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'अगर SIR से नागरिक ही वोटर लिस्ट से बाहर हो जाते हैं तो फिर इसका मकसद क्या है', बॉम्बे हाई कोर्ट का EC से सवाल

Published: Tue, 06 Oct 2026 09:56 AM (IST)

बॉम्बे हाई कोर्ट ने गोवा की मतदाता सूची से भारतीय नागरिकों के नाम हटाने पर चुनाव आयोग से कड़े सवाल पूछे। अदालत ने आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी पर जोर दिया।

बॉम्बे हाई कोर्ट के चुनाव आयोग से तीखे सवाल। (फाइल फोटो।)

बॉम्बे हाई कोर्ट के चुनाव आयोग से तीखे सवाल। (फाइल फोटो।)

डिजिटल डेस्क, पणजी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सोमवार को चुनाव आयोग से कड़े सवाल पूछे। अदालत ने पूछा कि परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच लोगों के के नाम गोवा की वोटर लिस्ट से कैसे हटा दिया गया, जबकि वे भारतीय नागरिक थे और उन्होंने पता बदलने के लिए फॉर्म 8 भी भरा था।

जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की बेंच ने चुनाव आयोग से पूछा, “…चुनाव आयोग की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह यह पक्का करे कि वोटर लिस्ट में सिर्फ नागरिक ही हों। अगर इस प्रक्रिया (SIR) से नागरिक ही बाहर हो जाते हैं तो इस आदेश का क्या मकसद है?”

अदालत ने क्या कहा?

कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि एसआईआर की पूरी कवायद का मकसद यह पता लगाना था कि वोटर भारतीय नागरिक है या नहीं। कोर्ट ने कहा, “एसआईआर का आधार यह देखना नहीं है कि वोटर किसी खास जगह पर मौजूद है या नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि वोटर भारतीय नागरिक है या नहीं। लगता है इसी वजह से एसआईआर किया जा रहा है।”

'चुनाव आयोग ने वोटर को मुश्किल में डाला'

कोर्ट ने चुनाव आयोग को रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के नियम 21 की याद दिलाते हुए कहा, "हर चीज को मौजूदा वोटर लिस्ट के हिसाब से देखा जाना चाहिए, न कि ड्राफ्ट लिस्ट के हिसाब से। वरना वोटर के पास कोई रास्ता नहीं बचेगा।" जजों ने कहा कि चुनाव आयोग ने वोटर को कैच-22 वाली स्थिति (ऐसी स्थिति जहां कोई भी विकल्प चुनने पर मुश्किल हो) में डाल दिया है।

कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या वोटर लिस्ट से नाम हटाने से पहले परिवार को कोई नोटिस भेजा गया था। चुनाव आयोग की तरफ से पेश वकील गौरीश अग्नि ने कहा कि हर लेवल पर नोटिस बोर्ड पर नोटिस लगाए गए थे, क्योंकि हो सकता है कि आयोग के पास वोटरों की नई जानकारी न हो।

अग्नि ने कहा कि गाइडलाइंस के मुताबिक, जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे (क्योंकि उन्होंने एन्यूमरेशन फॉर्म नहीं भरे थे) उनके लिए फॉर्म 8 पर कार्रवाई नहीं की जा सकती थी।

उन्होंने कहा कि सालगांवकर फॉर्म 6 भर सकते थे क्योंकि वह एक नए इलाके में नए वोटर हैं और एसआईआर इसे ऐसे मानता है जैसे वोटर लिस्ट बिल्कुल नए सिरे से शुरू हो रही हो।

कोर्ट ने पूछे तीखे सवाल

इस पर “फॉर्म 8 उस जगह की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर आपत्ति दर्ज करने के लिए है। इसका मकसद ड्राफ्ट लिस्ट में सुधार करना और वोटर का नाम शामिल करना है। फॉर्म 8 असल में इसी काम के लिए है।” बेंच ने आगे कहा कि फॉर्म 6 यह बताने के लिए है कि वोटर जिस जगह रहता है, वहां की लिस्ट में उसका नाम नहीं है और उसे लिस्ट में शामिल किया जाना चाहिए।

जजों ने कहा, “अगर वह आपको फॉर्म 6 देता है तो यह एक झूठा डिक्लेरेशन (घोषणा) है। अगर वह आपको फॉर्म 8 (पता बदलने के लिए) देता है तो उसे स्वीकार न करें, बल्कि उससे एन्यूमरेशन फॉर्म (गणना फॉर्म) देने को कहें। इस देश के इतिहास में एन्यूमरेशन फॉर्म जैसा कुछ नहीं रहा है।”

कोर्ट ने पूछा कि जो व्यक्ति एक जगह से दूसरी जगह चला गया है और जिसका नाम पहले से ही वोटर लिस्ट में है, उससे पहले से भरे हुए एन्यूमरेशन फॉर्म में फॉर्म 6 का डिक्लेरेशन देने के लिए कैसे कहा जा सकता है।

बेंच ने कहा, “घोषणाएं ऐसी हैं कि वोटर को पहले से भरे हुए फॉर्म में यह बताना होता है कि उस व्यक्ति का नाम उसी जगह की वोटर लिस्ट में शामिल किया जाए, जबकि वह व्यक्ति वहां रहता ही नहीं है। कोई व्यक्ति ऐसी घोषणा कैसे करेगा जब उसे पता हो कि उसका नाम किसी दूसरी जगह पर है? जैसे ही वह ऐसी घोषणा करता है, उस पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। यह एक झूठा बयान है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “कोई भी वोटर इस पर साइन नहीं करेगा। किसी भी वोटर को इस पर साइन नहीं करना चाहिए। हमारा कहना है कि उन्हें इस पर साइन नहीं करना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति वहां रहता ही नहीं है, तो वह उस जगह पर नाम शामिल करने के लिए कैसे अप्लाई कर सकता है?”

कोर्ट ने चुनाव आयोग से एन्यूमरेशन फॉर्म और फॉर्म के साथ लगने वाले एनेक्जर (अनुबंध) जमा करने को कहा। बेंच इस मामले की सुनवाई मंगलवार को जारी रखेगी।

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