'पूर्व चीफ जस्टिस के नाम का गलत इस्तेमाल किया', बॉम्बे HC ने नासिक में ट्रस्टियों की लिस्ट हटाने का आदेश किया रद
बॉम्बे हाई कोर्ट ने नासिक के एक धार्मिक ट्रस्ट के ट्रस्टियों की सूची हटाने के 14 मार्च के आदेश को रद कर दिया है।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने आदेश किया रद। (फाइल फोटो।)
डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर के तत्कालीन विशेष अधिकारी ने उनके नाम का गलत इस्तेमाल किया। इस अधिकारी ने नासिक के एक धार्मिक ट्रस्ट के लिए चुने गए ट्रस्टियों की सूची को हटाने का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट ने 14 मार्च को जारी किए गए इस आदेश को रद्द कर दिया है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश अब सुप्रीम कोर्ट के जज हैं और संबंधित अधिकारी अंजू शेंडे पुणे में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश हैं। जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले ने गुरुवार को कहा कि वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उस पत्र में दिए गए निर्देशों को कानूनी तौर पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश का फैसला माना जा सकता है।
किस मामले पर सुनाया था फैसला
उन्होंने बताया कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश के नाम का गलत इस्तेमाल किया गया, जिसके कारण रिकॉर्ड पर सामने नहीं आए हैं। बेंच ने नासिक के तत्कालीन प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्रीचंद जगमलानी द्वारा 14 मार्च को जारी किए गए उस आदेश को भी रद कर दिया, जिसके तहत ट्रस्टियों की सूची को वेबसाइट से हटाने और उस पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था।
यह फैसला श्री सप्तश्रृंगी निवासिनी देवी ट्रस्ट के पांच चयनित/अनुशंसित उम्मीदवारों की एक याचिका पर सुनाया गया। उन्होंने शेंडे के 14 मार्च के उस पत्र को चुनौती दी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ हुई टेलीफोन पर बातचीत के आधार पर यह सूचित किया जाता है कि आपके कार्यालय द्वारा प्रकाशित ट्रस्टियों की अनुशंसित सूची को वेबसाइट से हटा लिया जाए और अगले आदेश तक रोक कर रखा जाए।
दलील क्या दी गई?
जगमलानी ने तुरंत एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि सूची वापस ले ली गई है और हाईकोर्ट के अगले निर्देशों तक इस पर रोक लगा दी गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल सखारे ने दलील दी कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो हाई कोर्ट, उसके मुख्य न्यायाधीश या किसी विशेष अधिकारी को प्रशासनिक स्तर पर इस तरह का कोई पत्र या निर्देश जारी करने की अनुमति देता हो।
शेंडे की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शरण जगतियानी ने कहा कि वह इस फैसले का बचाव नहीं करेंगी। हालांकि, उन्होंने कहा कि यह फैसला एकतरफा नहीं लिया गया था, बल्कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों पर लिया गया था।
सखारे ने बताया कि चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ट्रस्ट के पदेन अध्यक्ष के रूप में जगमलानी द्वारा एक विस्तृत प्रक्रिया अपनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप 12 मार्च को ट्रस्टियों की अंतिम सूची जारी की गई। उन्होंने कहा कि इसी दौरान शेंडे ने जगमलानी को पत्र लिखा था।
ट्रस्ट योजना के तहत सात में से पांच ट्रस्टियों की नियुक्ति जिला न्यायाधीश द्वारा की जानी चाहिए। शेंडे ने 14 मार्च के अपने पत्र में महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स (संशोधन) अध्यादेश, 2025 का हवाला देते हुए कहा कि जगमलानी को उच्च न्यायालय से सलाह लेनी चाहिए थी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हालांकि, हाई कोर्ट के जजों ने गौर किया कि जिस धारा के तहत चैरिटी कमिश्नर ने ट्रस्टियों की नियुक्ति के लिए जिला जज की जगह ली, वह 1 मई को लागू हुई थी न कि 14 मार्च को, जब शेंडे ने वह पत्र जारी किया था।
27 अक्टूबर को जजों ने प्रथम दृष्टया यह माना कि स्थापित प्रक्रिया के अनुसार, जिला जज को कोई भी आदेश भेजने से पहले एक प्रस्ताव मुख्य न्यायाधीश या समिति के जजों के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जाना चाहिए। हाई कोर्ट और जिला जज/अध्यक्ष की ओर से जगतियानी और वकील राजेश दातार ने कहा कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया था और यह सूचना जारी करने से पहले उनकी मंजूरी भी नहीं ली गई थी।
न्यायाधीशों ने शेंडे के हलफनामे में दिए गए तर्कों को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि इस संबंध में कोई ठोस सबूत न होने के बावजूद उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर ही सब कुछ मढ़ दिया था। उन्होंने कहा कि शेंडे का आचरण बेहद अनुचित और कानून के खिलाफ था। उन्होंने कहा, "इस विवादित पत्र को स्वीकार नहीं किया जा सकता।"
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