कुछ कर्मचारी शोर मचाये बिना चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। जब आउटपुट या रिजल्ट आता है, तब उनके काम को जोरदार चर्चा मिलती है। देर-सबेर ऐसे ही लोगों को कंपनियां रिवॉर्ड देती हैं, उनको नहीं जो शोर ज्यादा और काम कम करते हैं। लो प्रोफाइल वाले लोग कैसे हाई परफॉर्मेंस करने में कामयाब हो पाते हैं, बता रहे हैं अरुण श्रीवास्तव...

कुछ साल पहले की यह कहानी एक मिड लेवल कंपनी में प्रोजेक्ट डिपार्टमेंट के हेड और बड़े समर्पित एम्प्लॉयी प्रभाकर की है। कंपनी और वहां के कर्मचारी सभी उनसे खुश रहते थे। उनके हाथ में आने वाले सभी प्रोजेक्ट भी समय से पहले और बिना किसी त्रुटि के परफेक्शन के साथ पूरे होते थे। हालांकि उन्हें अलग से कुछ नहीं मिलता था, पर वे दूसरे एम्प्लॉयीज के लिए अनुकरणीय थे। कंपनी मैनेजमेंट भी दूसरे कर्मचारियों से उनके जैसे आउटपुट की अपेक्षा करता था। हालांकि कुछ वर्ष बाद निजी कारणों से उन्होंने नौकरी छोड़ दी, लेकिन एमडी के अनुरोध पर वह कंसल्टेंट के रूप में जुड़े रहे। उनकी जगह जो व्यक्ति रखे गए, वे एक साल तक बेहतर रिजल्ट देने में नाकाम रहे। उल्टे प्रोडक्ट की इमेज खराब हो गई। इससे परेशान एमडी को एक सीनियर मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव ने सलाह दी कि क्यों न पहले वाले सज्जन को ही अनुरोध करके वापस लाया जाए। मैनेजमेंट को भी यह आइडिया जम गया। उधर, प्रभाकर भी आर्थिक कारणों से कुछ परेशान चल रहे थे, लेकिन खुद जिस नौकरी को छोड़कर गए थे, वहां लौटने की बात कहने से झिझक रहे थे। ऐसे में कंपनी की तरफ से जब पुन: जुडऩे का संदेश मिला, तो उन्होंने बिना शर्त खुशी से उसी स्वीकार कर लिया।

उत्साह से लबरेज

हालांकि अब स्थितियां काफी बदल गई हैं। बड़बोले और ओवर-स्मार्ट कर्मचारियों को दरकिनार कर अब तमाम कंपनियां उन एम्प्लॉयीज पर ध्यान देने लगी हैं, जो लो प्रोफाइल रहकर अपने काम को बखूबी अंजाम देते हैं। अपने काम के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बताने की बजाय ऐसे लोग बिना शोर मचाये बेहतरीन आउटपुट देने में विश्वास करते हैं। इसके लिए वे सैलरी में अधिक हाइक की डिमांड भी नहीं करते। दरअसल, ऐसे लोग खुद से ही प्रेरित होते रहते हैं। उन्हें इससे कोई मतलब नहीं होता कि अन्य लोग काम कर रहे हैं या नहीं या उनकी तुलना में कम काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वे चुनौतियों से भरे नये-नये काम को हाथ में लेने के लिए भी हमेशा तत्पर रहते हैं, जबकि तमाम दूसरे कर्मचारी बॉस के सामने जाने से हर समय बचते रहते हैं कि कहीं वे उन्हें कोई नया काम न पकड़ा दें।

रिवॉर्ड की पहल

लो प्रोफाइल रहकर बेहतर रिजल्ट देने वाले लोगों का महत्व कंपनियां अब कहीं अधिक अच्छी तरह समझने लगी हैं। यही कारण है कि उनका उत्साह बनाये रखने और बढ़ाने के लिए वे अब उन्हें रिवॉर्ड यानी इनाम देने की पहल भी करने लगी हैं। तमाम कंपनियां अब लो प्रोफाइल वाले टॉप परफॉर्मर की पहचान करने और उन्हें रिवॉर्ड देने के लिए बाकयदा स्ट्रेटेजी बनाने लगी हैं। कुछ कंपनियां तो हर क्वार्टर में ऐसे कर्मचारियों को उनके शानदार परफॉर्मेंस के लिए सम्मानित करती हैं। इन्हें वे ग्लोबल हीरो का नाम देती हैं। साल भर में चुने गए ऐसे परफॉर्मर्स में से एनुअल ग्लोबल परफॉर्मर चुना जाता है। कंपनियों की इस तरह की पहल से बाकी कर्मचारियों को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। इसके अलावा, जो कर्मचारी बिल्कुल फिसड्डी होते हैं, उनकी पहचान करके उनकी स्किल डेवलप करने से लेकर उन्हें अच्छा काम करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके बावजूद जो आगे बढऩे में नाकाम होते हैं, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

* शोर करने की बजाय किसी भी काम में अपना बेस्ट देने वाले ही हाई परफॉर्मर होते हैं।

* अच्छा काम करने वाले इसे अपनी आदत में शुमार कर लेते हैं। तभी वे इसके लिए किसी इनाम मिलने या न मिलने की परवाह नहीं करते।

* कंपनियां अब अपने परफॉर्मर्स की पहचान करके उन्हें रिवॉर्ड देकर प्रोत्साहित करने की पहल करने लगी हैं।

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Posted By: Rajesh Niranjan