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एमपी हाई कोर्ट ने गूगल पर देखा बस का वजन, हादसे में घायल युवक को मिलेगा 3.17 लाख मुआवजा; बीमा कंपनी की अपील खारिज

Published: Mon, 02 Nov 2026 11:25 PM (IST)

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बस चालक के लाइसेंस को लेकर बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।

-प्रतीकात्मक चित्र।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील खारिज की।

  2. घायल शुभम पटेल को 3.17 लाख मुआवजा बरकरार।

  3. बीमा कंपनी पर 20 हजार रुपये मुकदमा खर्च।

डिजिटल डेस्क, जबलपुर। बस चालक के ड्राइविंग लाइसेंस को लेकर दायर बीमा कंपनी की अपील को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को 20 हजार रुपये मुकदमा खर्च के रूप में दावेदारों को देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी बस का वास्तविक वजन निर्धारित सीमा से अधिक होने का प्रमाण पेश नहीं कर सकी। ऐसे में केवल वाहन के बस होने के आधार पर चालक के पास भारी मोटर वाहन (एचएमवी) लाइसेंस होना अनिवार्य नहीं माना जा सकता।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बीमा कंपनी से बस का वास्तविक वजन पूछा, लेकिन कंपनी इसका कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाई। इस पर न्यायमूर्ति ने स्वयं गूगल पर टाटा स्टारबस मार्कोपोलो का वजन देखा, जो करीब 4,960 किलोग्राम पाया गया।

पनागर में बस की टक्कर से घायल हुआ था युवक

मामला 26 अगस्त 2022 को जबलपुर के पनागर में हुई सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। बस की टक्कर से शुभम पटेल घायल हो गया था। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने सुनवाई के बाद पीड़ित को 3.17 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।

बीमा कंपनी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि दुर्घटना के समय बस चालक के पास केवल हल्के मोटर वाहन (एलएमवी) का लाइसेंस था, जबकि बस चलाने के लिए भारी मोटर वाहन का लाइसेंस जरूरी था।

वाहन का वजन साबित नहीं कर सकी बीमा कंपनी

हाई कोर्ट ने पाया कि बीमा कंपनी यह साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सकी कि संबंधित बस का वजन निर्धारित सीमा से अधिक था। अधिकरण के समक्ष भी कंपनी ने इस दलील के समर्थन में कोई गवाह पेश नहीं किया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वाहन की श्रेणी और उसके वास्तविक वजन को देखे बिना केवल बस होने के आधार पर एचएमवी लाइसेंस की अनिवार्यता नहीं थोपी जा सकती।

बिना पर्याप्त शोध के अपील दायर करने पर नाराजगी

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पर्याप्त तथ्यों और कानूनी शोध के बिना अपील दायर करने पर नाराजगी जताई। बीमा कंपनी को दावेदारों को 20 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया गया। साथ ही यह राशि जिम्मेदार अधिकारियों से वसूलने के आदेश भी दिए गए।

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12 प्रतिशत दंडात्मक ब्याज हटाया

हालांकि, हाई कोर्ट ने मुआवजे के मूल आदेश को बरकरार रखते हुए अधिकरण द्वारा लगाया गया 12 प्रतिशत दंडात्मक ब्याज निरस्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मुआवजा राशि पर इस तरह का अतिरिक्त दंडात्मक ब्याज लगाने का औचित्य नहीं है।

इस तरह बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी गई, 3.17 लाख रुपये का मूल मुआवजा बरकरार रहा और दंडात्मक ब्याज हटाने के साथ कंपनी पर 20 हजार रुपये मुकदमा खर्च भी लगाया गया।

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