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'100 रुपये की सब्जियों से ही पूरा हफ्ता चलाना होगा', सूखे की मार झेल रहे मराठावाड़ा में फसलें बर्बाद; दीवाली पड़ी फीकी

Published: Sat, 31 Oct 2026 11:14 AM (IST)

मराठवाड़ा के धाराशिव में भीषण सूखे के कारण फसलें बर्बाद हो गई हैं, जिससे स्थानीय बाजारों में सन्नाटा पसरा है।

धाराशिव में सूखा पड़ने से फीकी पड़ी दीवाली (AI जेनरेटेड फोटो)

धाराशिव में सूखा पड़ने से फीकी पड़ी दीवाली (AI जेनरेटेड फोटो)

HighLights

  1. धाराशिव में सूखे से फसलें बर्बाद, बाजार खाली।

  2. अल नीनो के कारण कम बारिश, 85% राज्य सूखाग्रस्त।

  3. किसानों की आय घटी, त्योहारों पर भी खरीदारी नहीं।

डिजिटल डेस्क, मुंबई। महाराष्ट्र में मराठवाड़ा के शहर धाराशिव में तोडवाले बाजार में जनजीवन इतना खराब होता जा रहा है कि लोगों के लिए रोज की दो रोटी कमाना भी मुश्किल हो गया है। त्योहारों के समय जहां बाजारों में चहल-पहल रहती है, वहीं यहां के बाजार खाली हैं।

त्योहार के मौसम के करीब आने के बाद भी इस साप्ताहिक बाजार में बहुत कम ग्राहक दिखाई दे रहे हैं। यह बाजार आस-पास के 10 गांवों की जरूरतों को पूरा करता है।

मराठवाड़ा में सूखे ने छीनी लोगों के चेहरों की मुस्कान

धाराशिव सूखाग्रस्त मराठवाड़ा इलाके में आता है। राज्य में पड़े अब तक के सबसे भीषण सूखे से प्रभावित इलाकों में यह भी शामिल है। 'अल नीनो' (El Niño) के कारण बारिश कम हुई है और राज्य का 85% हिस्सा (358 में से 304 तालुका) सूखे की चपेट में है।

धाराशिव में बारिश की 41% कमी रही है। सूखे ने यहां कपास और सोयाबीन की फसलों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार हैं।

धाराशिव के बाजारों में सन्नाटा

कुछ महीने पहले तक, यह बाजार इतना भरा रहता था कि चलने की जगह भी नहीं मिलती थी। लेकिन यहां आने वाले ज्यादातर लोग किसान और खेत मजदूर हैं। फसलें बर्बाद हो जाने और आमदनी न होने की वजह से, उनकी खरीदने की क्षमता बहुत कम हो गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, त्योहार के आस-पास जहां मिठाई और नमकीन वाले दिनों में रोज लगभग 10,000 रुपये कमा लिया करते थे। वे करीब 1,500 रुपये ही कमा पा रहे हैं। लोगों को 100 रुपये की सब्जी से पूरे घर का हफ्ते भर का खाना चलाना पड़ रहा है।

इस बार की दीवाली में न तो यहां के लोग नए कपड़े खरीद रहे हैं और न ही बच्चे पटाखे मांग रहे हैं, क्योंकि किसी के पास कुछ बचा भी नहीं है। बाजारों में ग्राहकों की कमी है, क्योंकि लोगों की जेब खाली हैं।

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