MP में अल्पवर्षा के बीच गेहूं व ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती को हतोत्साहित करेगी सरकार; कम पानी वाली फसलों पर रहेगा जोर
मप्र सरकार कम बारिश और सिंचाई के लिए पानी की बढ़ती जरूरत को देखते हुए गेहूं और ग्रीष्मकालीन मूंग की ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।
HighLights
कम बारिश से गेहूं, मूंग की खेती हतोत्साहित होगी।
किसानों को उड़द, चना जैसी फसलें अपनाने को कहा।
पैराक्वेट डाइक्लोराइड खरपतवारनाशक के उपयोग पर रोक।
राज्य ब्यूरो, भोपाल। मध्य प्रदेश में कम बारिश और सिंचाई के लिए पानी की बढ़ती जरूरत को देखते हुए राज्य सरकार फसल चक्र में बदलाव की दिशा में कदम उठाने जा रही है। आलीराजपुर, इंदौर, हरदा और नर्मदापुरम समेत 12 जिलों में सामान्य से कम वर्षा होने के कारण इस बार गेहूं और ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती को हतोत्साहित करने की तैयारी है। इन दोनों फसलों में सिंचाई के लिए अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। वहीं, मूंग की खेती में कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता पर पड़ने वाले असर को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कृषि विभाग के अधिकारियों को कम पानी में तैयार होने वाली फसलों के प्रति किसानों को जागरूक करने के निर्देश दिए हैं। सरकार किसानों को ग्रीष्मकालीन मूंग के विकल्प के तौर पर उड़द और चना जैसी फसलें अपनाने के लिए प्रेरित करेगी। साथ ही, उड़द की पूरी उपज खरीदने का भरोसा भी दिया गया है।
तवा और बारना जलाशयों में कम पानी
नर्मदापुरम, हरदा, नरसिंहपुर, रायसेन और सीहोर समेत कई जिलों में बड़े पैमाने पर ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती होती है। करीब 60 से 70 दिन में तैयार होने वाली इस फसल को पांच से छह बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है। हर साल हरदा, नर्मदापुरम और रायसेन के किसान मूंग की फसल के लिए तवा और बारना जलाशयों से पानी छोड़ने की मांग करते हैं।
इस बार कम बारिश के चलते जलाशयों में उपलब्ध पानी को लेकर भी चिंता है। जानकारी के अनुसार, तवा जलाशय 87.8 प्रतिशत और बारना जलाशय 69.1 प्रतिशत तक भर पाए हैं। इन क्षेत्रों में गेहूं की खेती भी बड़े पैमाने पर होती है, जिसमें सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी चाहिए। ऐसे में जल संसाधनों पर दबाव कम करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
मूंग की जगह उड़द और चने को बढ़ावा
राज्य सरकार अब किसानों को ऐसी फसलों की ओर मोड़ना चाहती है, जिनमें अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत होती है। कृषि विभाग को जागरूकता अभियान चलाकर किसानों को फसल चयन के विकल्पों और उनके संभावित लाभों की जानकारी देने को कहा गया है।
सरकार का जोर उड़द की खेती को बढ़ावा देने पर है। किसानों को भरोसा दिलाया जाएगा कि उनकी उपज की खरीद की जाएगी। इसके अलावा चना और अन्य उपयुक्त फसलों को भी विकल्प के रूप में अपनाया जा सकता है। हालांकि, किसानों के लिए फसल बदलने का निर्णय बाजार, लागत, उपज और सरकारी खरीद की व्यावहारिक व्यवस्था पर भी निर्भर करेगा।
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पैराक्वेट डाइक्लोराइड के इस्तेमाल पर रोक
ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती में कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल का मुद्दा भी सरकार की चिंता में शामिल है। पैराक्वेट डाइक्लोराइड एक ऐसा खरपतवारनाशक है, जिसका उपयोग पौधों को तेजी से सुखाने के लिए किया जाता है। सरकार ने इसके उपयोग पर रोक लगाते हुए इससे संबंधित उपज के भंडार नष्ट करने के निर्देश दिए हैं।
इस रसायन के संपर्क में आने या इसे निगलने से गंभीर विषाक्तता हो सकती है। इससे फेफड़ों, किडनी और लिवर सहित कई अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। हालांकि, इसके इस्तेमाल और मूंग की उपज में अवशेषों की मौजूदगी से जुड़े दावों की पुष्टि संबंधित नियामकीय आदेशों और जांच रिपोर्टों के आधार पर की जानी चाहिए।
सरकारी गोदामों में करीब 3.75 लाख टन मूंग
ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती को हतोत्साहित करने के पीछे सरकारी खरीद और भंडारण की समस्या भी एक प्रमुख कारण है। किसानों की मांग पर सरकार मूंग खरीदती रही है, लेकिन खरीदी गई उपज के लिए पर्याप्त खरीदार नहीं मिलने से भंडार बढ़ता गया।
जानकारी के अनुसार, सरकारी गोदामों में पिछले तीन से चार वर्षों की करीब 3.75 लाख टन मूंग अब भी रखी हुई है। ऐसे में सरकार के सामने एक तरफ किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ पानी की उपलब्धता, फसल विविधीकरण और सरकारी भंडार के बेहतर प्रबंधन का सवाल भी है।
