर निर्वाण जैसे प्रसंग भी शामिल।
एजुकेशन डेस्क, नई दिल्ली। देशभर में 8 नवंबर को दिवाली का त्योहार सेलिब्रेट किया जाता है। हम सभी जानते हैं कि भगवान राम का 14 वर्ष वनवास पूरा होने और रावण वध के बाद जब वे अयोध्या वापस आये तो सभी अयोध्यावासियों ने उनका स्वागत दीप जलाकर और पूरी अयोध्या को सजाकर किया था। इसके बाद से ही लगातर या परंपरा बनी हुई है और हर साल इस पर्व को सेलिब्रेट किया जाता है।
लेकिन, आपको यह नहीं पता होगा कि यह त्योहार केवल भगवान राम के अयोध्या वापसी के चलते ही नहीं बल्कि और भी पौराणिक मान्यताओं के चलते मनाया जाता है। कई स्टेट इसे अपने यहां की मान्यता के अनुसार सेलिब्रेट करते हैं। अब ऐसे में जानना जरूरी है कि और कौन से मान्यताएं हैं जिसके चलते दीवाली मनाई जाती है, जिसकी जानकारी नीचे दी जा रही है।
माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का आगमन
प्राचीन मान्यता के अनुसार कार्तिक माह की अमावस्या को समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसके बाद माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना था। इसी दिव्य घटना के चलते इसे मनाया जाता है। इसलिए दीपावली पर धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और दीप जलाए जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध
दीपावली के अलावा इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में भी जाना जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध करके उसके बंदीगृह से 16 हजार कन्याओं को मुक्त कराया था। इस क्रूर असुर के आतंक से मुक्ति मिलने की खुशी में अगले दिन कार्तिक अमावस्या को लोगों ने पूरे राज्य में दिए जलाकर उत्सव मनाया था, जो दीपावली के रूप में जाना जाता है।
रौद्र रूप के बाद माता काली का शांत होना
भारत के पूर्वी राज्य बंगाल और ओडिशा में दीपावली की रात 'काली पूजा' के रूप में मनाई जाती है। मान्यता है कि जब राक्षसों का संहार करते हुए माता काली अत्यंत क्रोधित हो गई थीं और उनका रौद्र रूप आपे से बाहर हो गया था, तब भगवान शिव उनके चरणों के नीचे आ गए। जैसे ही माता का पैर शिव जी पर पड़ा, उनका क्रोध शांत हुआ। इसी शांत स्वरूप और विजय के उत्सव में माता काली की विशेष पूजा की जाती है।
पांडवों की अज्ञातवास से वापसी
महाभारत कथा के अनुसार जब पांडव 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास पूरा करके अपने राज्य लौटे थे। उनकी प्रजा ने पांडवों के सुरक्षित वापस आने की खुशी में पूरे नगर में दीप प्रज्वलित कर उनका स्वागत किया था।

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राजा विक्रमादित्य का राज्याभिषेक
उज्जैन के महान राजा विक्रमादित्य का राज्याभिषेक भी दीपावली के दिन ही हुआ था। राजा विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रमणकारियों (शकों) को पराजित कर भारत की भूमि से खदेड़ दिया था। इसी दिन से 'विक्रम संवत' की शुरुआत की खुशी और नए युग के आगमन के रूप में भी दीप जलाकर जश्न मनाया जाता है।
बंदी छोड़ दिवस
दीपावली का दिन सिख समुदाय के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। सन 1619 में इसी दिन सिख धर्म के छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी मुगल सम्राट जहांगीर की कैद से ग्वालियर किले से मुक्त हुए थे। उनके साथ 52 हिंदू राजा भी आजाद हुए थे। गुरु जी के अमृतसर पहुंचने की खुशी में श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) को दीयों से सजाया गया था। इसे सिख समुदाय 'बंदी छोड़ दिवस' के रूप में मनाता है।

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भगवान महावीर का निर्वाण दिवस
जैन धर्म में दीपावली को एक परम पवित्र दिन माना जाता है। जैन मान्यताओं के अनुसार, 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को कार्तिक अमावस्या के दिन ही बिहार के पावापुरी में मोक्ष (निर्वाण) की प्राप्ति हुई थी। उनके निर्वाण प्राप्त करने के बाद उनके शिष्यों और अनुयायियों ने आत्मज्ञान की ज्योति और उनके उपदेशों को अमर रखने के प्रतीक के रूप में दिए जलाए थे।
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