MP में बिजली हुई महंगी! कम उत्पादन का खामियाजा उपभोक्ताओं पर, बिल में 10% तक बढ़ा बोझ
मध्य प्रदेश में बिजली उत्पादन में कमी और बाहर से बिजली खरीद के कारण उपभोक्ताओं पर वित्तीय बोझ बढ़ा है। ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।
HighLights
कम बिजली उत्पादन से 120 करोड़ यूनिट की कमी हुई।
बाहर से बिजली खरीदने पर 600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ।
उपभोक्ताओं के बिल में कुल 10% तक की वृद्धि हुई।
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। बिजली उत्पादन कम हुआ तो उसकी भरपाई बाहर से बिजली खरीदकर की गई और इसका असर सीधे उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ा। प्रदेश में चालू वित्तीय वर्ष के पहले छह माह में पावर जनरेटिंग कंपनी का प्लांट लोड फैक्टर (पीएलएफ) करीब 70 प्रतिशत रहा।
जानकारों के आकलन के मुताबिक यह छत्तीसगढ़ में एनटीपीसी के करीब 76 प्रतिशत से छह प्रतिशत कम है। एक प्रतिशत पीएलएफ की कमी से करीब 20 करोड़ यूनिट उत्पादन कम होने के अनुमान के आधार पर छह प्रतिशत कमी का मतलब करीब 120 करोड़ यूनिट कम बिजली उत्पादन है।
इस कमी की भरपाई के लिए अन्य स्रोतों से बिजली खरीदनी पड़ती है। यदि औसत लागत पांच रुपये प्रति यूनिट मान ली जाए तो 120 करोड़ यूनिट कम उत्पादन का मूल्य करीब 600 करोड़ रुपये बैठता है। वास्तविक वित्तीय असर बिजली खरीद की दर और अन्य लागतों पर निर्भर करेगा। इसका असर बिजली के बिल में ईंधन एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार यानी एफपीपीएस के रूप में दिखाई दे रहा है।
मार्च में जहां एफपीपीएस माइनस 0.63 प्रतिशत था, वहीं सितंबर में यह बढ़कर 5.063 प्रतिशत हो गया। इसके अलावा मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के टैरिफ आदेश के तहत एक अप्रैल 2026 से बिजली दरों में करीब चार प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। इस तरह टैरिफ में बढ़ोतरी और एफपीपीएस (ईंधन और बिजली खरीद अधिभार) के अतिरिक्त भार को मिलाकर उपभोक्ताओं को बिजली के लिए करीब 10 प्रतिशत तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ रहा है।
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प्रदेश के प्रमुख ताप विद्युत गृहों का उत्पादन
ताप विद्युत गृह --- क्षमता --- छह माह का उत्पादन
अमरकंटक --- 210 मेगावाट --- 636.53 मिलियन यूनिट
संजय गांधी, सिंहपुर --- 1340 मेगावाट --- 4286.204 मिलियन यूनिट
सतपुड़ा --- 500 मेगावाट --- 1720.93 मिलियन यूनिट
सिंगाजी --- 2520 मेगावाट --- 7399.50 मिलियन यूनिट
कुल --- 4570 मेगावाट --- 14,042.93 मिलियन यूनिट
ऐसे समझें
बिजली कंपनी के अपने पावर प्लांट अपनी क्षमता के मुताबिक बिजली नहीं बना पाए। मान लीजिए किसी संयंत्र से जितनी बिजली बननी चाहिए थी, उसमें छह प्रतिशत की कमी रह गई। घर में बिजली की जरूरत तो कम नहीं हुई। इसलिए कमी पूरी करने के लिए दूसरी जगह से बिजली खरीदनी पड़ी। बाहर से खरीदी गई बिजली की कीमत का असर अंततः बिजली की कुल लागत और उपभोक्ता के बिल पर पड़ता है। इसी बढ़े हुए खर्च का एक हिस्सा एफपीपीएस के जरिए बिल में दिखाई देता है।
